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और वो घड़ी आ गई है... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
'' अंगूठा चूसते हुए बच्चे, चेहरे पर अनगिनत झुर्रियां लिए हुए बूढे, आंखों में एक नए युग का सपना संजोए नौजवान, हाथों में छोटे छोटे झंडे लिए, गलियों में, मुहल्लों में, शहरों में गांवों में, निकल आए वो, नाचते, गाते, खुशियों के आंसू छलकाते, एक दूसरे को गले लगाते.सालों से दबाकर कुचलकर रखी गई ख़्वाहिशें सभी बंदिशें तोड़ने को बेताब थीं, हज़ारों की भीड़ पुलिस की रस्सियों के घेरे से बाहर निकलकर अपने नायक की एक झलक, उसकी एक आवाज़ सुनने को बेकरार थी.'' इतिहासकार रामचंद्र गुहा की किताब में चौदह अगस्त 1947 की रात नेहरू के इस भाषण के पहले का ये दृश्य पढ़ते हुए लगा मानो बात साठ साल पहले की दिल्ली की नहीं हो रही हो, चार नवंबर 2008 के रात के वाशिंगटन की हो रही हो, शिकागो की हो रही हो, फ़िलाडेल्फ़िया की हो रही हो, न्यूयॉर्क की हो रही हो. वैसा ही जोश, वैसा ही दीवानापन नज़र आया यहां भी एक इंसान के लिए जिसने बदलाव की उम्मीद जगाई है अमरीका में ही नहीं, पूरी दुनिया में. नेहरू और ओबामा- पता नहीं मैं क्या सोच रहा था. एक तरफ़ कुछ ही घंटे पहले आज़ाद हुए तीसरी दुनिया के एक ग़रीब देश का नेता, दूसरी तरफ़ दुनिया के एकमात्र सुपरपावर या कह लें कि फ़्रीवर्ल्ड का नेता, एक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, दूसरा अभी अर्थव्यवस्था का अर्थ भी नहीं समझ पाया था. तो फिर दोनों ही ने जो उम्मीदें जगाईं अपने लोगों में, अपने आसपास उनके रंग मिलते जुलते क्यों नज़र आ रहे हैं? रामचंद्र गुहा से बात की तो उनका कहना था कि वो इसलिए क्योंकि दोनों ही नेताओं के व्यक्तित्व में समानता है और दोनों की चुनौतियां भी कुछ एक सी हैं. वो कहते हैं दोनों ही बुद्धिजीवी हैं, दोनों ही कि किताबें बेस्टसेलर बनीं, दोनों ही अपने देश से बहुत ज़्यादा प्यार करते हैं लेकिन दुनिया से भी उतना ही प्यार करते हैं. उनका कहना है,'' बराक ओबामा और नेहरू जैसे लोग रोज़ रोज़ पैदा नहीं होते इस धरती पर.'' नेहरू की चुनौतियों को तो मैंने किताबों में पढ़ा है या फिर सुना है लेकिन बराक ओबामा की चुनौतियों को तो हर पल बढ़ता हुआ देख रहा हूं. और उन्हें कई गुना बढ़ा रही है उनसे बंधी उम्मीदें. भारी उम्मीदें छोटे छोटे बच्चे उन्हें चिठ्ठियां भेज रहे हैं, अस्पतालों को बेहतर करने के लिए, बिजली का बिल कम करने के लिए, बेघरों को घर दिलवाने के लिए.
ओबामा के नाम के गाने बनाए जा रहे हैं. पड़ोसी देश कनाडा में तो एक रेडियो स्टेशन ने ऐसे 49 गानों पर वोटिंग शुरू करवाई है जो कनाडा की सही तस्वीर से, उसके कलाकारों से, उसके संगीत से ओबामा को परिचित करवा दें. उम्मीदें बाकी दुनिया को भी हैं कि जो बदलाव की बयार लेकर आए हैं बराक ओबामा क्या पता वो आंधी बनकर पूरी दुनिया को बदल दे, कि गज़ा पट्टी में एक मां रात में जब अपने बच्चों को चिपटा कर सोए तो बेखौफ़ होकर, कि अफ़गानिस्तान में ठंड से ठिठुरते बच्चे सुकून से लिहाफ़ की गर्मी में एक सुनहरे भविष्य का सपना देख सकें, कि कबायली इलाकों में एक छोटी बच्ची स्कूल जाए तो उसे तालिबान के बमों की धमकी की जगह वो शिक्षा मिले जो उसे आसमान छूने को उकसाए. हिलेरी क्लिंटन को बराक ओबामा ने अपना विदेश मंत्री चुना है. पिछले हफ़्ते हिलेरी क्लिंटन ने कहा कि ये मुमकिन नहीं है कि अमरीका दुनिया के हर भूखे का पेट भर सके, हर इंसान को गरीबी से छुटकारा दिला सके, हर बीमारी का इलाज कर सके या हर जंग को रोक सके...लेकिन हमारी ताक़त और हमारा कद हम पर इंसानियत के प्रति एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी डालता है. बराक ओबामा ने एक चिठ्ठी लिखी है अपनी दोनों बेटियों मालिया और साशा के नाम. कहते हैं- मैं चाहता हूं कि इंसानियत की सरहदों को जाति, धर्म, क्षेत्रीयता से कहीं दूर पहुंचा दूं क्योंकि ये हमें एक दूसरे की अच्छाइयों को देखने से रोकते हैं. वो लिखते हैं कि मेरी दादी ने समझाया था कि अमरीका महान इसलिए नहीं है क्योंकि वहां सब कुछ सही है बल्कि इसलिए है क्योंकि वहां चीज़ों को बेहतर किया जा सकता है. और चीजों को बेहतर करने की ज़िम्मेदारी हम सबकी है. पिछले आठ सालों में अमरीका ने जो किया काफ़ी हद तक एकतरफ़ा किया. जिसे चाहा गले लगाया, जिसे चाहा रौंद डाला. आप अगर अमरीका के साथ नहीं थे तो आप उसके ख़िलाफ. थे. और बहुत हैं जो मानते हैं कि आज अर्थव्यव्स्था की भारी मंदी हो, अस्तव्यस्त दुनिया हो, चौबीसों घंटे का एक अंजाना डर हो, इन सबके पीछे कहीं न कहीं उस एकतरफ़ा सोच का हाथ है. एक मौक़ा आप अमरीका से प्यार करें या नफ़रत, इस बात से शायद ही इनकार करें कि अमरीका एक मौक़ा है. कल भी था और आज भी है. न्यूज़वीक पत्रिका के संपादक फ़रीद ज़कारिया ने लिखा है कि दुनिया की जो मुश्किलें हैं वो एक मौक़ा भी पेश कर रही हैं. और हमेशा की तरह वो मौक़ा अमरीका हो सकता है, जो क़ानून बनाए, इमारत ख़ड़ी करे एक ऐसी दुनिया की जहां वाशिंगटन, बीजिंग, मॉस्को, दिल्ली, पेरिस सब एक होकर काम करें, एक तरक्की करती शांतिप्रिय दुनिया के लिए. क्योंकि आज अमरीका मान रहा है कि दुनिया की परेशानियां वो अकेले नहीं सुलझा सकता और दुनिया बिना अमरीका के उन्हें नहीं सुलझा सकती. और इस मौक़े को अगर एक चेहरा देना हो तो आज के दिन शायद बराक ओबामा से बेहतर कोई चेहरा नहीं हो. और यकीन मानिए बहुत से अमरीकीयों ने इस मौक़े को पहचाना है लेकिन बिल्कुल अमरीकी अंदाज़ में. न्यू जर्सी में रहनेवाले एजे कबानी का कहना है कि चार नवंबर की रात जब चुनाव के परिणाम आए और उन्होंने अमरीका और पूरी दुनिया के लोगों का जोश देखा तो उन्होंने सोचा कि इस मौक़े को यादगार बनाने के लिए लोग कुछ न कुछ रखना चाहेंगे. और उन्होंने ओबामा के मुस्कराते चेहरे की तस्वीर लगी हुई चीनी मिट्टी की प्लेंटें बेचने का इरादा किया और अब तक दो लाख प्लेंटे बेच चुके हैं, सबकी सब मेड इन चाइना. एजे कबानी तो प्लेटों पर रूक गए, एक कंपनी ने तो ओबामा कंडोम बना डाला. उनकी वेबसाइट पर जाइए तो ओबामा की आवाज़ सुनाई देती है और लिखा हुआ है सोच समझकर इस्तेमाल करें. दुकानों में ओबामा कूकीज़ बिक रहे हैं, और व्हाइट हाउस के सामने एक दुकान खुल गई है जिसमें ओबामा और उनके परिवार की तस्वीरों वाले टीशर्ट, काफ़ी मग, गॉल्फ़ बॉल, चढ्ढी बनियान सब बिक रहे हैं. इसके मालिक जिम वार्लिक पिछले 28 वर्षों से राष्ट्रपतियों से जुड़ी यादगार चीज़ों के कारोबार में हैं और कहते हैं कि बुश, क्लिंटन, रेगन, कार्टर सबकी तस्वीरों वाले सामान वो बेच चुके हैं लेकिन जितनी मांग ओबामा की है वैसी कभी नहीं हुई. पैसे बनाने का अवसर कई इसे पैसा कमाने के मौक़े की तरह देख रहे हैं तो कई अपनी पहचान बनाने के मौके के तौर पर भी.
अलग अलग देशों से यहां आकर बसे हुए लोग अपनी संस्कृति, अपने रंग ढंग को ज़ाहिर करने के लिए समारोह कर रहे हैं, पार्टियां कर रहे हैं. भारत से यहां आकर बसे लखिंदर वोहरा ने तो सिख इनॉगरल बॉल का इंतज़ाम कर रखा है. वो कहते हैं,'' हमने ओबामा की शान में भांगड़ा मो-बराक का आयोजन किया है, जो मुबारक शब्द के साथ हेरफेर करके बना है, और खाने में ओबामा के पसंद की मा दी दाल तैयार करवाई है.'' और भांगड़ा मुबारक करवाने की ज़िम्मेदारी होगी अमृतसर से यहां आकर बसे डीजे लकी की जो इस शो के पैसे नहीं ले रहे. वाशिंगटन फिलहाल सभी परेशानियों को भुलाकर जश्न में डूबा है. शराब का चढता नशा, गिरते हुए शेयर बाज़ार को, नीलाम होते घरों को, बंद होती हुई कंपनियों को, दीवालिया होते बैंकों को, ग़ज़ा की मिसाइलों को, मुंबई की चीखों को, अल कायदा के पनाहगाहों को थोड़ी देर के लिए भुलाने में कामयाब हो जाए. लेकिन फिर सुबह भी होगी और सामना होगा ज़मीनी हक़ीकत से. ओबामा ने कहा है वो और उनकी टीम दौड़ते हुए ज़मीन पर पांव रखेगी हर मुश्किल से जूझने के लिए. शायद दुनिया के ज़्यादातर लोग कहेंगे-आमीन. |
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