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बुधवार, 23 अगस्त, 2006 को 09:28 GMT तक के समाचार
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चीन, रूस ने बातचीत की हिमायत की
परमाणु संयंत्र
यूरेनियम संवर्द्धन रोकने के लिए ईरान के पास 31 अगस्त तक का समय है
चीन और रूस ने कहा है कि ईरान के परमाणु मुद्दे पर बने तनाव को कम करने का एक मात्र रास्ता बातचीत ही हो सकता है.

ग़ौरतलब है कि ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम के मुद्दे पर बातचीत की पेशकश की है जिसके बाद रूस और चीन का यह बयान आया है.

चीन ने बुधवार को उम्मीद जताई है कि सभी पक्ष संयम और शांति से काम लेंगे और इस तरह का लचीलापन दिखाएंगे कि बातचीत फिर से शुरू हो सके.

ईरान ने अपने परमाणु मुद्दे पर छह बड़े देशों के साथ फिर से बातचीत शुरू करने की पेशकश की है. इससे पहले संयुक्त राष्ट्र ने ईरान से कहा था कि वह यूरेनियम संवर्धन का अपना कार्यक्रम बंद कर दे और उसी के जवाब में ईरान ने बातचीत फिर से शुरू करने की पेशकश की है.

ईरान के पास अब सितंबह 2006 तक का समय है - या तो वह अपना यूरेनियम संवर्धन बंद कर दे या फिर उसके ख़िलाफ़ प्रतिबंध लगा दिए जाएंगे.

इस तरह की आशंकाएँ व्यक्त की गई हैं कि ईरान परमाणु बम बनाने की तरफ़ बढ़ रहा है.

जबकि ईरान इस तरह के आरोपों का खंडन करते हुए कहता है कि वह कोई परमाणु बम नहीं बना रहा है बल्कि असैनिक उद्देश्यों के लिए परमाणु प्रोद्योगिकी विकसित करने का अधिकार है.

अमरीका, ब्रिटेन, रूस, चीन, फ्रांस और जर्मनी ने ईरान को यूरेनियम संवर्धन स्थगित करने के बदले रियायतों का एक पैकेज देने की घोषणा की है जिसमें असैनिक परमाणु तकनीक में सहायता देना भी शामिल है.

परमाणु मुद्दे पर ईरान के प्रमुख वार्ताकार अली लरीजानी ने मंगलवार को कहा कि उनका देश इस मुद्दे पर 'गंभीर बातचीत' के लिए तैयार है लेकिन बातचीत की इस पेशकश पर उन्होंने और ज़्यादा विवरण नहीं दिया.

'बातचीत से हल'

चीन के विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने बुधवार को कहा कि ईरान की पेशकश का 'सावधानी से अध्ययन' किया जा रहा है.

ईरान के परमाणु वार्ताकार अली लरीजानी
लरीजानी ने 'गंभीर बातचीत' की पेशकश की है

चीन के विदेश मंत्रालय ने एक वक्तव्य जारी करके कहा है, "चीन ने हमेशा यह माना है कि ईरान के परमाणु मुद्दे का कूटनीतिक स्तर की बातचीत के ज़रिए हल निकालना ही सबसे अच्छा विकल्प हो सकता है और यह सभी संबद्ध पक्षों के हित में भी है."

रूस ने भी चीन के इस रुख़ का समर्थन करते हुए ईरान के परमाणु मुद्दे का हल बातचीत के ज़रिए ही निकाले जाने की हिमायत की है.

रूस की इंटरफैक्स समाचार एजेंसी ने देश के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के हवाले से कहा है कि रूस "ईरान के परमाणु मु्द्दे का राजनीतिक हल बातचीत के ज़रिए ही निकाले जाने की हिमायत करता रहेगा."

प्रतिबंधों का ख़तरा

बीबीसी के विश्व मामलों के संवाददाता पॉल रेनॉल्ड्स का कहना है कि ईरान के परमाणु वार्ताकार अली लरीजानी ने हालाँकि "गंभीर बातचीत" बातचीत फिर से शुरू करने की पेशकश की है लेकिन सुरक्षा परिषद को यह जानने की ज़रूरत है कि ईरान क्या अपना यूरेनियम संवर्धन का कार्यक्रम 31 अगस्त की समय सीमा के भीतर स्थगित करने के लिए तैयार है या नहीं.

बीबीसी संवाददाता के अनुसार अगर ईरान ऐसा नहीं करता है या ऐसा करने के कोई संकेत नहीं देता है तो अमरीका और उसके सहयोगी देश इसे 'नहीं' समझेंगे और ईरान के ख़िलाफ़ प्रतिबंधों के मामले को आगे बढ़ाएंगे, हालाँकि इसके लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक नए फ़ैसले की ज़रूरत होगी.

संवर्धित यूरेनिमय परमाणु संयंत्रों में ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है लेकिन संवर्धित यूरेनियम की बहुत ही उच्च क्वालिटी की क़िस्म को परमाणु बम बनाने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

ईरान का कहना है कि वह परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करने वाला देश है और इस नाते उसे परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम चलाने का अधिकार है और अगर वह ऐसा कर रहा है तो उसने कोई नियम या क़ानून नहीं तोड़ा है.

लेकिन पश्चिमी देशों का आरोप है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम के बारे में कुछ छुपा रहा है और अमरीका ने इस मुद्दे पर ईरान के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई करने के विकल्प से भी इनकार नहीं किया है.

ईरान का प्रभाव

इस बीच ब्रिटेन में सामरिक मामलों पर अध्ययन करने वाले एक संस्थान चैटम हाउस ने एक रिपोर्ट में कहा है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम मुद्दे पर विवाद में अपनी मज़बूत स्थिति बनाए रख सकता है क्योंकि मध्य पूर्व में उसका ख़ासा दबदबा है.

ईरान का विश्वास...
 ईरान से टकराव लेने वाला अमरीकी नेतृत्व वाला एजेंडा इस बात से ख़ासा प्रभावित हुआ है कि ईरान मध्य पूर्व क्षेत्र में विश्वास से भरपूर नज़र आता है.
चैटम रिपोर्ट

चैटम हाउस की रिपोर्ट का कहना है, "ईरान से टकराव लेने वाला अमरीकी नेतृत्व वाला एजेंडा इस बात से ख़ासा प्रभावित हुआ है कि ईरान मध्य पूर्व क्षेत्र में विश्वास से भरपूर नज़र आता है."

रिपोर्ट का तर्क है कि अमरीका के नेतृत्व में चल रही "आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई" में मध्य पूर्व में ईरान को सबसे ज़्यादा फ़ायदा होने के संकेत नज़र आ रहे हैं.

अमरीका के नेतृत्व में हाल के दो युद्धों में ईरान की क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी सरकारें उखाड़ फेंकी गई हैं और वे हैं अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान सरकार और इराक़ में सद्दाम हुसैन की सरकार.

चैटम हाउस की रिपोर्ट का कहना है कि अमरीका दोनों ही देशों में प्रासंगिक और टिकाऊ राजनीतिक ढाँचा नहीं मुहैया कराया पाया है.

रिपोर्ट कहती है कि इराक़ में अमरीका से ज़्यादा ईरान का प्रभाव है और अफ़ग़ानिस्तान में भी ईरान की "महत्वपूर्ण मौजूदगी" है.

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