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मंगलवार, 20 मार्च, 2007 को 15:54 GMT तक के समाचार
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'इराक़ी शरणार्थियों की अनदेखी'
शरणार्थियों में बड़ी संख्या महिलाओं और बच्चों की है
संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थियों से संबंधित संस्था (यूएनएचसीआर) का कहना है इराक़ की लड़ाई के मानवीय पहलू को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है.

यूएनएचसीआर के सामने एक बडी़ चुनौती है इराक़ से निकलकर सीरिया और जॉर्डन जैसे पड़ोसी देशों में शरण लेने वाले लोगों की मदद करने की.

यूएनएचसीआर के प्रवक्ता ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से मदद की ज़रूरत है ताकि इन लोगों को खाना, पानी, स्वास्थ्य सेवाएँ और शिक्षा मुहैया कराया जा सके.

संकट
 साफ़ तौर पर इन लोगों की हर क्षेत्र में सहायता की ज़रूरत है, अगर वहाँ हिंसा जारी रहती है तो यह संकट और गहराता जाएगा और बड़ी संख्या में लोग पलायन करेंगे
यूएनएचसीआर के प्रवक्ता

इस समय सीरिया में 12 लाख और जॉर्डन में आठ लाख इराक़ी शरणार्थी हैं, सीरिया ने पिछले ही दिनों गुहार लगाई थी कि इस समस्या से निबटने में उसकी मदद की जाए.

यूएनएचसीआर के प्रवक्ता पीटर केसलर ने कहा, "इस लड़ाई की मानवीय क़ीमत को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया जा रहा है, लगभग 20 लाख लोग इस लड़ाई की वजह से बेघर हो गए हैं."

प्रवक्ता ने कहा कि इन शरणार्थियों को मदद की बहुत ज़रूरत है और इनमें से एक-चौथाई बच्चे हैं जिन्हें शिक्षा की भी ज़रूरत है.

पीटर केसलर ने कहा कि इन लोगों की सहायता के लिए अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को सामने आना चाहिए, इन लोगों को खाद्यान्न की बहुत ज़रूरत है.

उन्होंने कहा, "साफ़ तौर पर इन लोगों की हर क्षेत्र में सहायता की ज़रूरत है, अगर वहाँ हिंसा जारी रहती है तो यह संकट और गहराता जाएगा और बड़ी संख्या में लोग पलायन करेंगे."

विस्थापित

इन 20 लाख शरणार्थियों के अलावा, इराक़ के भीतर भी इतनी ही तादाद में लोग हैं जो लड़ाई की वजह से विस्थापित हो गए हैं.

बेसहारा लोगों की हालत बुरी है

शिया और सुन्नी संघर्ष बढ़ने की वजह से मिश्रित आबादी वाले इलाक़ों से दोनों समुदायों के लोगों का बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है.

बहुत बड़ी संख्या में लोग उत्तरी कुर्द इलाक़े में जा रहे हैं जहाँ क़ानून-व्यवस्था की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है.

बीबीसी संवाददाता जिल मकगिवरिंग का कहना है कि इराक़ में हिंसा में मारे गए ज़्यादातर लोग पुरूष हैं इसलिए शरणार्थियों में बड़ी तादाद महिलाओं और बच्चों की है जिनका सहारा छिन गया है, ऐसे में महिलाओं को रोज़ी-रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है जो आसान नहीं है.

इराक़ में सद्दाम हुसैन के ज़माने में सार्वजनिक राशन वितरण प्रणाली थी जो अब छिन्न-भिन्न हो चुकी है इसलिए विधवाओं और अनाथ बच्चों का जीवन बहुत कठिन हो गया है.

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