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गांधीजी के पत्र की नीलामी रोकी गई | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ऐतिहासिक कलाकृतियों और दुर्लभ दस्तावेज़ों की नीलामी करने वाली कंपनी क्रिस्टीज़ ने घोषणा की है कि गांधी जी के पत्र की नीलामी नहीं की जाएगी. पहले तय कार्यक्रम के अनुसार गांधी जी के हस्तलिखित पत्र की नीलामी मंगलवार को होनी थी लेकिन क्रिस्टीज़ ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करके इसे रोकने की घोषणा की है. यह पत्र गांधी जी ने अपनी हत्या के 19 दिन पहले लिखा था. क्रिस्टीज़ ने कहा है कि इस पत्र की नीलामी इसलिए रोकी गई है ताकि "भारत सरकार इसे हासिल कर सके." भारत सरकार पहले ही अपनी मंशा स्पष्ट कर चुकी है कि वह इस पत्र को राष्ट्रीय धरोहर मानती है और इसे हासिल करना चाहती है. क्रिस्टीज़ के एशियन आर्ट विभाग के निदेशक डॉक्टर अमीन जाफ़र ने कहा, "क्रिस्टीज़ को इस बात की ख़ुशी है कि उसने भारत की अमूल्य धरोहर को वापस दिलाने का समझौता कराने में अच्छी भूमिका निभाई." एल्बिन श्राम कलेक्शन के मालिक, क्रिस्टीज़ और भारत सरकार के बीच क्या समझौता हुआ है इसकी कोई जानकारी नहीं मिल सकी है. यह भी नहीं बताया गया है कि इस चिट्ठी को हासिल करने के लिए भारत सरकार को कितनी रक़म अदा करनी होगी. लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग की ओर से जारी किए गए बयान में कहा गया है कि "भारत सरकार इस बात से ख़ुश है कि नीलामी रोक दी गई है और अब इस पत्र को जल्दी हासिल किए जाने की दिशा में काम हो रहा है." क्रिस्टीज़ गांधी जी के पत्र को छोड़कर अनेक हस्तलिखित पत्रों की नीलामी कर रही है जिनमें सिगमंड फ्रायड, विंस्टन चर्चिल, चार्ल्स डिकिंस, आइजैक न्यूटन जैसी हस्तियों के लिखे पत्र शामिल हैं. एल्बिन श्राम चेक गणराज्य में 1926 में पैदा हुए थे, वे ऑस्ट्रियाई माता-पिता की संतान थे और स्विट्ज़रलैंड में रहते हुए उन्होंने इन चिट्ठियों का संग्रह किया था. एक अनुमान के मुताबिक़ गांधी जी की इस चिट्ठी की बोली नौ हज़ार से 12 हज़ार पाउंड (लगभग 10 लाख रुपए) के बीच लगाई जा सकती थी. |
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