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इराक़ में चुनाव के बाद क्या चुनौतियाँ? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इराक़ में रविवार, तीस जनवरी के चुनाव से एक ऐसा फ़ॉर्मूला तैयार किया जाएगा जो शिया, सुन्नी और कुर्द सभी समुदायों को मंज़ूर होगा. इराक़ में क़रीब 60 प्रतिशत अरब मूल की शिया आबादी. शियाओं को इस चुनाव में भारी सफलता मिलने की उम्मीद है. बीबीसी के कुटनीतिक मामलों के संववादाता जोनाथन मार्कस लिखते हैं कि चुनाव के बाद बनने वाली नैशलन असेंबली में संभावना है कि सुन्नियों का समुचित प्रतिनिधित्व ना हो. इराक़ में चुनाव लड़ने वाली सभी पार्टियों के राजनीतिक विचार अलग-अलग हैं और यह राजनीतिक वैचारिक भिन्नता संविधान बनाते वक़्त भी उभरकर सामने आ सकती है. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ऐसे में इराक़ के संविधान का ढाँचा तैयार करने की प्रक्रिया में देश के सभी समुदायों को अपनी बात कहने का अवसर मिलना चाहिए. इराक़ के अंतरिम प्रशासन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे मुवफ़्फ़्क अल रुबई कहते है कि सुन्नियों को इसका अवसर ज़रूर मिलेगा. "संविधान अगस्त में लिखा जाएगा और अरब सुन्नी विचारों को गंभीरता से लिया जाएगा. फिर संविधान पर इस वर्ष अक्तूबर में हस्ताक्षर किए जाएंगे और अगर सुन्नियों को ये संविधान पसंद नहीं आता तो वो इसको वीटो कर सकते है." बीबीसी के अरब मामलों के संवाददाता माग्दी अब्दलहादी कहते है कि अगर इराक़ के सभी समुदायों के लोग एक ऐसे संविधान पर सहमत नहीं हो सके जिससे ये सभी समुदाय एक साथ मिलकार एक ही देश में रह सकते हैं तो इसके परिणाम काफ़ी गंभीर होंगे सिर्फ़ इराक़ ही नहीं बल्कि पूरे मध्य-पूर्व क्षेत्र पर इसका असर पड़ेगा. |
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