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हमारे लिए बेटी ही सब कुछ है | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
केंद्र सरकार ने हाल ही में दो फ़ैसले किए हैं. एक तो यह कि यदि किसी परिवार में इकलौती संतान लड़की होगी तो उसे बारहवीं तक की शिक्षा मुफ़्त दी जाएगी और दूसरी यह कि पिता की संपत्ति में बेटी का बराबर का अधिकार होगा. कुछ बेटियों के माता-पिताओं से बात कर उनके विचार जानने की कोशिश की है दिल्ली से सूफ़िया शानी ने... * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * लड़कियों में हिम्मत पैदा करनेवाला क़दम:निदा फ़ाज़ली उर्दु के मशहूर शायर और गीतकार निदा फाज़ली ने कुछ बरस पहले एक बेटी को गोद लिया है और नाम दिया है 'तहरीर'.
निदा फ़ाज़ली कहते हैं, "जब तालीम होती है तो औरत का नाम इंदिरा गांधी हो जाता है, वह मारग्रेट थैचर या सरोजनी नायडू बन जाती है. मुझे लगता है कि हमारे मुल्क में शिक्षा की सख़्त ज़रूरत है और शिक्षा भी ऐसी होनी चाहिए जो लड़कियों को न सिर्फ अधिकारों के लिए जागरूक बनाए बल्कि अपने हक़ के लिए लड़ने की हिम्मत भी दे सके. चाहे वह हिन्दी की मन्नू भंडारी हों या उर्दू की इस्मत चुग़ताई और क़ुर्रतुलऐन हैदर, इन सबने अपने-अपने तौर पर अपनी आज़ादी का दायारा बनाया था और जो इसलिए बन सका था क्यों कि उनके पास तालीम की रौशनी थी. तो मेरे ख़्याल से सरकार ने लड़कियों से संबंधित जो क़ानून बनाए हैं यह एक अच्छी पहल है, इस पहल का स्वागत होना चहिए और इस तरह के क़दम लगातार उठते रहना चाहिए". * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * ऐसे क़दमों से समाज की तस्वीर बदलेगी: सास्वती सेनगुप्ता दिल्ली के मिरांडा कॉलेज में अंग्रेज़ी की प्रोफेसर सास्वती सेनगुप्ता की भी एक ही बेटी है जिसका नाम है आफ़रीन.
सास्वती के निजी अनुभव और विचार कुछ इस तरह हैं," पांच साल इंतज़ार करने के बाद जब मैं माँ बनी तो मेरे ज़हन में एक ही बात थी कि बच्चा स्वस्थ्य होना चाहिए. मैं बेटे और बेटी में कोई अंतर नहीं देखती लेकिन बिटिया के आने से पहले बेटे की विशेष चाहत हो ऐसा भी नहीं था. मेरे मां बनने में कुछ कठिनाइयां थीं इसलिए मैं मानसिक रूप से बच्चा गोद लेने के लिए तैयार थी वो भी बेटी. आज अच्छा लगता है कि लड़कियों के बारे में सोचा जा रहा है. पिता की संपत्ति में बेटियों का बराबरी का हिस्सा और लड़कियों के लिए मुफ़्त शिक्षा इस नए क़ानून और शिक्षा की इस नई योजना से निश्चित रूप से समाज की तस्वीर बदलेगी लेकिन ज़रूरत इस बात की है कि इसका फ़ायदा खास तबक़े के लोगों तक पहुँचे और यह योजना सही हाथों के ज़रिए सही तरीक़े से अमल में लायी जाए. * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * यह मेरी बेटियों के लिए वरदान होगा: शांति साठ वर्ष की शांति एक गृहिणी हैं. उनके पति रिटायर हो चुके हैं. शांति की दो बेटियां हैं और आज वह अपनी एक स्वर्गवासी बेटी की दो बेटियों की परवरिश भी कर रही हैं.
शाँति पिता की संपत्ति में बेटियों के बराबर के हिस्से की बात से ख़ुश हैं. उनका कहना है, " हमें तो पता नहीं कि इस क़ानून का फ़ायदा कब, किसको और किस तरह मिलता है लेकिन अगर ऐसा है तो बहुत अच्छा है. बेटियों की ज़िदगी में कुछ तो राहत और सुरक्षा आएगी". लड़कियों के लिए मुफ्त शिक्षा की योजना पर उनका कहना है कि अगर सचमुच ऐसी कोई योजना है तो ये मेरी लड़कियों के लिए वरदान साबित होगी,वर्ना सरकारी मदद के बिना उनकी परवरिश भी कोई आसान बात नहीं है. |
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