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सोमवार, 04 जुलाई, 2005 को 20:40 GMT तक के समाचार
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जी आठ में क्या हैं बड़े मुद्दे

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अफ़्रीकी देशों के समर्थन में कई लोग सामने आए हैं
दुनिया में औद्योगिक रूप से सबसे ज़्यादा विकसित 8 देशों, यानि “जी 8” का सम्मेलन बुधवार से स्कॉटलैंड के ग्लेनईगल्स में शुरू हो रहा है. जी 8 की इस बैठक में कई महत्वपूर्ण मुद्दे होंगे.

अफ़्रीका में हर तीन सेकेंड में एक बच्चे की मौत होती है – भुखमरी के कारण, ग़रीबी के कारण. ऐसे में इस बार अफ़्रीका की मदद के लिए आगे आना चाहते हैं जी आठ के देश.

दिलचस्प बात ये है कि जी 8 का न तो कोई मुख्यालय है और न ही कोई बजट.

इसका कारण ये है कि जी 8 बनाने के पीछे सोच ये थी कि लंबे चौड़े तामझाम से बचकर इन देशों के शीर्ष नेता सीधे-सीधे अनौपचारिक तरीके एक दूसरे से बात कर सकें.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार, बाथ विश्वविद्यालय के इफ़्तिखार मलिक कहते हैं " नब्बे के दशक में तेल संकट और आर्थिक मंदी के माहौल के बीच महसूस किया गया कि दुनिया के एहम देशों के नेताओं को खुलकर बात करने का कोई मंच होना चाहिए. इसी के बाद 1975 में फ़्राँस के रैम्बुइए में जी 6 की स्थापना हुई. इसके छह सदस्य थे ,फ़्राँस, जर्मनी, इटली, जापान, यूनाइटेड किंगडम और अमरीका. 1976 में कनाडा और 1998 में रूस भी इनके साथ जुड़ा और बन गया जी 8."

इस बार चार देशों को आर्थिक मामलों के विशेष सत्र में बातचीत के लिए आमंत्रित किया गया है – ये पाँच देश हैं भारत, चीन, ब्राज़ील, मेक्सिको और दक्षिण अफ़्रीका.

इस बार जिन मुद्दों पर बातचीत होनी है उनमें प्रमुख है ग़रीबी के ख़िलाफ़ मुहिम तेज़ करना लेकिन इसके अलावा और क्या मुद्दे हैं बातचीत के.

 भारत के दृष्टिकोण से ये एक मौका होगा जब एक अनौपचारिक माहौल में भारत के प्रधानमंत्री जी आठ के नेताओं से बात कर संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई सीट का दावा भी पेश कर सकेंगे.
इफ्तिखार मलिक

संयुक्त राष्ट्र के अंडर सेक्रेटरी जनरल कहते हैं कि सुयंक्त राष्ट्र मानता है कि ये देश कई मुद्दों पर एहम फ़ैसले कर सकते हैं.

थरुर कहते हैं “जी आठ देश जलवायु परिवर्तन को महत्वपूर्ण मुद्दा मानते हुए एहम फ़ैसले कर सकते हैं, वर्ष 2020 के बाद ग्रीन हाउज़ गैसों के उत्सर्जन पर बात कर सकते हैं. इसके अलावा जब वो दुनिया के विकास की बात कर रहे हैं तो उसके लिए अच्छी व्यवस्था बनाने की बात होगी. उसी संदर्भ में दुनिया में आतंकवाद के मुद्दे पर भी बात होगी.”

संयुक्त राष्ट्र और कई पर्यावरणवादी संस्थाओं की नज़र इस बार जी 8 में जलवायु परिवर्तन को लेकर हो रही बहस पर इसीलिए भी होगी क्योंकि इसी मुद्दे पर वर्ष 2001 में जिनेवा सम्मेलन में अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने क्योटो संधि को नामंज़ूर कर दिया था. लेकिन इस बार उन पर कई देशों और पर्यावरणवादी संस्थाओं के अलावा वैज्ञानिक समुदाय का भी ख़ासा दबाव होगा.

इसके अलावा अमरीका और यूरोपीय संघ के रिश्ते भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा होगा.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार इफ़्तिखार मलिक बताते हैं "भारत के दृष्टिकोण से ये एक मौका होगा जब एक अनौपचारिक माहौल में भारत के प्रधानमंत्री जी आठ के नेताओं से बात कर संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई सीट का दावा भी पेश कर सकेंगे. जी-4 के देश यानि भारत, जापान, ब्राज़ील और जर्मनी चाहते हैं कि सुरक्षा परिषद में छह स्थाई सीटें और हों जिनमें से दो अफ़्रीकी देशों को दी जाएँ. "

एस बारे में शशि थरूर कहते हैं “हमें इस बात के संकेत मिले हैं कि जी-4 के देश ये चाहते हैं कि सुरक्षा परिषद के विस्तार के मामले पर वोट जुलाई महीने के मध्य में डाले जाएँ. आपकी बात सही है, जी एट में और अफ़्रीकी देशों के साथ लगातार बातचीत इसके लिए ज़रूरी होगी. सभी देश एक दूसरे से बात कर तय करना चाहेंगे कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में बहस के दौरान कौन किसका समर्थन करेगा और किसका वोट किसे मिलेगा.”

लेकिन कल जहाँ दुनिया के प्रमुख देशों के शीर्ष नेता स्कॉटलैंड के ग्लेनईगल्स के ख़ूबसूरत होटल और उसके विशाल गॉल्फ़ कोर्स और लॉन में बातचीत कर रहे होंगे वहीं जी एट के ख़िलाफ़ एडिनबरा सहित ब्रिटेन के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हो रहे होंगे. दोनों ही ओर ज़ोर-शोर से तैयारियाँ जारी हैं.

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