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ओबामा के सामने विदेश नीति की चुनौतियाँ... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मंगलवार को बराक ओबामा के अमरीकी राष्ट्रपति के रुप में कार्यभार संभालने के साथ ही उनके समक्ष होंगी अमरीकी विदेशी नीति से संबंधित कई समस्याएँ. यहाँ हम चर्चा कर रहे हैं 10 ऐसी ही समस्याओं की और कैसे संभवत: वे इससे निपटेंगे. दुनिया में अमरीका की भूमिका बराक ओबामा के राष्ट्रपति पद के लिए चुने जाने के साथ ही यह स्पष्ट हो गया था कि राष्ट्रपति बुश के शासन के दौरान अमरीका की जो विदेश नीति थी उसमें अमरीकी जनता भारी बदलाव चाहती है. यह बदलाव एकतरफ़ा नीति की जगह बहुलतावाद और 'दुनिया में सिर्फ़ एक महाशक्ति' के रुप में अमरीका की चर्चा में कमी के रुप में भी देखा जा सकता है. संघर्ष के बजाय ज़ोर कूटनीति पर ज्यादा हो सकता है. हालांकि अमरीकी राष्ट्रपति चाहे उनसे कुछ भी उम्मीदें हों संघर्ष में शामिल हो ही जाते हैं या घसीट लिए जाते हैं. इसलिए कोई भी ऐसी अपेक्षा नहीं कर रहा कि ओबामा एक संघर्ष मुक्त राष्ट्रपति के रुप में सामने आएँगे. अमरीका फिलहाल दो युद्धों को झेल रहा है. कैसे ओबामा इसे संभालते हैं वह उनके राष्ट्रपति काल को परिभाषित करेगा. इराक़ ओबामा कहते हैं कि वे अपने कमांडरों से कहेंगे कि इराक़ में अपने लक्ष्य को 'सफलता पूर्वक युद्ध समाप्ति' के रुप में पुनर्परिभाषित करें. लेकिन वे कहते हैं कि इसे ज़िम्मेदारी के साथ करना होगा. इनमें ओबामा के राष्ट्रपति पद संभालने के 16 महीनों के भीतर यानी मई 2010 तक इराक़ी सरकार को अपने सैन्य बल को मज़बूत बनाने और इराक़ से अमरीकी सेना की कई चरणों में वापसी शामिल हैं. अफ़ग़ानिस्तान ओबामा के एजेंडे में अफ़ग़ानिस्तान सबसे ऊपर होगा. यदि इराक़ युद्ध ढलान पर है तो अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध ज़ोर पकड़ रहा है. ओबामा ने 'अफ़ग़ानिस्तान पर ध्यान केंद्रित' करने की बात की है. उन्होंने कहा है कि वे दो और सैन्य ब्रिगेड्स को अफ़ग़ानिस्तान भेजेंगे. ओबामा ने ओसामा बिन लादेन पर हमले की भी बात की है, फिर चाहे वे कहीं भी हों.
अफ़ग़ानिस्तान में स्थिति सुधारने का मतलब होगा कि अफ़ग़ान सरकार के कामकाज को सुधारना. ओबामा की नीतियों में पाकिस्तान के बॉर्डर इलाक़ों में अल क़ायदा और तालेबान समर्थक ताक़तों को परास्त करने के लिए पाकिस्तान के साथ एक प्रभावी नीति को तैयार करना भी शामिल होगा (पाकिस्तान की स्थिरता भी अपने आप में एक बड़ी समस्या है). 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध' 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध' के बारे में बुश के चर्चित वक्तव्य का ओबामा प्रशासन में उतना महत्व शायद न रह जाए. वे ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं - ग्यारह सितंबर आयोग के शब्दों में - 'विचारों के युद्ध' पर, ताकि अमरीकी विदेश नीति अमरीका के पारंपरिक मूल्यों से मेल खाती हो. इसके लिए वे इस्लामी दुनिया में उदारवादी ताकतों से तालमेल बनाएँगे ताकि 'अल क़ायदा के प्रॉपेगेंडा' का सामना किया जा सके. हालांकि उन्होंने कहा है कि वे 'अमरीका के लिए जो आतंकवादी सीधा ख़तरा बन कर उपस्थित हैं, उन पर सैन्य हमले से पीछे नहीं हटेंगे.' दो अहम मुद्दों पर भी नज़र होगी - ग्वांतानामो बे का बंद होना और यातना पर प्रतिबंध के तहत ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए को भी इस दायरे में लाना. इरान संभवत: यह एक बहुत बड़ा संकट है और यह बहुत कुछ इस पर टिका हुआ है कि इरान क्या क़दम उठाता है. यदि इरान लो ग्रेड यूरेनियम का संवर्द्धन जारी रखता है तो नया प्रशासन इरान पर अपना प्रतिबंध भी जारी रखेगा और संभव है कि उसका दायरा और भी बढाए. बराक ओबामा ने कहा है कि वे इरान के साथ बिना शर्त बातचीत करेंगे. हालांकि जरुरी नहीं कि यह राष्ट्रपति के स्तर पर हो. वर्तमान इरानी नेतृत्व यूरेनिम संवर्द्धन के अपने संवर्द्धन कार्यक्रम को छोड़ देगा यह मुश्किल दिखता है. ऐसे में अमरीका के साथ किसी भी तरह के समझौते में कठोर निरीक्षण के तहत यूरेनियम के कुछ संवर्द्धन की अनुमति शामिल हो सकती है. मध्यपूर्व शांति प्रक्रिया राष्ट्रपति बुश इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच इस वर्ष के अंत तक एक समझौता चाहते थे जो कि असंभव प्रतीत होता है. इसराइल और फ़लस्तीन शांति प्रक्रिया में ओबामा के सामने मुश्किल होगी कि वे किस हद तक हस्तक्षेप कर सकते हैं. दस फ़रवरी को होने वाले इसराइली चुनाव से यह स्पष्ट हो पाएगा कि क्या इसराइली सरकार इस मुद्दे पर किसी तरह के समझौते या लचीलेपन के लिए तैयार है. रुस शीत युद्ध की समाप्ति के बाद हाल में जॉर्जिया की घटनाओं ने रुस और पश्चिमी देशों के बीच के संबंधो में खटास को बढ़ा दिया है.
इससे यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि नया प्रशासन रुस के साथ अपनी विदेश नीतियों में क्या बदलाव लाएगा. अमरीका को इरान और डारफ़ुर मामलों में भी रुस की मदद चाहिए. फ़िलहाल सारा ज़ोर जॉर्जिया (और यूक्रेन) को नैटो की सदस्यता दिलवाने पर होगा. उत्तरी कोरिया हाल में इस ओर कुछ सकारात्मक कदम उठाए गए हैं. उत्तरी कोरिया ने परमाणु कार्यक्रमों पर रोक की सत्यता की जाँच के लिए कार्यवाही पर सहमति इस शर्त पर दी है कि अमरीका उत्तर कोरिया को 'आतंकवाद को सहायता देने वाले देशों की सूची' से निकाल देगा. लेकिन उत्तर कोरिया के पास जो परमाणु हथियार हैं उसे वह संभवत: अपने पास ही रखे, ऐसे में ओबामा के सामने यह मु्द्दा होगा कि क्या वे उत्तर कोरिया को परमाणु हथियारों से पूरी तरह से मुक्त करवा सकेंगे. चीन चीन सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है. साथ ही दुनिया में उसकी आर्थिक शक्ति का लोहा सभी मानते हैं, ऐसे में चीन के साथ अमरीकी संबंध बेहद मह्त्वपूर्ण हो जाते हैं. चीन अपने आप में अमरीका के लिए कोई समस्या नहीं हैं. लेकिन ताइवान का भविष्य समस्या बन सकता है और तिब्बत का मुद्दा तो है ही. वर्षों से चीन का सारा ध्यान घरेलू आर्थिक विकास पर रहा है और जब तक चीन की ध्यान इस पर केंद्रित होगा, अमरीका के साथ उसके संबंध स्थिर रहेंगे. ऐसा कोई और लक्षण नहीं दिखता कि ओबामा इससे अलग कुछ और चाहते हों. नई कूटनीति: वित्त, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा ऊपर दिए गए शीर्षक में वे मुख्य मुद्दे आते हैं जिन्हें कभी कभी नई कूटनीति कहा जाता है. वर्तमान आर्थिक संकट, जिसमें अमरीकी वित्तीय संस्थाओं को सरकारी पैकेज दिए गए हैं, से अमरीका को उबारना ओबामा की प्राथमिकता होगी. ओबामा ने जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र मे कई क़दम उठाने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता ज़ाहिर की है. वे वर्ष 2050 तक ग्रीन हॉउस गैस में 80 प्रतिशत की कमी चाहते हैं. क्योटा प्रॉटोकाल का अंत वर्ष 2012 में हो रहा है. ऐसे में ओबामा के राष्ट्रपति काल में जलवायु परिवर्तन एक प्रमुख मु्द्दा होगा. ऊर्जा, ख़ास तौर पर तेल की आपूर्ति, ओबामा के सामने एक प्रमुख चुनौती होगी. ओबामा ने शपथ ली है कि वे तेल के लिए मध्य पूर्व और वेनिज़ुएला पर अमरीकी निर्भरता को 10 वर्षो के भीतर समाप्त कर देंगे. दुनिया में अमरीका अपनी एक नई भूमिका किस रुप में अख़्तियार करता है वह इस पर निर्भर करता है कि ओबामा प्रशासन इन चुनौतियों से कैसे निपटता है. | इससे जुड़ी ख़बरें शपथ से पहले ओबामा का एकजुटता का आह्वान20 जनवरी, 2009 | पहला पन्ना अमरीका में उत्साह और उम्मीदें20 जनवरी, 2009 | पहला पन्ना 'अमरीका और शेष दुनिया के रिश्ते बेहतर होंगे'19 जनवरी, 2009 | पहला पन्ना और वो घड़ी आ गई है...20 जनवरी, 2009 | पहला पन्ना काम बहुत बाकी हैं: बराक ओबामा19 जनवरी, 2009 | पहला पन्ना 'अल क़ायदा और लादेन बड़ा ख़तरा'15 जनवरी, 2009 | पहला पन्ना ओबामा ने की ऐतिहासिक रेल यात्रा17 जनवरी, 2009 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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