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सोमवार, 29 अगस्त, 2005 को 18:14 GMT तक के समाचार
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लोकतांत्रिक संस्थाओं को समर्थन
हामिद करज़ई और मनमोहन सिंह
मनमोहन सिंह ने अफ़ग़ानिस्तान की संसद की नई इमारत की नींव रखेंगे
भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अफ़ग़ानिस्तान की लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया है.

मनमोहन सिंह ने सोमवार को अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में अफ़ग़ान संसद भवन की आधारशिला रखने के समारोह में यह वादा किया.

भारत इस संसद भवन के निर्माण में वित्तीय सहायता दे रहा है.

उन्होंने कहा कि नया संसद भवन अफ़ग़ानिस्तान में लोकतंत्र का केंद्र बिंदू रहेगा.

ग़ौरतलब है कि मनमोहन सिंह पिछले क़रीब तीन दशकों में अफ़ग़ानिस्तान की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं.

उनसे पहले 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने अफ़ग़ानिस्तान की यात्रा की थी और तब के बाद से वहाँ राजनीतिक उथल-पुथल रही है जिसने अंतरराष्ट्रीय पटल पर भी प्रमुखता पाई है.

भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी अफ़ग़ानिस्तान यात्रा को रचनात्मक बताया है.

भारत अफ़ग़ानिस्तान को सबसे ज़्यादा सहायता देने वाला दक्षिण एशियाई देश है और भारत तालेबान शासन की समाप्ति के बाद से अफ़ग़ानिस्तान को क़रीब पचास करोड़ डॉलर की सहायता दे चुका है.

भारत और अफ़ग़ानिस्तान के नज़दीकी सांस्कृतिक संबंध हैं और संवाददाताओं का कहना है कि बहुत से अफ़ग़ान लोग अपने देश में पाकिस्तान का प्रभाव कम करने के लिए भारत को प्रबल संभावनाओं वाले देश के रूप में देखते हैं.

प्रधानमंत्री ने अपनी यात्रा में अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण के प्रति भारत की वचनबद्धता दोहराई और आर्थिक क्षेत्र में हरसंभव सहायता का आश्वासन भी दिया.

अहमियत

भारत अफ़ग़ानिस्तान को सबसे अधिक सहायता देने वाला दक्षिण एशियाई देश है और भारत अफ़ग़ानिस्तान को सामरिक-कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण देश मानता है क्योंकि उसकी सीमा पाकिस्तान और ईरान जैसे अहम देशों से जुड़ती है.

भारत अफ़ग़ानिस्तान में इतना निवेश कर रहा है तो उसकी सीधी वजह ये है कि अफ़ग़ानिस्तान भारत को मध्य एशिया के देशों से जोड़ता है जो भारत की तेल और गैस की ज़रूरतों के लिए बहुत अहम है.

अफ़ग़ानिस्तान में छात्राएँ
भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में काफ़ी सहायता की है

इसके अलावा, भारत यह भी सुनिश्चित करना चाहता है कि तालेबान के दौर की तरह, पाकिस्तान का अफ़ग़ानिस्तान पर बहुत अधिक असर-रसूख़ न हो जाए.

तालेबान के दौर में अफ़ग़ानिस्तान में भारतीय ठिकानों को न सिर्फ़ निशाना बनाया गया बल्कि अफ़ग़ानिस्तान से बड़ी संख्या में मुजाहिदीन लड़ाके कश्मीर पहुँचने लगे थे, भारत ऐसी किसी स्थिति की पुनरावृत्ति को रोकना चाहता है.

तालेबान के पतन के बाद से भारत अफ़ग़ानिस्तान में 50 करोड़ डॉलर की धनराशि लगा चुका है, इसमें से ज़्यादातर धन शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी बुनियादी सुविधाओं के पुनर्निर्माण पर ख़र्च किया गया है.

भारत ने परिवहन, उड्डयन और सड़क निर्माण में मदद के अलावा अफ़ग़ानिस्तान के पुलिसकर्मियों, अधिकारियों और कूटनयिकों को प्रशिक्षित करने में भी सहायता की है.

भारत, पाकिस्तान ऊपर से कुछ भी कहें लेकिन दिल्ली और इस्लामाबाद के कूटनीतिक हलकों में हर कोई जानता है कि अफ़ग़ानिस्तान दोनों देशों के बीच होड़ का एक मुख्य कारण बन चुका है.

ज़्यादातर विश्लेषकों का कहना है कि तालेबान के पतन के बाद भारत को जो मौक़ा मिला है वह किसी भी हालत में उसे गँवाना नहीं चाहता और भारत ने इस स्थिति का कूटनीतिक फ़ायदा भी उठाया है.

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