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शनिवार, 22 जनवरी, 2005 को 12:18 GMT तक के समाचार
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कन्या भ्रूण के ख़िलाफ़ अनूठा अभियान
सोप ओपेरा आत्मजा
टीवी धारावाहिक के ज़रिए सामाजिक संदेश
भारत में कन्या भ्रूण हत्या कोई नई बात नहीं है और बहुत से राज्यों में स्थिति यह हो गई है कि वरों को वधुएँ नहीं मिल रही हैं.

पंजाब ऐसे राज्यों में से एक है और वहाँ औसतन दस लड़कों की तुलना में सिर्फ़ आठ लड़कियाँ हैं.

विशेषज्ञ इस हालत के लिए कन्या भ्रूण हत्या को ज़िम्मेदार बताते हैं, हालाँकि भारत में गर्भ में पलने वाले बच्चे के लिंग के बारे में जानकारी देना क़ानूनन अपराध है लेकिन फिर भी बहुत से डॉक्टर यह जानकारी दे देते हैं और जो परिवार कन्या नहीं चाहते वे पैदा होने से पहले ही उससे छुटकारा पा लेते हैं.

इस चिंताजनक हालत को देखते हुए एक ग़ैरसरकारी अंतरराष्ट्रीय संगठन प्लान ने भारत सरकार के साथ मिलकर इस बारे में लोगों को जागरूक बनाने का एक अनूठा तरीक़ा निकाला है.

आमतौर पर अगर सीधे तौर पर लोगों से इस बारे में बात की जाए तो वो अनसुनी कर देते हैं या फिर कोई दिलचस्पी ही नहीं लेते, लेकिन प्लान ने इस संदेश को एक सोप ओपेरा के ज़रिए फ़ैलाने का बीड़ा उठाया है.

इस सोप ओपेरा का नाम रखा गया है - आत्मजा यानी आत्मा से पैदा होने वाला और इसके लिए धन दे रहा है एक अन्य ग़ैरसरकारी संगठन 'एडवर्ड ग्रीन चैरिटी'.

संगठन के स्वयंसेवकों का मानना है कि सरकारी चेतावनी के तरीक़े से हटकर अगर मनोरंजक तरीक़े से लोगों को समझाने की कोशिश की जाए तो शायद उसका ज़्यादा असर होगा.

इस सोप ओपेरा में 13 भाग रखे गए हैं जिनमें भ्रूण परीक्षण, स्त्रियों की स्थिति, ग़रीबी, दहेज़ विरोधी क़ानून, महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा और अगर महिलाओं की संख्या बहुत कम हो जाती है तो उससे क्या-क्या परेशानियाँ और जटिलताएँ हो सकती हैं, उन मुद्दों को भी यह सोप ओपेरा छुएगा.

ममता

इस सोप ओपेरा की मुख्य चरित्र है - ममता. जब उसके मध्यमवर्गीय परिवार को पता चलता है कि उसके गर्भ में एक लड़की पल रही है तो समय से पहले ही ऑपरेशन करा दिया जाता है.

परिवार को उम्मीद होती है कि इस ऑपरेशन से बच्ची से छुटकारा मिल जाएगा लेकिन ममता डॉक्टर को रिश्वत देकर यह मनाने में कामयाब हो जाती है कि अगर बच्ची जीवित बच जाती है तो उसे किसी अनाथालय में ले जाकर छोड़ दें.

अल्ट्रासाउंड
अल्ट्रासाउंड के ज़रिए भ्रूण में पलने वाले बच्चे का पता चल जाता है

जब उसका पति दूसरी बार भ्रूण परीक्षण कराने के लिए कहता है तो वह उसे छोड़कर चली जाती है.

'प्लान' संगठन की कार्यकर्ता शेरॉन गाउल्ड्स कहती हैं कि इस मुद्दे को सोप ओपेरा शैली में उठाने से इसे ज़्यादा लोगों तक पहुँचाने में मदद मिलेगी.

1991 में 1000 पुरुषों के मुक़ाबले 945 महिलाएँ थीं जो 2001 में घटकर 927 रह गईं. पंजाब में यह स्थिति और चिंताजनक है जहाँ एक हज़ार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या सिर्फ़ 793 रह गई है.

प्लान इंडिया के पदाधिकारी समीर कौल का कहना है, "हम अगर इस अनुपात पर नज़र डालें तो पता चलता है कि लड़कों की चाहत में लाखों लड़कियों की हत्या भ्रूण में ही कर दी गई."

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने भी कन्या भ्रूण हत्या के ख़िलाफ़ अभियान में अंतरराष्ट्रीय संगठनों से मदद की अपील की है ताकि इस 'सामाजिक बुराई' को रोका जा सके.

कुछ लोगों ने इस प्रवृत्ति में बदलाव की उम्मीद भी जताई है. 25 वर्षीय एक गृहिणी हैं और एक बेटे की माँ हैं. वह कहती हैं, "काश मेरी सास भी इस सोप ओपेरा को देखें. बहरहाल अगर ऐसा कुछ मेरे साथ होता है तो मुझे अब खड़ा होने के लिए एक नैतिक सहारा मिल गया है."

एक लड़की और एक लड़के के पिता 31 वर्षीय संतोष कुमार सिंह भी कहते हैं कि इस सोप ओपेरा ने इस मुद्दे पर उनके रुख़ में बदलाव किया है.

"एक पति के रूप में कभी-कभी हम अपनी पत्नियों को ठीक तरह से नहीं समझ पाते. इस सोप ओपेरा से मुझे यह समझ में आया है कि कभी-भी अपनी पत्नी को इस तरह के कामों के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए."

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