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सोमवार, 07 मार्च, 2005 को 12:25 GMT तक के समाचार
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सीरिया-लेबनान:संबंधों का इतिहास
सीरियाई सैनिक
सीरियाई राष्ट्रपति ने कहा है कि उनके सैनिक 1989 के तैफ़ समझौते के तहत पीछे हटेंगे
सीरिया लेबनान की पूर्वी बेका घाटी में पिछले 30 साल से मौजूद अपने सैनिकों को सोमवार से पीछे हटाना शुरू कर रहा है.

लेबनान में सीरिया की मौजूदगी शुरु कैसे हुई

सीरिया हमेशा से लेबनान को वृहद सीरिया का एक हिस्सा मानता रहा है. तुर्की साम्राज्य में लेबनान का वर्तमान इलाक़ा सीरिया में ही आता था. प्रथम विश्व युद्ध के बाद ये दोनों अलग हुए. सीरिया की सरकार का कहना है कि फ्रांस ने लेबनान को सीरिया से काटकर अलग किया. इस तर्क को मानें तो सीरिया के सैनिकों की लेबनान में मौजूदगी बिल्कुल जायज़ है

लेकिन 30 साल पहले सीरिया के क़रीब 30 हज़ार सैनिक उस समय लेबनान में आए जब लेबनान में गृह युद्ध अपने चरम पर था.

लेबनान में गृह युद्ध 15 साल तक चला और 1990 में जब युद्ध समाप्त हुआ तो सीरिया की सेनाएं पूर्ण रुप से वहीं टिक चुकी थीं.

इस समय लेबनान में सीरिया के 15 हज़ार सैनिक हैं.

गृह युद्ध में सीरिया की भूमिका क्या थी

सीरिया के सैनिकों ने गृह युद्ध में पहले क्रिश्चियन लेबनीज़ फ्रंट का साथ दिया था. बाद में लेबनाना में सीरिया के सैनिक अरब लीग के तहत आ गए.

सीरिया का मुख्य मकसद लेबनान पर इसराइली प्रभाव को कम करना था. इसराइल ने 1978 और 1982 में लेबनान पर चढ़ाई की थी.

1987 में सीरिया के सैनिकों ने बेरुत में शिया और सुन्नियों के बीच हुए संघर्ष को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

गृह युद्ध को निपटाने में सीरियाई सैनिकों की भूमिका ख़ास रही है. 1990 में सीरिया के सैनिकों ने लेबनान के जनरल मिचेल आउन को हराने में मुख्य भूमिका निभाई. मिचेल आउन ने 1989 में गृह युद्ध समाप्त करने को लेकर हुए ताएफ समझौते को स्वीकार करने से इंकार किया था.

ताएफ समझौते के तहत सीरिया के सैनिकों को बेरुत, मध्य लेबनान और बेक्का घाटी से 1992 तक हट जाना था. 2001 में सीरिया ने कुछ सैनिकों को वापस भी बुलाया जिसके बाद सितंबर 2004 में भी कुछ सैनिकों को वापस बुलाने की बात थी.

सीरियाई सैनिकों को हटाने की मांग अब क्यों ज़ोर पकड़ रही है.

कई सालों तक लेबनान के लोगों ने सीरिया के प्रभाव को सकारात्मक तौर पर देखा और यह मानते रहे कि लेबनान के स्थायित्व के लिए सीरियाई सैनिकों की मौजूदगी ज़रुरी है.

ऐसा इसलिए भी था क्योंकि इसराइल की सेनाएं 2000 तक दक्षिणी लेबनान में मौजूद थीं.

इसराइली सेनाओं के हटने के बाद से ही सीरियाई सैनिकों को वापस बुलाने की मांग ने ज़ोर पकड़ा. बात केवल यहीं तक नहीं थी. सीरिया के सैनिक ही लेबनान में नहीं थे बल्कि लेबनान की राजनीति और खुफ़िया सेवा पर भी सीरिया का काफी प्रभाव बढ़ गया था जिससे लेबनान के लोग खुश नहीं थे.

सीरिया के बढ़ते प्रभाव से लेबनान में भ्रष्टाचार बढ़ा और कई नेताओं की हत्याएं भी हुई. पिछले महीने पूर्व प्रधानमंत्री राफिक हारिरी की आत्मघाती बम विस्फोट में हुई मौत के बाद सीरिया के सैनिकों को हटाने की मांग और बढ़ी.

इससे पहले सितंबर 2004 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने एक प्रस्ताव पारित कर लेबनान से सभी विदेशी सैनिकों को वापस बुलाने का आह्वान किया था. यह प्रस्ताव अमरीका और फ्रांस लेकर आए थे जो चाहते थे कि लेबनान से चरमपंथी संगठन हिज़बुल्ला के गुरिल्ला और सीरिया का प्रभाव खत्म हो.

इस प्रस्ताव की आड़ में अमरीका ने सीरिया पर लेबनान से सैनिक हटाने का दबाव और बढ़ाते हुए कुछ प्रतिबंध भी लगाए.

लेबनान में सीरिया का क्या दांव पर है.

लेबनान में सीरिया के मौजूदगी इसराइल के ख़िलाफ़ उसके संघर्ष की दृश्टि से महत्वपूर्ण है. सीरिया ने हिज़बुल्ला की मदद से इसराइल की उत्तरी सीमा पर काफी दबाव बना रखा है.

सीरिया का कहना है कि वह इसराइल पर से दबाव तभी हटाएगा जब इसराइन सीरिया की गोलान पहाड़ियों से अपनी सेनाएं हटाए.

प्रेक्षकों का कहना है कि अगर सीरिया इसराइल के साथ बिना किसी समझौते के लेबनान से अपनी सेनाएं हटाता है तो यह उसके लिए घाटे का सौदा समझा जाएगा.

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