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बुधवार, 19 दिसंबर, 2007 को 14:12 GMT तक के समाचार
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और कोई चारा ही नहीं था...
रोज़ा मारिया
रोज़ा मारिया सात साल से अपनी बेटी का वियोग झेल रही हैं
गुआतेमाला सिटी की 34 वर्षीया रोज़ा-मारिया मेंडिज़बाल ने सात साल पहले अपनी बेटी को किसी और को गोद दे दिया था. लेकिन वह आज भी उसे देखने को तड़प रही हैं.

सुनिए उनकी दास्तान उन्हीं की ज़ुबानी...

"जब मेरी बेटी पैदा हुई तो मेरे पहले से ही दो बेटे थे. एक पाँच साल का और दूसरा एक साल का. ग़रीबी का यह हाल था कि छोटे बेटे को पानी में चीनी घोल कर पिलाती थी, दूध के पैसे ही नहीं थे.

न मेरी कोई नौकरी थी और न ही परिवार. जब मैंने बच्ची के पिता को अपने गर्भवती होने की ख़बर दी तो उसका कहना था, जो चाहे करो, मेरा इससे कोई लेनादेना नहीं है.

फिर वह एक दूसरी औरत के साथ अमरीका चला गया.

तीन बच्चों को पालना मेरे बस की बात नहीं थी. एक महिला जिससे मैं अपना दुख बांटती थी, उसीने मुझे इस गोद देने की प्रक्रिया के बारे में बताया.

मुझे भी लगा, मेरी बेटी को सहारे और अच्छे परिवार की ज़रूरत है जो मैं नहीं दे पाऊँगी.

 मैं झूठ नहीं बोलूँगी, अपनी बच्ची को देखने को मेरा दिल तरसता है. लेकिन मैं यह भी जानती हूँ कि वह मेरे पास रहती तो ज़िंदा नहीं रहती.

अब मैं ख़ुद उसी एजेंसी में काम कर रही हूँ और अपने दो बच्चों का पेट भर रही हूँ. अब हालात कुछ बेहतर हैं. मेरे बेटे स्कूल भी जाने लगे हैं.

मैं अधिकारियों से काग़ज़ात ले कर उन माँओं के हस्ताक्षर कराती हूँ जो अपना बच्चा गोद देना चाहती हूँ.

मैं जान सकती हूँ

मैं समझ सकती हूँ वे किन हालात से गुज़र रही हूँ क्योंकि यह मुझ पर भी बीत चुका है.

मैं जानती हूँ इन बच्चों का जीवन बेहतर होगा क्योंकि उनका घर होगा और वे इसलिए बीमार नहीं पड़ेंगे या उनकी जान नहीं जाएगी क्योंकि उनके पास खाने को कुछ नहीं है.

मैं झूठ नहीं बोलूँगी, अपनी बच्ची को देखने को मेरा दिल तरसता है. लेकिन मैं यह भी जानती हूँ कि वह मेरे पास रहती तो ज़िंदा नहीं रहती.

गुआतेमाला महिलाएँ
गुआतेमाला में ग़रीबी का ज़ोर बच्चों को ज़रूरतों से वंचित रखता है

उसे एक अमरीकी माँ ने गोद लिया है. मुझे कुछ काग़ज़ों पर दस्तख़त करने पड़े. फिर मेरी डीएनए जाँच हुई यह देखने के लिए कि मैं ही उस बच्ची की माँ हूँ.

मुझे नहीं पता वह अब कहाँ है. मैं उसे वापस नहीं लाना चाहती लेकिन उसे देखना चाहती हूँ. या कम से कम उसकी तस्वीर देखना चाहती हूँ कि वह अब कैसी लगती है.

मैं रोज़ प्रार्थना करती हूँ कि वह कभी न कभी मुझे दिखे. चाहे उस समय वह 15 या 20 साल की क्यों न हो चुकी हो.

अब मेरा कोई पति नहीं है. सिर्फ़ दो बेटे हैं. मेरे माता-पिता को इस बच्ची के बारे में कभी पता नहीं चला. मैंने ये सब अपने तक ही सीमित रखा.

बस मेरा बड़ा बेटा इस बारे में जानता है. वह मुझसे पूछता है कि मैंने ऐसा क्यों किया. वह सोचता है कि काश आज उसकी बहन उसके साथ होती.

लेकिन वह यह भी जानता है कि हम सब किस मुश्किल दौर से गुज़रे हैं. मैं अपनी बच्ची को अपने पास रखती तो उसे खिलाती क्या.

मेरे पास और कोई चारा ही नहीं था".

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