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रफ़संजानी:एक यथार्थवादी नेता | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दो बार ईरान के राष्ट्रपति रह चुके अकबर हाशमी रफ़संजानी देश के काफ़ी प्रभावशाली नेताओं में से एक हैं. किसी ज़माने में रफ़संजानी को प्रगतिशील नेता माना जाता था लेकिन सुधारवादी नेता और मौजूद राष्ट्रपति मोहम्मद ख़ातमी के इस पद पर चुने जाने के बाद वह धीरे-धीरे वह परंपरावादी खेमे के नज़दीक होते गए हैं. रफ़संजानी 1989 से 1997 तक दो बार राष्ट्रपति रह चुके हैं और उसके बाद भी कई महत्वपूर्ण ओहदों पर रह चुके हैं. रफ़संजानी ने राष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान पश्चिमी देशों के साथ संबंधों को नई दिशा दी और ईरान को एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित किया. घरेलू राजनीति में रफ़संजानी ने कट्टरवादी इस्लामी दंड संहिता का विरोध किया है और महिलाओं को नौकरियों के अच्छे अवसर खोले. रफ़संजानी की बेटी फ़ाज़ेह हाशमी ख़ुद एक महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली कार्यकर्ता हैं. वह ज़ान नाम से एक पत्रिका प्रकाशित करती थीं जिसे 1997 में कट्टरपंथियों ने बंद करवा दिया था. रफ़संजानी ने इराक़ युद्ध शुरू होने के बाद से जुमे की नमाज़ों में ख़ुतबा दिया है जिसके ज़रिए क्षेत्र में 'अमरीकी योजनाओं' की आलोचना की है. ऐसे ही एक ख़ुतबे में रफ़संजानी ने कहा था, "ईरान की तरफ़ जिसने भी हाथ बढ़ाने की कोशिश की, उसके हाथ काट दिए जाएंगे." साख ईरान की क्रांति के पहले रफ़संजानी की जो साख रही उससे उन्हें सर्वोच्च आध्यात्मिक नेता आयतुल्ला ख़मेनेई के भरोसेमंद सलाहकारों में जगह मिली. आयतुल्ला ख़मेनेई को आधुनिक ईरान का संस्थापक माना जाता है.
रफ़संजानी ने ईरानी क्रांति के तुरंत बाद ख़ुद को एक ताक़तवर नेता के रूप में स्थापित किया और इस्लामी रिपब्लिकन पार्टी की स्थापना की. इस पार्टी ने 1987 तक देश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन 1987 में यह पार्टी अंदरूनी मतभेदों की वजह से बिखर गई. हाशमी रफ़संजानी 1980 से 1988 तक ईरानी संसद, जिसे मजलिस कहा जाता है, के अध्यक्ष रहे. 1980 से 1988 तक चले ईरान-इराक़ युद्ध के आख़िरी वर्षों में आयतुल्ला ख़मेनेई ने रफ़संजानी को सशस्त्र सेनाओं का कार्यकारी कमांडर इन चीफ़ भी बनाया था. |
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