| 'आतंकवाद के सामने नहीं झुकेंगे' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने कहा है कि जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के मुद्दे पर न तो देश किसी दबाव में आएगा और न ही इस मुद्दे पर कोई समझौता किया जाएगा. संयुक्त राष्ट्र महासभा के साठवें सत्र को संबोधित करते हुए मनमोहन सिंह ने कहा कि आतंकवाद और निर्दोष लोगों की हत्या को किसी भी कारण से सही नहीं ठहराया जा सकता. मनमोहन सिंह के इस बयान से पहले पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ ने महासभा को संबोधित करते हुए कहा था कि "आतंकवादी गतिविधियों के कारणों को समझने और उनसे निपटने की ज़रूरत है". परवेज़ मुशर्रफ़ ने यह भी कहा था कि कश्मीर समस्या का एक न्यायसंगत हल निकाले जाने की ज़रूरत है जो पाकिस्तान, भारत और कश्मीरी लोगों को मंज़ूर हो. प्रधानमंत्री ने कहा, "हम आतंकवाद के मुद्दे पर कभी नहीं झुकेंगे और न ही कोई समझौता करेंगे, चारे यह जम्मू कश्मीर में हो या कहीं और." मनमोहन सिंह ने कहा, "हम आतंकवाद के लिए कोई जगह नहीं छोड़ सकते. हमें ऐसी किसी भी विचारधारा को सख़्ती से ख़ारिज करना चाहिए जो ऐसा कोई कारण बताए जिससे उसे न्यायसंगत ठहराया जाए." उन्होंने कहा, "निर्दोष लोगों की हत्या को किसी भी कारण से सही नहीं ठहराया जा सकता." प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत अनेक वर्षों से जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद का सामना कर रहा है जिसने देश की एकता और क्षेत्रीय अखंडता को निशाना बनाया है. लोकतंत्र का अभाव डॉक्टर मनमोहन सिंह ने कहा कि देशों के भीतर और विश्व संस्थाओं में लोकतांत्रिक प्रशासन एक ताक़तवर हथियार हो सकता है और इससे आतंकवाद के ख़तरे का मुक़ाबला किया जा सकता है.
प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र के बारे में कहा कि यह विश्व संस्था 'लोकतंत्र के अभाव' से गुज़र रही है और आज की दुनिया में जब तक इसके ढाँचे को और ज़्याता प्रतिनिधिक नहीं बनाया जाता तब तक सहस्राब्दि लक्ष्यों को हासिल करने में इसकी क्षमता सीमित रहेगी. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की तुलना भारतीय मान्यता - वसुधैव कुटुंबकम से करते हुए कहा कि पूरी दुनिया ही एक परिवार की तरह है. मनमोहन सिंह ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय विकास के लक्ष्य तो निर्धारित कर लेते हैं लेकिन उन्हें हासिल करने के लिए समुचित प्रयास नहीं किए जाते हैं. उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र में सुधार के तहत सुरक्षा परिषद के सुधार भी शामिल होने चाहिए और सुरक्षा परिषद के स्थाई और अस्थाई सदस्यों की संख्या में बढ़ोतरी की ज़रूरत है. प्रधानमंत्री ने संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था में कमियों के बारे में बेबाक तरीके से बोलते हुए कहा, "दुर्भाग्य से संयुक्त राष्ट्र में लोकतंत्र का अभाव है. इसका ढाँचा और निर्णय लेने की प्रक्रिया 1945 की दुनिया को प्रतिबंबित करती है न कि 2005 के विश्व को." |
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