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मुजरा और क़व्वाली का चलन कैसे हुआ? | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मुजरा और क़व्वाली में क्या अंतर है. ग्राम काशी बाड़ी, किशनगंज, बिहार से हसन जावेद और सीमा बेगम ने ये सवाल पूछा है. क़व्वाली शब्द बना है अरबी भाषा के शब्द क़ौल से जिसका मतलब है उक्ति. क़व्वाल वो है जो अल्लाह और उसके पैग़ंबरों की प्रशंसा के गीत गाता है. क़व्वाली की परम्परा सूफ़ी पंथ से जुड़ी है. सूफ़ी पंथ और मुख्यधारा के इस्लाम में अंतर ये है कि मुख्यधारा के मुसलमान ये मानते हैं कि क़यामत के दिन ही अल्लाह तक पहुँचा जा सकता है जबकि सूफ़ी पंथ की सोच ये है कि अल्लाह तक जीवन के दौरान भी पहुँच सकते हैं. संगीत के अध्यात्मिक असर को सूफ़ीवाद में स्वीकार किया गया और भारतीय उपमहाद्वीप में क़व्वाली को लोकप्रिय बनाने का श्रेय जाता है ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को. जहाँ तक मुजरे का सवाल है इसका अर्थ था प्रस्तुति. नृत्य संगीत की प्रस्तुति को मुजरा कहा जाता था. पुराने ज़माने में मुजरा करने वालों या वालियों को राजाओं और समाज के संभ्रांत वर्ग का समर्थन प्राप्त था लेकिन ब्रिटिश राज में ये समाप्त हो गया. फलस्वरूप बहुत से कलाकारों को जीवन यापन के लिए और रास्ते अपनाने पर मजबूर होना पडा. दुर्गापुर, अंगुल, उड़ीसा से ज्योतिरंजन बिस्वाल पूछते हैं कि पाबलो नरूदा का असली नाम क्या था? दक्षिण अमरीकी देश चिली के सुप्रसिद्ध लेखक पाबलो नरूदा का नाम था नैफ़्तली रिकार्दो रैयस बास्वाल्तो. इन्होंने चैकोस्लोवाकिया के जाने माने कवि जैन नरूदा के नाम पर अपना उपनाम रखा था. उन्हें 1971 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था. आँसू गैस कैसे बनती है और इसका शरीर पर कोई नकारात्मक असर तो नहीं पड़ता. सतबीटा, अरड़िया बिहार से मोहम्मद इशराक. आँसू गैस तीन प्रकार की होती है. सीएस, सीएन और पैपर स्प्रे. आमतौर पर क़ानून और व्यवस्था क़ायम करने के लिए पुलिस बल सीएस या सीएन का इस्तेमाल करते हैं. ये दोनों हमारी आंखों, नाक, मुँह और फेफड़ों की झिल्लियों को उत्तेजित करती हैं जिसकी वजह से आंसू निकलने लगते हैं और हम छींकने और खांसने पर मजबूर कर देते हैं.
सीएस गैस सीएन की अपेक्षा अधिक तेज़ होती है लेकिन उसका असर जल्दी चला जाता है. जहाँ तक पैपर स्प्रे गैस का सवाल है उसका प्रयोग आमतौर पर आत्मरक्षा के लिए किया जाता है. लेकिन इसे हमला करने वाले के ऊपर सीधे छोड़ना पड़ता है और इसका हमलावर की आँख, नाक और मुँह पर गहरा असर होता है. गोलपहाड़ी जमशेदपुर से जंगबहादुर सिंह और उमा सिंह ने पूछा है कि आई वी एफ़ क्या है और टैस्ट ट्यूब बेबी तकनीक और इसमें क्या अंतर है. कई बार किन्ही कारणों से महिला गर्भ धारण नहीं कर पाती. या तो उसकी डिम्बवाही नलिका में अवरोध होता है या फिर उसके डिम्ब ठीक से नहीं उगते. कभी पुरुष के शुक्राणु कम होते हैं या होते ही नहीं. ऐसी स्थिति में महिला को इंजेक्शन देकर उसके डिम्ब ज़्यादा पैदा किए जाते हैं. जब वो पक जाते हैं तो उन्हें नीचे से सुंई डालकर निकाल लिया जाता है. फिर उन्हें एक टैस्ट ट्यूब में पुरुष के शुक्राणुओँ के साथ मिलाया जाता है. उनका उर्वरण किया जाता है और तीन चार दिन के बाद इस भ्रूण को महिला के गर्भ में डाल दिया जाता है. इसतरह महिला गर्भ धारण कर लेती है और नौ महीने बाद सामान्य ढंग से बच्चे को जन्म देती है. आई वी एफ़ को आम भाषा में टैस्ट ट्यूब तकनीक कहा जाता है. लेकिन टैस्ट ट्यूब तकनीक में कुछ और विधियाँ भी होती हैं. जैनेरिक दवाएँ किन्हें कहते हैं. इनकी ख़ूबियाँ और ख़ामियाँ बताइए. क्या इनके प्रयोग से अतिरिक्त साइड इफ़ैक्ट्स का ख़तरा रहता है. ग्राम भगवानपुर, मधुबनी बिहार से संतोष कुमार मधुप. जैनेरिक दवाओं में वही तत्व होते हैं जो प्रैस्क्रिप्शन दवाओं में होते हैं. लेकिन क्योंकि ये पेटैंट क़ानून से मुक्त होती हैं इसलिए ये सस्ती पड़ती हैं. उदाहरण के लिए ऐस्पिरिन जैनरिक दवा है लेकिन दवा बनाने वाली विभिन्न कंपनियां अलग-अलग नामों से इसे बेचती हैं. जैनरिक दवाएं भी गुणवत्ता के कड़े पैमानों से होकर ही गुज़रती हैं इसलिए उतनी ही प्रभावी होती हैं और इनके कोई अतिरिक्त साइड इफ़ैक्ट नहीं होते. |
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