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संयुक्त राष्ट्र में समझौतों के बाद सहमति | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
संयुक्त राष्ट्र के विशेष शिखर सम्मेलन में कुछ समझौतों के बाद ग़रीबी, आतंकवाद और संगठन में सुधार संबंधी एक दस्तावेज को स्वीकार किया गया है. संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के 60 वर्ष पूरे होने पर न्यूयॉर्क में हुए तीन दिन के विशेष शिखर सम्मेलन में शुक्रवार को अंतिम दिन एक घोषणापत्र जारी किया गया. इस दस्तावेज़ पर विभिन्न देशों के राजदूतों के बीच कई हफ़्तों तक चर्चा हुई जिसके बाद मंगलवार को एक सहमति बन सकी. लेकिन कुछ टीकाकारों की राय है कि इस दस्तावेज़ में कई महत्वपूर्ण विषयों के साथ या तो समझौते किए गए या उन्हें ग़ायब ही कर दिया गया. शिखर सम्मेलन के अंतिम सत्र में वेनेज़ुएला और क्यूबा जैसे राष्ट्रों ने खुलकर कहा कि अधिकतर राष्ट्रों को इस संबंध में अपने मत प्रकट करने का अवसर ही नहीं मिला. शिखर सम्मेलन के अंत के बाद भी कई देशों के राजनेता अभी न्यूयॉर्क में रहेंगे क्योंकि संयुक्त राष्ट्र महासभा का वार्षिक सत्र अभी चल रहा है जिसमें कई नेता अपनी बात रखेंगे. स्वीकृत घोषणापत्र
शिखर सम्मेलन के अंतिम दिन 35 पृष्ठों का जो घोषणापत्र स्वीकार किया गया उसमें एक नया शांति स्थापना आयोग बनाने की बात की गई है. यह आयोग उन देशों में शांति बहाली में सहायता करेगा जहाँ युद्ध हुए हैं. साथ ही विश्व नेताओं में इस बात पर भी सहमति हुई है कि नरसंहार, युद्धापराधों और जातीय उन्मूलन को रोकना एक अंतरराष्ट्रीय ज़िम्मेदारी है. इसके अतिरिक्त एक मानवाधिकार परिषद का गठन किया गया गया है और आतंकवाद की निंदा की गई है 'चाहे वह किसी भी रूप में हो, किसी ने भी किया हो, कहीं भी हुआ हो और किसी भी उद्देश्य से किया गया हो'. लेकिन शिखर सम्मेलन में आतंकवाद की परिभाषा पर कोई सहमति नहीं बन सकी. निराशा शिखर सम्मेलन में परमाणु अस्त्रों के प्रसार पर रोकने की रणनीति पर भी कोई सहमति नहीं हुई जिसे संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफ़ी अन्नान ने एक "धब्बा" बताया. दक्षिण अफ़्रीका के राष्ट्रपति थाबो एम्बेकी ने सुरक्षा परिषद में विकासशील राष्ट्रों को शामिल करने के रास्ते में कथित रूप से अड़ंगा डालने के लिए "अमीर और ताक़तवर देशों" की आलोचना की. कनाडा के प्रधानमंत्री पॉल मार्टिन ने ऐसा संकेत दिया कि मानवाधिकार परिषद का शक्तिशाली नहीं होने से उन्हें "गहरी निराशा" हुई है. ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री जॉन हॉवर्ड ने कहा कि आतंकवाद के विषय पर सम्मेलन में अच्छी-ख़ासी चर्चा हुई लेकिन संयुक्त राष्ट्र इस ख़तरे से निपट सकने में नाकाम रहा है. लेकिन उनका कहना था,"हमें ये नहीं सोचना चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र दुनिया की सारी समस्याएँ दूर कर देगा, या ये कि उसे ऐसा करने की कोशिश करनी चाहिए". मगर संयुक्त राष्ट्र के आलोचक माने जानेवाले अमरीका के दूत जॉन बोल्टन ने स्वीकृत घोषणापत्र की सराहना करते हुए इसे संयुक्त राष्ट्र में सुधार की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण क़दम बताया. |
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