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मंगलवार, 22 फ़रवरी, 2005 को 03:26 GMT तक के समाचार
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अमरीका, यूरोपीय संघ और चीन
अमरीका के राष्ट्रपति बुश
अमरीका के राष्ट्रपति बुश ने ईरान को चेतावनी दी और यूरोप से बेहतर रिश्तों पर बल दिया
अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने यूरोपीय संघ और नैटो के नेताओं को संबोधन में उन मुद्दों का तो ज़िक्र किया जिस पर दोनों पक्षों की राय एक जैसी है लेकिन उस मुद्दे का कोई ज़िक्र नहीं किया जिस पर मतों में भिन्नता है.

बुश ने ऐसे कई मसलों को रेखांकित किया जो अमरीका और यूरोप को बांधते हों लेकिन चीन के मुद्दे पर कुछ भी नहीं कहा.

ख़ासकर चीन को हथियारों की बिक्री दोबारा शुरु करने के मामले पर. यूरोपीय संघ और ख़ासकर फ्रासं चीन को हथियारों की बिक्री शुरु करने का पक्षधर है और बारबार इसकी मांग करता रहा है.

अमरीका इसका विरोध करता है. फ्रांस का तर्क है कि अगर यूरोपीय संघ से चीन को हथियार मिलेंगें तो वह अपनी हथियार प्रौद्योगिकी का विकास नहीं करेगा.

इतना ही नहीं यूरोपीय संघ को चीन हथियारों की बिक्री के हिसाब से एक बड़ा बाज़ार नज़र आता है.

दूसरी तरफ अमरीका का मानना है कि चीन को अगर यूरोप से हथियार मिलते हैं तो इससे पूर्वी एशिया में शक्ति संतुलन बिगड़ जाएगा. पूर्वी एशिया में अमरीका के हज़ारों सैनिक तैनात हैं.

इस मुद्दे पर कोई सवाल बुश से फिलहाल नहीं किया गया लेकिन मंगलवार को यूरोपीय संघ के सम्मेलन के बाद पत्रकार वार्ता के दौरान ऐसे सवाल उठाए जा सकते हैं.

सहमति के मुद्दे

यूरोप और अमरीका के बीच सीरिया और लेबनान के मुद्दे पर पूर्ण रुप से सहमति दिखी है.

बुश ने फ्रांस के राष्ट्रपति जॉक शिराक के साथ डिनर के बाद साझा बयान जारी कर के लोकतांत्रिक और आज़ाद लेबनान की स्थापना की बात कही.

बयान का स्पष्ट इशारा लेबनान में सीरिया के सैनिकों की मौजूदगी से था.

इसके अलावा अमरीका और यूरोप के साथ आने पर भी दोनों पक्षों में सहमति थी.

राष्ट्रपति बुश के दोबारा सत्ता सँभालने के बाद से बुश प्रशासन ने यूरोपीय समुदाय के साथ संबंध सुधारने की सतर्कता से कोशिश की है.

कई हफ़्तों से अमरीका इस बात पर ज़ोर दे रहा है कि आख़िर यूरोपीय देशों के साथ उसके संबंध कितने अहम हैं.

पिछले कुछ वर्षों से दोनों पक्षों के बीच जो भी असहमति चल रही है अब उस पर विराम लगाने की कोशिश हो रही है.

वैसे बुश प्रशासन यूरोप में उतना लोकप्रिय नहीं है फिर वो चाहे ईरान का मुद्दा हो या जलवायु परिवर्तन का और शायद इसीलिए अब आश्वासनों के बजाए काम के ज़रिए ही लोगों की धारणा बदली जा सकेगी.

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