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'मैंने अपनी बेटी को मार डाला' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ब्रिटेन में रहने वाली भारतीय मूल की कई महिलाएँ सामाजिक दबाव में आकर कन्या भ्रूण हत्या के लिए भारत जाती हैं क्योंकि ब्रिटेन में ऐसा कर पाना उनके लिए संभव नहीं है. भारत में हालांकि अजन्मे शिशु के लड़का या लड़की होने की जानकारी देना कानूनन अपराध है लेकिन संयुक्त राष्ट्र के आँकड़ों के मुताबिक़ भारत में हर वर्ष साढ़े सात लाख कन्याओं को पैदा होने से पहले ही मार दिया जाता है. ऐसी ही एक महिला मीना (पहचान छिपाने के लिए नाम बदल दिया गया है) से बीबीसी संवाददाता संजीव भुट्टो ने बात की. मीना की कहानी उसी की ज़ुबानी. मेरा जन्म यूके में ही हुआ है और मैं एक पंजाबी मध्यवर्गीय परिवार में पली-बढ़ी हूँ. मैं उम्र तीस वर्ष है और मेरी तीन बेटियाँ हैं, मेरे ऊपर बहुत दबाव रहा है कि मैं बेटा पैदा करने में नाकाम रही हूँ. लड़का पैदा करने का सामाजिक दबाव भारतीय परिवेश में बहुत अधिक होता है और यह दबाव ब्रिटेन में रहने वाली महिलाओं पर भी कम नहीं होता. यह दबाव हमेशा पति के परिवार वालों की ओर से होता है. जैसे ही कोई महिला गर्भवती होती है, आसपास के लोग कहने लगते हैं, देखना लड़का ही होगा, हम लड़के पैदा होने पर खुशियाँ मनाएँगे लेकिन अगर लड़की पैदा हो जाए तो सब निराश हो जाते हैं. मन मसोस कर कहते हैं अच्छा चलो कोई बात नहीं.
आपको अपनी लड़की पर नाज़ होता है लेकिन लोग उससे ऐसे पेश आते हैं मानो वह किसी दुर्घटना का परिणाम हो, यह देखकर दिल बहुत दुखता है. जब मैं चौथी बार गर्भवती हुई तो मैंने और मेरे पति ने भारत जाकर पता करने का फ़ैसला किया है कि गर्भ में लड़का है या लड़की. हमें चिंता हो रही थी कि अगर इस बार लड़की हुई तो क्या होगा, यह परिवार के लिए बहुत ज़रूरी था और आर्थिक तौर पर भी हम चार लड़कियों का बोझ नहीं उठा सकते थे. मैंने इंटरनेट पर भारत के डॉक्टरों को खोजा, जब हमने उन्हें बताया कि हमारी तीन लड़कियाँ हैं और हम इस बार होने वाली संतान के बारे में पता करना चाहते हैं तो उन्होंने हमारी चिंता को समझा. दिल्ली में टेस्ट करवाने पर पता चल गया कि इस बार भी लड़की है और हमने उसे गिराने का फ़ैसला कर लिया. व्यक्तिगत तौर पर यह मेरे लिए बहुत ही दुखदायी फ़ैसला था, मैं नहीं चाहती थी कि मेरी बाक़ी बच्चियों को पता चले, मैं बहुत दुखी थे लेकिन मेरे पति काफ़ी संतुष्ट दिख रहे थे. मुझे पता था कि मैं सही नहीं कर रही हूँ इसलिए मुझे बुरा लग रहा था, सब कुछ बहुत ही बुरा था. ऐसा करने वाली मैं अकेली नहीं हूँ, कई महिलाओं ने ऐसा किया है लेकिन कोई इस बारे में बात नहीं करना चाहता.
मैं आइंदा ऐसा नहीं करूँगी, लड़कियों की शादी हो जाएगी वे जिंदगी भर तो मेरे साथ नहीं रहेंगी, पता नहीं कहीं उन्हें भी आगे चलकर मेरी तरह लड़का पैदा करने का दबाव न झेलना पड़े. मेरा जीना बहुत मुश्किल हो गया जब मेरी देवरानी ने लड़के को जन्म दिया, पंजाबी परिवारों में आपका मान-सम्मान इस बात से भी तय होता कि आप कितने लड़कों की माँ हैं. यही वजह है कि मुझ पर दबाव और अधिक बढ़ गया, लोग कहने लगे कि उसके लड़का हो सकता है तो मैं क्यों लड़का पैदा नहीं कर सकती. ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ परिवार वाले ही दबाव डालते हैं बल्कि मेरी सहेलियों का भी यही रवैया है. मुझे बहुत अफ़सोस है, मुझे पता नहीं कि मेरी उस लड़की के नसीब में मेरा साथ नहीं था, मेरे पास कोई रास्ता नहीं बचा था. उस बात को एक साल हो गया लेकिन मैं अब भी सोचती हूँ कि अगर वह लड़की आज होती तो कितनी बड़ी होती, अपनी बहनों के साथ किस तरह खेलती. अगर हम अगली बार बच्चे के बारे में सोचेंगे तो मुझे एक बार फिर इसी रास्ते से गुज़रना होगा, यह सोचकर मेरा दिल घबराने लगता है. | इससे जुड़ी ख़बरें राजस्थान में 28 डॉक्टरों पर पाबंदी16 मई, 2007 | भारत और पड़ोस अस्पताल या अजन्मे बच्चों का मुर्दाघर!19 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस कन्या भ्रूणहत्या: सात डॉक्टर निलंबित14 जून, 2006 | भारत और पड़ोस भ्रूण हत्या के ख़िलाफ़ आया एक गाँव 15 मई, 2006 | भारत और पड़ोस भ्रूण हत्या मामले में पहली बार जेल29 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस भ्रूण हत्या संबंधी अध्ययन पर सवाल11 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस 'भारत में एक करोड़ कन्या भ्रूण हत्याएँ'09 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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