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फंदा फेंकने का खेल... जाल समेटो माँझी | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका के कई हिस्सों में रोडियो नाम का खेल बड़े चाव से खेला और देखा जाता है. इसमें घुटनों तक की बूट और काउब्वॉए हैट पहने कई घुड़सवार एक खुले मैदान में हाथ में रस्सी का एक फंदा घुमाते हुए एक बेतहाशा भाग रहे बछड़े के पीछे भागते हैं और भाग रहे घोड़े की पीठ पर से ही उन्हें उस रस्सी के फंदे को फेंक कर बछड़े को फंसाना होता है और फंसते ही झटके से घोड़े से उतरकर बछड़े के चारों पांवों में रस्सी लपेटकर उसे क़ाबू में करना होता है. न्यू मेक्सिको के अल्ब्यूकर्की शहर में मैंने पहली बार ये खेल देखा लेकिन इन दिनों जब जब यहाँ के वित्त मंत्री हेनरी पॉलसन को देखता और सुनता हूँ तो लगता है जैसे हर रोज़ यही खेल देख रहा हूँ. देखने में तो हट्टे-कट्टे लगते ही हैं और अगर घुटनों तक की बूट और टोपी पहन लें तब तो कई क़द्दावर से दिखने वाले काउब्वाए उनके सामने बौने लगेंगे, बस फर्क़ ये है कि वो बार-बार फंदा फेंक रहे हैं लेकिन ये बेलगाम बाज़ार फंसने का नाम ही नहीं ले रहा. कभी लगता है फंदा छोटा रह गया, तो कभी बहुत ढीला. कई बार लगता है ये शेयर बाज़ार का लुड़कना और उससे बड़ी-बड़ी कंपनियों का घाटे में जाना अमीरों के चोंचले हैं और न्यूयॉर्क में वाल स्ट्रीट के बाहर इन दिनों हो रहे विरोध प्रदर्शन बिल्कुल सही हैं. प्रदर्शनकारी सरकार को कोस रहे हैं कि वाल स्ट्रीट की इन सूटबूट वाली कंपनियों को नहीं सीधा आम आदमी को बचाओ. जनता को भी लगता है कि जो कुछ हो रहा है बड़े-बड़े लोगों के लिए ही हो रहा है. लेकिन वाल स्ट्रीट की सीधी मार एक आम आदमी पर कैसे पड़ रही है ये देखना हो तो आज अमरीका से बेहतर कोई जगह नहीं है. डेट्रॉइट शहर, सिर्फ़ यहीं ही नहीं, कह सकते हैं पूरी दुनिया में अपने कार उद्दोग के लिए जाना जाता है. जनरल मोटर्स, फ़ोर्ड, क्राइसलर... कार उद्दोग के इन बड़े नामों का ये घर है और इस पर निर्भर हैं हज़ारों लाखों लोग. हाल के एक शोध का कहना है कार इंडस्ट्री की एक नौकरी उसके बाहर नौ और लोगों के लिए रोज़ी-रोटी कमाने का मौका पेश करती है. और जब इन कंपनियों के शेयर 58 साल के अपने न्यूनतम स्तर पर जा गिरें, कंपनियां दिवालिया होने के कगार पर आ जाएं तो सबसे पहले गाज गिरती है नौकरियों पर. कुमार सिंह वर्जीनिया में चौदह साल से कारों की बिजनेस से जुड़े हुए हैं. कहते हैं कि उनके बिजनेस में तीस प्रतिशत से ज़्यादा की गिरावट आई है और उसका सीधा असर नौकरियों पर पड़ रहा है, "जब आमदनी कम होती है तो फिर जो काम पहले बीस लोगों में बंटा था, वो बारह लोगों में बांट दिया जाता है.''
उनका कहना है कि सरकार के इलाज का असर होते-होते समय लगेगा क्योंकि बीमारी इतनी पुरानी हो चुकी है कि पूरा तंत्र चरमराया हुआ है और सब कुछ इस तरह से जुड़ा हुआ है कि एक गिरता है तो दूसरा भी गिरने लगता है. ख़ाली पड़े घर जब नौकरियाँ जाती हैं तो फिर क़र्ज़ लेकर खरीदे गए घरों के किस्त चुकनी बंद होती हैं. डेट्रॉइट, जो मिशिगन का सबसे बड़ा शहर है, उसके इर्द-गिर्द कई इलाके हैं जहाँ, एक के बाद एक घरों पर तख़्ते लगे हुए हैं और नीलामी के बोर्ड चढ़े हुए हैं. ऐसे ही एक इलाके में रहते हैं रॉबर्ट फ़्रैट. अपने आसपास के खाली पड़े घरों को दिखाते हुए कहते हैं कि हफ़्ते के सातों दिन वो काम कर रहे हैं इन दिनों लेकिन फिर भी लग रहा है कि उन्हें भी अपने मकान से हाथ धोना पड़ेगा. मिशिगन में 62 हज़ार मकान ऐसे हैं जिनके मालिक कर्ज़ नहीं चुका पाए और बैंकों ने उनपर क़ब्ज़ा किया, लेकिन जब सबकी जेब खाली हो रही हो तो बैंक किसे बेच कर अपना पैसा वसूले ? तो बैंक भी डूब रहे हैं. और बैंकों की साख जिन कागज़ों पर दर्ज थी, जिसपर अरबों का कारोबार होता था, उनकी क़ीमत कागज़ की कीमत भर की रह गई है. बचपन में बॉयोलोजी की किताब में फूड चेन के बारे में पढ़ता था और उसमें कहा जाता था कि एक छोटा सा केंचुआ हो या फिर जंगल का राजा शेर सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं जीवित रहने के लिए. और ये चेन अगर कहीं भी टूटती है तो सब पर असर होता है. कुछ ऐसा ही हो रहा है यहां की अर्थव्यवस्था में भी. एक ऐसी पूंजीवादी व्यवस्था जिसमें सरकार का दखल नाममात्र भर हो, जो जैसी मेहनत करे उसे वैसा मिले, जिसमें ताक़त हो वो आकाश को छू ले, कमज़ोरों की यहाँ कोई बिसात नहीं---यही था मूलमंत्र अमरीका का और अबतक कामयाब भी नज़र आ रहा था. लेकिन अचानक से सबकुछ ताश के महल की तरह बिखरने लगा है. और कई ऐसे हैं जो इस हताशा भरे माहौल में जान तक दे रहे हैं. लॉस ऐंजल्स में पैंतालीस साल के भारतीय मूल के कार्तिक राजाराम का भरा पूरा घर हुआ करता था. लेकिन बाज़ार में उनका भी काफ़ी पैसा लगा हुआ था और पुलिस का कहना है कि अपनी आर्थिक तंगी से परेशान होकर उन्होंने खुद को गोली मार ली. साथ ही मार डाला, अपने सात साल के बेटे अर्जुन को, बारह साल के बेटे गणेश को 19 साल के बेटे कृष्णा को, अपनी पत्नी सुबस्री को अपनी सास इंदिरा रामाशेषम को.
एक अमेरिकन ड्रीम का इतना दुखद अंत! डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बराक ओबामा कह रहे हैं कि जिस सपने के लिए न जाने कितनी पीढ़ियों ने संघर्ष किया है वो मानो हाथ से निकलता दिखाई दे रहा है. अब लोग ये नहीं देख रहे हैं कि वो चार साल पहले आज से बेहतर हालत में थे या नहीं, वो ये देख रहे हैं कि चार हफ़्ते पहले वो बेहतर हालत में थे. रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन मैकेन भरोसा दिला रहे हैं कि वो लोगों के मकान के कर्ज़ों में कुछ फेरबदल करके उसे कम करेंगे जिससे कि लोग अपने ही सपनों के बोझतले ना दब जाएं. लेकिन सही इलाज क्या है इस बीमारी का, इसका शायद अभी भी किसी को अंदाज़ा नहीं मिल पा रहा है और राजनेता दवा के साथ साथ दुआ के लिए भी हाथ उठा रहे हैं. मंदी और राजनीति रिपबलिकन पार्टी के कांग्रेसमैन जॉन बोएनर ने सात सौ अरब डॉलर के राहत पैकेज के लिए वोट तो डाला लेकिन कहा कि इसके साथ साथ ऊपरवाले की मदद की भी ज़रूरत होगी. अक्तूबर का महीना आ चुका है, हवा सर्द होने लगी है, पत्ते पेड़ से अलग होने से पहले सुनहरे होने लग गए हैं. व्हाइट हाउस के बाहर लगे पेड़ों के रंग भी बदलने लग गए हैं. पिछले हफ़्ते मैं वहां गया था जिस दिन राष्ट्रपति बुश ने भारत के साथ हुए परमाणु समझौते पर दस्तख़त किए. जब वो भाषण दे रहे थे तो कहीं से नहीं लग रहा था कि अब अपनी सत्ता के उस चरण में पहुंच गए हैं जिसके बारे में अगर हरिवंश राय बच्चन ने लिखा था ....जाल समेटा करने में भी समय लगा करता है मांझी, मोह मछलियों का अब छोड़. लेकिन बुश जब भाषण दे रहे थे तो कहीं से नहीं लग रहा था कि वो अपने शासन के आख़िरी पड़ाव पर आ गए हैं. उनके शब्द मेरे टेप रिकॉर्डर पर दर्ज हो रहे थे और मैं सोच रहा था कि इस हंसते हुए चेहरे के पीछे क्या सोच चल रही होगी. क्या उन्हें समय मिल पाया होगा पिछले आठ सालों की ओर मुड़कर देखने का? और अगर मिला भी होगा तो क्या सोच रहे होंगे वो ग्यारह सितंबर को हुए हमले के बारे में, इराक युद्ध के बारे में, कैटरीना तूफ़ान और अमरीका पर मंडराते हुए मंदी के बादल के बारे में? क्या कहीं पर ये ख़्वाहिश होगी कि काश एक कोरा कैनवस फिर से मिलता, और इस बार रंगों को कुछ अलग तरीके से भर पाता? प्लाटून, बॉर्न ऑन दी फोर्थ ऑफ़ जुलाई, जेएफके, निक्सन जैसी बहुचर्चित फ़िल्मों के निर्माता ओलिवर स्टोन ने राष्ट्रपति बुश की जिंदगी पर उनके आठ सालों पर फ़िल्म बनाई है जो सत्रह अक्तूबर को रिलीज़ होगी. एबीसी टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में ओलिवर स्टोन का कहना था कि उन्होंने ये फ़िल्म राजनीतिक कारणों से नहीं बनाई है बल्कि इसलिए बनाई है क्योंकि ये अपने आप में एक अनूठी कहानी है, एक ऐसे आदमी की कहानी जो कुछ नहीं था और कहां से कहां पहुंच गया. इसके चरित्रों में डिक चेनी हैं, कोंडोलीज़ा राइस हैं, कार्ल रोव हैं, कॉलिन पावेल भी हैं. ट्रेलर देख कर कई बार लगता है कि कुछ हद तक मज़ाक भी उड़ाया गया है उनका. लेकिन ओलिवर स्टोन कहते हैं कि उन्होंने कहीं भी बुश को हल्का नहीं आंका है क्योंकि उनकी नज़रों में बुश एक ख़तरनाक इंसान हैं जिन्होंने दुनिया को आज कहां से कहां पहुंचा दिया है. कुछ ही हफ़्तों की बात है जब बुश केवल इतिहास बन कर रह जाएंगे लेकिन उनके शासन काल के ये आठ साल, सालों तक दुनिया के साथ रहेंगे, उसकी तक़दीर लिखेंगे इसमें कोई शक नहीं है. | इससे जुड़ी ख़बरें बैंको को 250 अरब डॉलर की मदद14 अक्तूबर, 2008 | कारोबार बैंको की मदद के लिए देशों की योजना13 अक्तूबर, 2008 | कारोबार 'वित्तीय स्थिति सुधारने के प्रयास जारी'13 अक्तूबर, 2008 | कारोबार फ़ौज के लिए प्यार जगाने की कोशिश20 सितंबर, 2008 | पहला पन्ना काउब्वाय के देश में...16 सितंबर, 2008 | पहला पन्ना अजीब विसंगतिओं वाला देश अमरीका24 जून, 2008 | पहला पन्ना अदभुत जैव विविधता है अमेज़न में09 मई, 2008 | पहला पन्ना प्यार का ना कोई मज़हब ना ही भाषा है...15 फ़रवरी, 2008 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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