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'भारत में एक करोड़ कन्या भ्रूण हत्याएँ' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक अध्ययन के बाद ये आशंका जताई गई है कि पिछले बीस सालों में भारत में जन्म से पहले ही क़रीब एक करोड़ लड़कियों की भ्रूण हत्या हुई होगी क्योंकि ज़्यादातर माता-पिता अब भी भी लड़के के ही इच्छुक होते हैं. चिकित्सा पत्रिका लांसेट की इस रिपोर्ट के मुताबिक़, जो महिलाएँ पहले ही लड़की को जन्म दे चुकी हैं, वे अल्ट्रासाउंड का इस्तेमाल दोबारा लड़की न होने के लिए करती हैं. इससे पहले भी भारत में लिंग असंतुलन के बारे में एक रिपोर्ट आई थी और भ्रूण हत्या पर ये ताज़ा अध्ययन उसी रिपोर्ट को बल देता है. लेंसेट पत्रिका के लिए किए गए इस अध्ययन के कनाडा और भारत में शोधकर्ताओं का कहना है कि लड़कों के लिए माता-पिता की चाह होने की वजह से कन्या भ्रूण हत्याओं के इन मामलों से हर साल लगभग पाँच लाख लड़कियाँ जीवन मिलने से पहले ही मौत के मुँह में चली जाती हैं. यह अध्ययन 1998 में 11 लाख घरों के एक सर्वेक्षण पर आधारित है. अध्ययनकर्ताओं के मुताबिक़ अगर कोई महिला एक बार लड़की को जन्म देती है, तो अगले बच्चे के लिए लिंग अनुपात होता है -1000 लड़कों के मुकाबले 759 लड़कियाँ. जबकि अगर पहले से ही घर में दो लड़कियाँ हों तो उसके बाद लिंग अनुपात और भी असंतुलित हो जाता है. शोधकर्ताओं ने कहा है कि लड़कियों की भ्रूण हत्या का चलन पढ़ी लिखी महिलाओं में ज़्यादा है और धर्म से भी इस पर कोई असर नहीं पड़ा. अक्तूबर में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भ्रूण हत्या और शिशु हत्या के चलते भारत में लिंग असंतुलन लगातार बढ़ता जा रहा है जिसके गंभीर सामाजिक परिणाम हो सकते हैं. अनुपात ज़्यादातर देशों महिलाओं की संख्या औसतन पुरुषों से ज़्यादा होती है लेकिन 2001 में किए गए एक अध्ययन में पता चलता है कि भारत में एक हज़ार लड़कों के मुक़ाबले लड़कियों की संख्या 933 ही है.
लैंसेट पत्रिका के लिए ताज़ा अध्ययन टोरंटो में सेंट माइकल हॉस्पिटल में प्रभात झा और चंडीगढ़ में पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल रिसर्च के राजेश कुमार ने मिलकर किया. इन्होंने अध्ययन में पाया कि अगर पहले से लड़कियाँ हों तो माता-पिता अगली औलाद के रूप में लड़के को पसंद करते हैं और यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है. हालाँकि अगर पहले से लड़का है तो अगली औलाद के रूप में लड़की चाहने वालों की संख्या बराबर नज़र आती है. प्रभात झा ने कहा कि लड़का और लड़की में इस भेदभाव की प्रवृत्ति से हर साल लगभग पाँच लाख लड़कियों की मौत हो जाती है. प्रभात झा के अनुसार, "अगर इस प्रवृत्ति का विश्लेषण किया जाए तो अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि पिछले बीस साल में एक करोड़ कन्या भ्रूण की हत्या हो गई होगी." भारत में कन्या भ्रूण की हत्या में सामाजिक-आर्थिक पहलू ज़्यादा ज़िम्मेदार होता है. भारत में परंपरागत रूप से लड़की को हीन समझा गया है और उसे ज़िम्मेदारी समझा गया है. कन्या भ्रूण की हत्या के ख़िलाफ़ अभियान चलाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश का कहना है, "इससे अलग कोई और हिंसक गतिविधि इतनी दर्दनाक नहीं है और यह बहुत शर्मनाक भी है." | इससे जुड़ी ख़बरें 'पंजाब की जनता कन्या भ्रूण हत्या रोके'23 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस इकलौती लड़की होने पर एक लाख10 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस 'लड़की करेला, लड़का लड्डू'14 जून, 2004 | भारत और पड़ोस भारत में कन्या भ्रूण हत्या:एक अभिशाप28 अप्रैल, 2004 | भारत और पड़ोस इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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