|
आंध्र: कांग्रेस नहीं चाहती कि वोट बँटें | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आँध्रप्रदेश के चुनावी समीकरणों का विश्लेषण - 2 कांग्रेस ने तेलगुदेशम विरोधी वोटों को बँटने न देने के लिए गठबंधन की नीति अपनाई है. इसने नवगठित तेलंगाना राज्य समिति के साथ ही वामपंथी दलों से भी गठजोड़ किया है. भाकपा ने 25 वर्ष बाद कांग्रेस से हाथ मिलाया है तो माकपा पहली बार कांग्रेस के साथ आई है. राज्य में वामदलों की ताकत इधर घटी है पर कुछ ज़िलों में अभी भी उनका अच्छा प्रभाव है. तेलंगाना क्षेत्र के नालगोंडा और खम्माम ज़िलों में उनका अच्छा जनाधार है. पर सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद गठबंधन है तेलंगाना राज्य समिति के साथ बनाया चंद्रशेखर राव का अप्रैल 2001 का गठबंधन. भाजपा के सांसद नरेन्द्र भी बाद में इसी संगठन में आ गए थे. अगस्त 2001 में हुए लोकसभा चुनाव में इस समिति के उम्मीदवारों ने तेलंगाना क्षेत्र में 20 फ़ीसदी वोट हासिल किए थे. इसी को देखते हुए कांग्रेस ने उसके साथ गठबंधन किया और उसे लोकसभा की छह तथा विधानसभा की 42 सीटें दी हैं. अब यह गठबंधन इस इलाके में काफ़ी मज़बूत दिख रहा है. इसके अलावा नक्सली गुट पीडब्ल्यूजी ने तेलगुदेशम को पराजित करने की घोषणा की है जिससे उसके प्रभाव वाले इलाकों में टीडीपी-भाजपा गठबंधन को परेशानी होगी. कांग्रेस की रणनीति का दूसरा हिस्सा शासन में रही तेलगुदेशम से पैदा लोगों की नाराज़गी को वोटों में बदलना है. वह भ्रष्ट्राचार, ग़रीबों और किसानों की बदहाली को मुद्दा बना रही है. वैसे दोनों गठबंधनों में सिद्धान्तों और दृष्टिकोण का अंतर नहीं लगता पर कांग्रेस को नायडू सरकार से पैदा नाराज़गी से काफ़ी उम्मीदें हैं. टीडीपी का मुख्य अभियान कांग्रेस की ओर से उठाए जा रहे मुद्दों का जवाब देना है. यह विकास और आर्थिक सुधार की बात भी प्रचारित कर रही है, वह नक्सल समस्या से लड़ने का दावा भी कर रही है साथ ही राज्य को न बँटने देने का अभियान भी चला रही है. पहली दो कोशिशें तो कांग्रेसी मुहिम का मुकाबला करने की हैं तो तीसरी कांग्रेस पर दबाव बनाने की. पर आंध्र में भी राज्य न बँटने देने की मुहिम का ज़्यादा प्रभाव नहीं दिखता. नायडू कांग्रेस पर टीआरएस के साथ जाने को मौकापरस्ती बता रहे हैं पर इसका असर नहीं हो रहा है क्योंकि वे अब भाजपा के साथ हैं और भाजपा भी तेलंगाना राज्य बनाने के पक्ष में रही है. अब वह टीडीपी से हाथ मिलाने के चलते इस मामले में स्पष्ट कुछ नहीं कह रही है. कांग्रेस गठबंधन की दिक़्क़तें कांग्रेस-टीआरएस गठबंधन की भी अपनी दिक्कतें हैं. टीआरएस ने उन सभी क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए हैं जिन्हें कांग्रेस ने वाम दलों के लिए छोड़ा है.
वाम दल राज्य विभाजन के पक्ष में नहीं हैं और अभी इस सवाल पर खुलकर नहीं बोलते. फिर कई विधानसभा क्षेत्रों जैसे चोप्पनदंडी, कामारेड्डी और करीमनगर में कांग्रेस और टीआरएस आमने-सामने आ गए हैं. नायडू विरोधी गठबंधन से मुख्यमंत्री पद के दावेदार का नाम भी पूछते हैं पर कांग्रेस ने अपनी ओर से अभी तक कोई नाम सामने नहीं किया है. वाईएस राजशेखर रेड्डी अभी दौड़ में सबसे आगे लगते हैं. टीडीपी में भी खेमेबाजी है, पर वहां नेतृत्व का सवाल उलझा हुआ है. बड़ी संख्या में बाग़ी उम्मीदवारों की उपस्थिति धरना, प्रदर्शन, आत्मदाह की धमकियों ने चुनावी परिदृश्य को और अस्पष्ट बनाया है. यहाँ ये ध्यान रखना ज़रूरी होगा कि कांग्रेस में बाग़ियों की संख्या कहीं अधिक है. सो अब परिणाम कुछ खास बातों पर निर्भर करेगा. पहली चीज़ तो नायडू शासन से पैदा नाराजगी का आकार-प्रकार है. फिर यह भी देखना होगा कि क्या कांग्रेस को तेलंगाना में टीआरएस के साथ जाने से शेष आंध्र में नुक़सान होता है. जहाँ तक आंकड़ों की बात है तो पिछली बार भले ही कांग्रेस हार गई हो, पर उसके वोट कम नहीं थे. उसके और टीडीपी के बीच का अंतर बहुत कम है. अगर पिछली बार कांग्रेस और वाम दलों को मिले वोट जोड़ भर दिए जाएँ तो कांग्रेस को लोकसभा की तीन और सीटें मिल जाती हैं जबकि विधानसभा में उसके सदस्यों की संख्या 107 हो जाती है. पर इतने भर से टीडीपी नहीं हारेगी. फिर जैसे ही टीआरएस का हिसाब ध्यान में आता है, सारा पुराना समीकरण बदल जाता है. अगर हम पंचायत चुनाव के आँकड़े लें तो राज्य के तीनों क्षेत्रों में एकदम अलग परिदृश्य नजर आता है. तब कांग्रेसी गठबंधन तेलंगाना क्षेत्र में एकदम झाडू फेर देगा जबकि लोकसभा सीटों के मामले में वह टीडीपी गठबंधन से आगे निकलेगा और विधानसभा में बहुमत पाकर शासन में आ जाएगा. निश्चित रूप से यह हिसाब तब आता है जब हम मानते हैं कि गठबंधन एकदम व्यवस्थित ढंग से चले, टीडीपी को शासन का लाभ या घाटा न मिले और तेलंगाना के सवाल पर बाकी प्रदेश में कोई प्रतिक्रिया न हो. पर जैसे ही हम इन तीनों कारणों को ध्यान में लाते हैं, परिदृश्य बदल जाता है. अगर टीडीपी शासन से नाराज़ लोगों की एक छोटी जमात भी कांग्रेस की तरफ झुकती है तो वह लोकसभा और विधानसभा चुनाव दोनों में भारी जीत पा जाएगी. लेकिन तेलंगाना का सवाल अगर रायलसीमा और तटीय आंध्र में किसी किस्म की हल्की प्रतिक्रिया भी पैदा करते हैं तो फिर दोनों गठबंधनों के बीच कांटे की टक्कर हो जाएगी. अगर दो फीसदी से ज्यादा वोट भी इस चलते टीडीपी के पक्ष में आए तो वह वापस सत्ता में आ आ जाएगी. यहाँ आकर जनमत संग्रह भाजपा-टीडीपी को आगे बता रहे हैं. पर इस बात पर सहज विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि जनमत संग्रह टीआरएस जैसे नए राजनीतिक दल को हल्का ही मानते हैं. वैसे चुनावी भविष्यवाणी जो हो पर यह एक ऐसा राज्य है जिसके वास्तविक चुनाव परिणामों पर सबकी नजर रहेगी. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||