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शुक्रवार, 08 जुलाई, 2005 को 12:52 GMT तक के समाचार
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अफ़्रीका को 50 अरब डॉलर की सहायता

जी-8 के नेता
प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने इसे शुरुआत कहा है
औद्योगिक रूप से सबसे ज़्यादा विकसित दुनिया के आठ देशों के नेताओं ने संयुक्त बयान में घोषणा की है कि अफ़्रीका के लिए 50 अरब डॉलर की सहायता राशि दी जाएगी.

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने कहा है कि जी-8 के नेता अफ़्रीकी देशों के लिए 50 अरब डॉलर की सहायता राशि देने पर सहमत हो गए हैं.

ब्लेयर ने माना कि यह राशि उतनी नहीं है जितना सभी चाहते थे लेकिन इसे प्रगति को माना ही जाएगा.

उन्होंने बताया कि जी-8 के नेता फ़लस्तीनी प्रशासन के लिए तीन अरब डॉलर देने पर सहमत हो गए हैं.

अरब मामलों के जानकारों का कहना है कि कई अरब और मुस्लिम बहुल देशों में लोगों की नज़र इस पर थी कि जी आठ नेता इस विवादास्पद मसले के हल के लिए क्या करते हैं.

इन विशेषज्ञों का कहना है कि शांति प्रक्रिया पर कोई भी फ़ैसला किए जाने के बजाय सिर्फ़ पैसे देकर जी आठ ने सबसे कम विवादास्पद फ़ैसला किया है.

इसे व्यापार के क्षेत्र में समझौते का नया संकेत माना जा रहा है. साथ ही एड्स के इलाज और कर्ज़ माफ़ी की दिशा में भी इसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

स्कॉटलैंड के ग्लेनइगल्स में पत्रकारों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ब्लेयर ने कहा, "इससे कल ही दुनिया नहीं बदल जाएगी. यह एक शुरुआत है अंत नहीं."

अफ़्रीकी संघ के अध्यक्ष और नाइज़ीरिया के राष्ट्रपति ओलूसेगू ओबासांजो ने इस फ़ैसले का स्वागत किया है. उन्होंने कहा कि जी-8 नेताओं और अफ़्रीकी नेताओं के बीच बातचीत सफल रही है.

ग़रीबी के ख़िलाफ़ लड़ रही संस्था ग्लोबल कॉल टू एक्शन अगेन्स्ट पावर्टी के जाने माने प्रतिनिधि हैं कूमी नाइडू, भारतीय मूल के लेकिन लंबे समय से दक्षिण अफ़्रीका में रह रहे हैं.

कूमी नायडू ने अपनी नाराज़गी कुछ इस तरह व्यक्त की, " जी आठ के नेता ग़रीबी के राक्षस से लड़ रहे थे लेकिन दहाड़ की जगह उनके मुँह से सिर्फ़ फ़ुसफ़ुसाहट की आवाज़ आई है."

वहीं उनके साथ मंच पर बैठे लाइव एट के आयोजक बॉब गेल्डॉफ़ और उनके सहयोगी बोनो ने मलेरिया और एड्स पर हुई प्रगति पर खुशी जताई.

प्रधानमंत्री ब्लेयर ने कहा कि सहमतिपत्र में ये भी वादा किया गया है कि अफ़्रीका में नए शांतिरक्षक सैनिकों की तैनाती की जाएगी. बदले में अफ़्रीकी देशों ने लोकतंत्र, सुशासन और क़ानून का शासन की बात कही है.

जलवायु परिवर्तन

इस मसले पर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने कहा कि इस मुद्दे पर जी आठ देशों की विकासशील देशों से बातचीत की प्रक्रिया शुरू किए जाने पर सहमति हुई है.

पाँच आमंत्रित विकासशील देशों में भारत, चीन, ब्राज़ील, मेक्सिको और दक्षिण अफ़्रीका के साथ बातचीत होगी. इस सिलसिले की पहली बैठक इसी साल 1 नवंबर को ब्रिटेन में होगी.

लेकिन इस सम्मेलन में पर्यावरणवादी संस्थाओं ने जी आठ की कड़ी आलोचना की.

उन्होंने कहा कि विकासशील देश पर्यावरण को लेकर प्रतिबद्ध थे और अमरीका को छोड़कर सभी जी आठ देश भी लेकिन सारा मामला अटक गया अमरीका पर जाकर.

इससे पहले फ़्राँस के राष्ट्रपति ज़्याक शिराक ने भी कहा था कि हालांकि दुनिया भर के वैज्ञानिक और ख़ासकर भारतीय वैज्ञानिक भी स्पष्ट तौर पर बता चुके हैं कि जलवायु परिवर्तन का उद्योगों के उत्सर्जन से सीधा संबंध है लेकिन अमरीका इसे मानने को तैयार ही नहीं.

उनका कहना था कि फिर भी जलवायु परिवर्तन पर कुछ प्रगति हुई है.

भारत

भारत के अधिकारियों का कहना था कि जी आठ देशों के सम्मेलन में भारत को बुलाया जाना साफ़ दिखाता है कि वो और चीन, ब्राज़ील, मेक्सिको और दक्षिण अफ़्रीका दुनिया के महत्वपूर्ण देशों में शुमार किए जाते हैं.

इसके अलावा भारत के विदेश सचिव श्याम सरन ने संकेत दिए कि परमाणु ऊर्जा को लेकर भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के बीच बातचीत हुई है.

विशेषज्ञों का कहना है कि परमाणु ऊर्जा को लेकर भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अमरीका यात्रा में कुछ सहमति हो सकती है, जिसका रास्ता अनौपचारिक बातचीत में खुला है.

इसके अलावा भारत ने जी आठ देशों के साथ बैठक में मुद्दा उठाया था कि सब्सिडी और आयात शुल्क कम किए जाएँ ताकि विकासशील देश खाद्यान्न जैसी चीज़ें अमरीका और यूरोप के बाज़ारों में बेच पाएँ.

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने बताया कि किस साल तक सब्सिडी पूरी तरह बंद की जा सकती है, इसका फ़ैसला हाँगकाँग की बैठक में ही किया जा सकेगा.

विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर ऐसा होता है तो उससे विकासशील देशों के किसानों का काफ़ी फ़ायदा हो सकता है लेकिन देखना होगा कि विकसित देश कब तक इस मामले को टालते रहेंगे.

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