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बुधवार, 11 जनवरी, 2006 को 09:55 GMT तक के समाचार
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भ्रूण हत्या संबंधी अध्ययन पर सवाल
महिलाएँ
भारतीय मेडिकल एसोसिएशन का दावा है कि लिंग निर्धारण में कमी आई है
भारतीय डॉक्टरों की प्रमुख संस्था इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने ब्रिटिश चिकित्सा पत्रिका लांसेट की ख़बर का खंडन किया है.

इसमें कहा गया था कि पिछले 20 वर्षों में भारत में जन्म से पहले ही क़रीब एक करोड़ लड़कियों की भ्रूण हत्या हुई होगी.

लांसेट की इस रिपोर्ट के मुताबिक़, जो महिलाएँ पहले ही लड़की को जन्म दे चुकी हैं, वे अल्ट्रासाउंड का इस्तेमाल दोबारा लड़की न होने के लिए करती हैं.

लेकिन इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के प्रवक्ता डॉक्टर नरेंद्र सैनी ने कहा कि इस प्रचलन में सुप्रीम कोर्ट के 2001 के आदेश और उसके बाद की गई कार्रवाई के बाद भारी कमी आई है.

उनका कहना था कि इस अध्ययन में पुरानी बातों को नई के साथ मिलाया गया है.

हालांकि वो इस बात को स्वीकार करते हैं कि लिंग निर्धारण को लेकर जाँच की जाती थी लेकिन वो इस बात का खंडन करते हैं कि यह अब भी प्रचलित है.

हालांकि भारत सरकार की ओर अभी इस मामले में कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

रिपोर्ट

इस अध्ययन के शोधकर्ताओं का कहना है कि लड़कों के लिए माता-पिता की चाह होने की वजह से कन्या भ्रूण हत्याओं के इन मामलों से हर साल लगभग पाँच लाख लड़कियाँ जीवन मिलने से पहले ही मौत के मुँह में चली जाती हैं.

 इस प्रचलन में सुप्रीम कोर्ट के 2001 के आदेश और उसके बाद की गई कार्रवाई के बाद भारी कमी आई है.
डॉक्टर नरेंद सैनी, प्रवक्ता आईएमए

यह अध्ययन 1998 में 11 लाख घरों के एक सर्वेक्षण पर आधारित है.

शोधकर्ताओं ने कहा है कि लड़कियों की भ्रूण हत्या का चलन पढ़ी लिखी महिलाओं में ज़्यादा है और धर्म से भी इस पर कोई असर नहीं पड़ा.

अक्तूबर में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भ्रूण हत्या और शिशु हत्या के कारण भारत में लिंग असंतुलन लगातार बढ़ता जा रहा है जिसके गंभीर सामाजिक परिणाम हो सकते हैं.

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