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शरणार्थियों की मुश्किलें बढ़ी हैं | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी - यूएनएचसीआर ने सावधान किया है कि अनेक देशों में आतंकवादी हमलों के डर की वजह से वहाँ शरण लेने वालों के लिए हालात बहुत मुश्किल होते जा रहे हैं. यूएनएचसीआर के अध्यक्ष एंटोनियो गुटरेस ने बुधवार को विश्व शरणार्थी दिवस के मौक़े पर कहा कि कुछ देशों ने अपने आव्रजन नियम इतने कड़े कर दिए हैं जिनके दायरे से शरणार्थियों को बाहर ही कर दिया गया है. एंटोनिया गुटरेस ने बीबीसी से कहा कि शरण की आस रखने वाले लोग आतंकवादी नहीं हैं बल्कि वे ख़ुद आतंकवाद के प्रभावित लोग हैं. पिछले क़रीब पाँच वर्षों के दौरान किसी अन्य देश में शरण लेने वालों की संख्या में कमी देखी गई थी लेकिन इराक़ और सोमालिया में हिंसक हालात की वजह से शरणार्थियों की संख्या में फिर से तेज़ी दर्ज की गई है. संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि हिंसा या प्रताड़ना के डर से लगभग साढ़े चार करोड़ लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा है, उनमें से कुछ को देश छोड़कर विदेशों का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा है और बहुत से लोग ख़ुद अपने ही देश में शरणार्थी बनने के लिए मजबूर हैं. संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी उच्चायुक्त एंटोनियो गुटरेस ने कहा, "अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस समस्या की तरफ़ समुचित ध्यान नहीं दे रहा है और लोगों को समुचित सहायता भी नहीं दे रहा है." 'वापसी' हालाँकि संयुक्त राष्ट्र ने यह भी कहा है कि मुश्किल नज़र आने वाले आँकड़ों के बीच ही आशा की किरण भी नज़र आती है. सूडान, अफ़ग़ानिस्तान और कोंगो गणराज्य में लाखों ऐसे लोग वापस आए हैं जिन्हें देश छोड़ना पड़ा था. एंटोनियो गुटरेस ने विश्व शरणार्थी दिवस पर सूडान का दौरा किया. उन्होंने कहा कि लोग काफ़ी हिम्मत दिखा रहे हैं और पड़ोसी देशों से वापस लौट रहे हैं. उनमें अपना घर फिर से बनाने का हौसला नज़र आ रहा है. एंटोनिया गुटरेस ने कहा कि पश्चिमी देशों में शरणार्थी समस्या के बारे में मिला-जुला रुख़ रहा है, "कुछ ऐसे भी देश हैं जिनमें 11 सितंबर 2001 के हमलों के बाद से शरणार्थियों के बारे में चिंता बढ़ी है, मेरा ख़याल है कि यह कहना महत्वपूर्ण है कि और हमें इसे दोहराना चाहिए कि शरणार्थी लोग आतंकवादी नहीं हैं, बल्कि वे तो ख़ुद ही आतंकवाद के प्रभावित लोग हैं." उन्होंने कहा, "इसके उलट कुछ देशों में शरणार्थियों को सुरक्षा और संरक्षण दिए जाने के मामले में काफ़ी लचीला रुख़ देखने को मिला है." एंटोनिया गुटरेस ने ख़ासतौर से स्वीडन और नीदरलैंड का नाम लेते हुए कहा कि इन देशों ने इराक़ी शरणार्थियों के दुख-दर्द के बारे में काफ़ी सकारात्मक रुख़ दिखाया है. ग़ौरतलब है कि इराक़ में युद्ध और उसके बाद भड़की हिंसा के बाद से लगभग चालीस लाख लोग बेघर हुए हैं जिनमें से लगभग आधों को तो देश ही छोड़ना पड़ा है. | इससे जुड़ी ख़बरें लेबनान में हिंसा के कारण भगदड़22 मई, 2007 | पहला पन्ना इराक़ी शरणार्थी समस्या पर सम्मेलन17 अप्रैल, 2007 | पहला पन्ना 'इराक़ी शरणार्थियों की अनदेखी'20 मार्च, 2007 | पहला पन्ना इराक़ी शरणार्थी योजना का स्वागत15 फ़रवरी, 2007 | पहला पन्ना हर आठ में से एक इराक़ी विस्थापित09 जनवरी, 2007 | पहला पन्ना दुनिया में शरणार्थियों की हालत चिंताजनक19 अप्रैल, 2006 | पहला पन्ना ग़ज़ा में इसराइल ने घर गिराए25 सितंबर, 2004 | पहला पन्ना सबसे ज़्यादा शरणार्थी पाकिस्तान में 17 जून, 2004 | पहला पन्ना इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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