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शुक्रवार, 07 जुलाई, 2006 को 10:08 GMT तक के समाचार
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लंदन एक ऐसे घर में बदल गया था...

लंदन स्टेशन
उस रोज़ बुश हाउस आने के लिए जैसे ही मैने उत्तरी लंदन के पामर्स ग्रीन स्टेशन पर क़दम रखा, एक घोषणा होने लगी. “लंदन की भूमिगत रेल सेवा बंद कर दी गई है कारणों की जाँच चल रही है.

यात्रियों से निवेदन है कि यात्रा के वैकल्पिक साधनों का प्रयोग करें.” सुनते ही स्टेशन पर खड़े यात्रियों के चेहरों पर हैरत और परेशानी की रेखाएँ उभर आईं थीं. सुबह के सवा नौ बजने वाले थे. लोग आपस में खुसफुसाने में लगे ही थे कि स्टेशन पर गाड़ी आ गई. गाड़ी में भीड़ थी लेकिन जैसे-तैसे हम सभी उसमें घुस गए.

अगला स्टेशन आने से पहले ही गाड़ी में फिर से एक घोषणा हुई कि “केंद्रीय लंदन की परिवहन सेवाएँ बुरी तरह प्रभावित हुई हैं, यात्रियों से निवेदन है कि अगर संभव हो तो घरों को लौटने का प्रयास करें.” गाड़ी में अटकलबाज़ियाँ ज़ोर-शोर से शुरू हो गईं. सभी के मोबाइल फ़ोन किसी ऑर्केस्ट्रॉ की तरह बज रहे थे. कोई कह रहा था कि भारी शॉर्ट सर्किट हो गया है, कोई समूची सिग्नल सेवा के बैठ जाने की कहानी कह रहा था तो कोई लंदन की ख़स्ता हाल परिवहन व्यवस्था को कोस रहा था.

इसी तरह की घोणणाओं और अफ़वाहों के बीच रुकते-रेंगते हमारी गाड़ी क़रीब आधे घंटे के बाद आधे रास्ते पर पड़ने वाले बड़े स्टेशन फ़िंसबरी पार्क पहुँची और वहीं पर रोक दी गई. स्टेशन पर चिंतित और हैरान लोगों की बाढ़ थी. जैसे-तैसे बाहर निकलने पर पता चला कि कुछ धमाके हुए हैं, लेकिन लोग घबराने की जगह हैरान नज़र आ रहे थे. सभी एक दूसरे की परेशानियाँ बाँटने और सलाह देने में लग गए.

हम ने स्टेशन से बाहर सड़क पर आकर बस से जाने का फ़ैसला किया. मुझे बीबीसी तमिल, बंगाली और अरबी सेवा के कुछ साथी भी इसी भीड़ से मिल गए थे. सभी को घटना के बारे में जानने और संभव हो तो रिपोर्ट करने की उत्सुकता थी. हमारी दस-बारह लोगों की टोली ने वापिस घर जाने की बजाय दफ़्तरों में फ़ोन किए, केंद्रीय लंदन की ओर जाती बस पकड़ी और चल दिए.

अंत में कैमडन टाउन तक आकर परिवहन के सभी साधन ठप्प हो गए. हमें लगभग चार किलोमीटर पैदल चलकर आना पड़ा. कुल मिलाकर तीन घंटे बाद हम बुश हाउस पहुँचे. लेकिन अंत तक आते-आते यह यात्रा लंदन के लोगों की हिम्मत, मानवीय संवेदना और युयुत्सा की सजीव रिपोर्ट में बदल गई थी. सड़कों पर लोग एक-दूसरे की ज़रूरतों और परेशानियों के बारे में पूछ रहे थे. अपने अनुभवों को बाँट रहे थे और रास्ते में पड़ने वाली दुकानों, रेस्तराओं और शराबख़ानों में जा-जा कर टेलीविज़न पर आ रही पल-पल की जानकारी ले रहे थे. लंदन किसी ऐसे घर में बदल गया था जिसपर किसी अनजाने दुश्मन ने हमला कर दिया हो.

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