BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
सोमवार, 31 जनवरी, 2005 को 00:27 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
'नई इराक़ी सरकार से भी दोस्ती हो'
इराक़ में चुनाव
ग़रेख़ान ने चुनावों को महत्वपूर्ण बताया है
संयुक्त राष्ट्र के पूर्व राजनयिक और मध्य पूर्व के लिए भारत के नवनियुक्त विशेष दूत चिन्मय ग़रेख़ान ने कहा है कि भारत को इराक़ की नई सरकार के साथ अच्छे संबंध बनाने चाहिए.

बीबीसी हिंदी के साप्ताहिक कार्यक्रम - आपकी बात-बीबीसी के साथ में श्रोताओं के सवालों के जवाब देते हुए ग़रेख़ान ने कहा कि इराक़ के साथ हमेशा से ही भारत के अच्छे संबंध रहे हैं.

उन्होंने कहा, "सद्दाम हुसैन के ज़माने से ही कश्मीर मुद्दे पर इराक़ का रुख़ अन्य अरब देशों से अच्छा रहा है. इराक़ी लोगों में भारत के लिए बड़ा प्रेम है और भारत सरकार इराक़ के साथ दोस्ताना संबंधों को आगे ले जाने के लिए काफ़ी सतर्क है."

संयुक्त राष्ट्र के पूर्व अपर महासचिव चिन्मय ग़रेख़ान ने कहा, "भारत में आम भावना ये है कि सरकार को इराक़ पर हमले की आलोचना में आवाज़ उठानी चाहिए थी लेकिन जो कुछ हुआ, उसे अब हमें भूल जाना चाहिए और यह याद रखना चाहिए कि भारतीय संसद ने इराक़ पर हमले का बहुत ही स्पष्ट और सख़्त शब्दों में विरोध किया था."

जब यह पूछा गया कि भारत सरकार ने इराक़ पर हमले के विरोध की इस भावना को अनदेखा क्यों किया और ख़ामोश रही तो ग़रेख़ान का कहना था, "मेरे विचार में भारत सरकार ख़ामोश तो रही लेकिन इराक़ में अपने सैनिक नहीं भेजने का फ़ैसला भी उतना ही ठीक भी था."

दोस्ती और मदद
 अब इराक़ में चुनाव हो चुके हैं और भारत सरकार को वहाँ की नई सरकार के साथ अच्छे संबंध क़ायम करने चाहिए और यह देखना चाहिए क्या और किस तरह की मदद की जा सकती है.
चिन्मय ग़रेख़ान

"अब इराक़ में चुनाव हो चुके हैं और भारत सरकार को वहाँ की नई सरकार के साथ अच्छे संबंध क़ायम करने चाहिए और यह देखना चाहिए क्या और किस तरह की मदद की जा सकती है."

चिन्मय ग़रेख़ान ने कहा कि चुनाव में अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की मौजूदगी में भारी संख्या में मतदान होने से संकेत मिलता है कि इस प्रक्रिया की लोकतांत्रिक साख पर शक नहीं किया जा सकता, वहाँ समस्याएँ तो हैं लेकिन इराक़ी लोग उनपर पार पाने की हिम्मत भी रखते हैं."

इराक़ में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका के बारे में चिन्मय ग़रेख़ान का कहना था, "इराक़ में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका काफ़ी कम और हाशिये पर रही है. पिछले दो-तीन साल के दौरान इराक़ मामले में संयुक्त राष्ट्र की साख पर असर पड़ा है, रविवार के चुनाव में भी संयुक्त राष्ट्र की कम ही भूमिका रही."

उन्होंने कहा कि अब संयुक्त राष्ट्र को देखना होगा कि वह इराक़ में किस तरह से केंद्रीय भूमिका में आता है.

यह पूछे जाने पर कि इराक़ में अमरीकी और ब्रितानी फौजों की मौजूदगी में शांति किस तरह से लौट सकती है, ग़रेख़ान का कहना था, "मेरा ख़याल है कि इराक़ में विदेशी सेनाएँ अगले दो साल तक तो रहेंगी क्योंकि इसी साल के आख़िर में वहाँ फिर से चुनाव होने हैं. उन चुनावों के बाद बनने वाली सरकार ही अमरीकी सेनाओं की वापसी के लिए अनुरोध कर सकेगी."

चिन्मय ग़रेख़ान का कहना था कि इसमें कोई शक नहीं है कि अमरीका ने इराक़ में बहुत भारी ग़लती की है. उन्होंने यह नहीं सोचा कि सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाए जाने के बाद उनकी सेनाएँ कब तक वहाँ रहेंगी और इराक़ का भविष्य क्या होगा.

इससे जुड़ी ख़बरें
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>