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लंदन में भी दिखा मतदाताओं का उत्साह | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मतदान करने का मौक़ा प्रवासी इराक़ियों को भी मिला था और इस मौक़े का फ़ायदा उठाने से नहीं चूके लंदन में बसे प्रवासी इराक़ी. मतदान का उत्साह यहाँ वेम्बली में बने मतदान केंद्र पर ढोल-नगाड़ों और लोगों के गानों की आवाज़ में सहज ही दिख रहा था. ब्रिटेन में सिर्फ़ तीन ही जगह मैंचेस्टर, ग्लासगो और लंदन में ये मतदान हो रहा था इसलिए बसों और गाड़ियों में भरकर दूर-दराज़ से लोग आए थे. प्रवासियों के लिए तीन दिन से हो रहे इस मतदान का ये अंतिम दिन था और दिन भी था रविवार, शायद इसीलिए भीड़ भी कुछ ज़्यादा ही थी. दिन बीतने के साथ ही मतदाताओं की भीड़ बढ़ी और लोगों को लाइन में भी लगना पडा. मगर फिर भी उन्हें ख़ुशी थी कि उन्हें मौक़ा मिला है देश से इतनी दूर रहकर भी इस प्रक्रिया में हिस्सा लेने का. समर्थन और विरोध के स्वर सभी समर्थकों की चहकती आवाज़ों का सार एक शब्द में कहें तो वो था, ख़ुशी.
ख़ुशी कि इसके बाद देश में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था क़ायम हो सकेगी और उम्मीद कि देश ख़ुशहाल हो सकेगा. मगर ऐसा नहीं था कि वहाँ पहुँचे सभी लोग इसी मत के थे. विरोध के स्वर भी इस मतदान केंद्र के सामने सड़क के उस पार से आसानी से सुनाई पड़ रहे थे. इसके विरोध के लिए वहाँ खड़े लोगों का कहना था कि ये मतदान सिर्फ़ दिखावा है और इसके बाद अमरीका और ब्रिटेन इराक़ में स्थाई रूप से बने रहेंगे. मतदान उधर मतदान केंद्र के अंदर 35 बूथ बने थे और कड़ी सुरक्षा व्यवस्था से गुज़रने के बाद लोगों को वहाँ तक पहुँचाने के लिए और मदद के लिए हर जगह मतदानकर्मी मौजूद थे.
मतदान बूथ पर पहुँचने के बाद लोग अपना रजिस्ट्रेशन कार्ड दिखा रहे थे. उसे देखकर मतदान अधिकारी मतदाता की उपस्थिति दर्ज करते थे और मतदाता बढ़ जाते थे अगली सीट की ओर. वहाँ उनकी दाहिने हाथ की दूसरी उँगली यानी तर्जनी को स्याही के डिब्बे में थोड़ा सा डुबाकर मतदान का प्रमाण मतदाताओं को दिया जा रहा था. इसके बाद लोगों को मतपत्र दिए जा रहे थे जिस पर प्रत्याशियों के नहीं पार्टियों के नाम और नंबर थे. उसी के आधार पर लोगों को मतदान करना था. लोगों को अपनी पसंद वाली पार्टी के नाम के सामने बने बॉक्स पर पेन से सही का निशान लगाना था और इस तरह वे मत व्यक्त कर रहे थे. मतदान के लिए उत्साहित लोग पूरे परिवार के साथ आए थे. बच्चों के लिए तो ये सब मेले जैसा माहौल था जिसका उन्होंने काफ़ी आनंद भी लिया. उधर कुछ महिलाएँ भी इराक़ के पारंपरिक कपड़ों में आई थीं और ख़ुशी उनके चेहरे पर तैर रही थी. कुल मिलाकर उनके चेहरे पर संतोष था, लोकतंत्र के सजग प्रहरी यानी मतदाता की अपनी भूमिका निभा देने का. |
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