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खाद्य संकट का हल है उत्पादन बढ़ाना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कई परेशानियों से झूल रही विश्व अर्थव्यवस्था में खाद्य पदार्थों के बढ़ते दाम एक चिंताजनक पहलू है. हेती, फ़िलिपींस और इथियोपिया जैसे देशों में खाने के सामान के आसमान छूते दाम की वजह से दंगे भी हुए हैं. बांग्लादेश में 20 हज़ार कपड़ा उद्योग कर्मचारियों ने जमकर हंगामा किया, जिससे बांग्लादेश में अस्थिरता का ख़तरा बढ़ गया क्योंकि देश का तीन-चौथाई निर्यात कपड़ा उद्योग पर निर्भर है. पिछले तीन वर्षों से दुनिया भर में खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ महीनों से बढ़ते दाम नियंत्रण से बाहर हो गए हैं. पिछले 12 महीनों में खाद्य पदार्थों के दाम में औसतन 56 फ़ीसदी की वृद्धि हुई है. गेहूँ के दाम में 92 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है, चावल के दाम 96 फ़ीसदी बढ़ गए हैं. बढ़ते दाम की वजह से भुखमरी का ख़तरा बढ़ गया है, लेकिन परेशानी का इससे भी बड़ा कारण ये है कि हम ये नहीं पता लगा पाए हैं कि खाद्य पदार्थों की कमी की वजह आख़िर क्या है और इस समस्या से कैसे निजात पाया जा सकता है. कुछ प्रेक्षकों का कहना है कि समस्या की मुख्य वजह मांग और आपूर्ति में बढ़ता अंतर है. प्रेक्षक कहते हैं कि अग़र सरकारें बाज़ार में दख़लंदाज़ी नहीं करें तो खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ने से उसकी आपूर्ति भी बढ़ेगी और समस्या का समाधान हो जाएगा. ये सच है कि संकट की मुख्य वजह मांग और आपूर्ति में बढ़ता फ़ासला है, लेकिन सवाल ये है कि पिछले 30 वर्षों में खाने की वस्तुओं के दाम इतनी ऊंचाई पर कभी क्यों नहीं पहुंचे?
इसमे कोई संदेह नहीं है कि विश्व जनसंख्या बढ़ने से खाने की वस्तुओं के दाम बढ़ रहे हैं. भारत और चीन जैसे देशों में लोग समृद्ध हो रहे हैं. मांसाहारी लोगों की संख्या बढ़ने से मांस की मांग बढ़ रही है. इससे जानवरों के चारे की मांग में वृद्धि हो रही है. उद्योगप्रधान देशों में जैविक इंधन की मांग बढ़ी है. इस वजह से मक्का और सफ़ेद सरसों की पैदावार का करीब 20 फ़ीसदी हिस्सा ईंधन बनाने के लिए इस्तेमाल में लाया जाने लगा है. पैदावार में गिरावट लेकिन इंधन बनाने का काम तो काफ़ी पहले से हो रहा है, तो फिर खाद्य सामग्रियों के दाम अभी काबू से बाहर क्यों हो गए हैं? आस्ट्रेलिया में आए ज़बरदस्त सूखे और यूक्रेन और कज़ाकिस्तान में अनाज की पैदावार में आई गिरावट को भी बढ़ते दाम के लिए ज़िम्मेदार बताया जा रहा है. लेकिन इन वजहों से खाद्य सामग्रियों के दाम इतना ज़्यादा बढ़ना संभव नहीं है. इसके लिए हमें दूसरी छोटी-छोटी चीज़ों को समझना ज़रूरी है. आसमान छूती कीमतों के कारण भारत, अर्जेंटीना और खाद्य पदार्थों के दूसरे निर्यातकों ने अपने बाज़ारों को इस मार से बचाने के लिए खाद्य पदार्थों के निर्यात पर प्रबंध लगा दिया. इस कदम से खाद्य सामान के आयातक देशों में दाम बढ़ने शुरू हो गए और स्थिति बिगड़ने लगी। साथ ही जानबूझकर दाम कम रखने से किसानों को होने वाले म़ुनाफ़े पर असर पड़ता है. पाकिस्तान में इस साल छह लाख टन खाद का इस्तेमाल किया गया जो कि पिछले सालों से 50 फ़ीसदी कम है. इसका गेहूँ की फ़सल पर असर पड़ना ज़ाहिर है. सहायता कई अर्थशास्त्री आपसे कहेंगे कि गरीबों की मदद करने का सबसे अच्छा तरीका उन्हें धन मुहैया करवाना है ताकि उनकी आमदनी में इज़ाफ़ा हो सके. वैसे तो ये अच्छी सलाह है, लेकिन इस विषय में नहीं.
वर्ष 1974 में जब बांग्लादेश में भुखमरी फैली थी, तब गरीबों को बचाने की सरकार की कोशिशों ने समस्या को और भी गंभीर बना दिया था. इसलिए इस संकट से निपटने के लिए दाम को कम करना तो ज़रूरी है ही. पर आदर्श इलाज तो ये ही है हम उत्पादकों को मिलने वाले दाम और उपभोक्ता द्वारा दिए जा रही कीमतों के बीच फ़र्क पैदा करें. लेकिन ये कोई दूरगामी हल नहीं है, क्योंकि इससे जहां खाद्य सामान का उत्पादन घटेगा, सरकार के ऊपर भी आर्थिक बोझ बढ़ेगा. लंबे समय के हल खोजने के लिए हमें ऐसे कदम उठाने होंगे ताकि उत्पादकों को भी अपना उत्पाद बढ़ाने की प्रेरणा मिले और किसानों तक भी आर्थिक फ़ायदा पहुँचे. ऐसे समय जब विश्व की अर्थव्यवस्थाएं आपस में जुड़ी हैं, उस वक्त कीमतों का नीचे-ऊपर होना कोई बड़ी बात नहीं है. लेकिन चिंता की बात ये है कि थोड़े से भी दाम बढ़ने से गरीबों के लिए जिंदगी और मौत का म़सला खड़ा हो जाता है. इस संकट ने हमें दोबारा याद दिलाया है कि हम ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जहां कई असामानताएँ हैं. |
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