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मंगलवार, 25 जनवरी, 2005 को 05:50 GMT तक के समाचार
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इराक़ी चुनाव से जुड़े सवालों के जवाब
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कहीं कहीं चुनावी पोस्टर दिखाई दे रहे हैं
इराक़ में तीस जनवरी को होने वाले नेशनल एसेंबली के चुनाव को लेकर तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं.

इन्हीं में से कुछ प्रमुख सवालों के जवाब देने का प्रयास किया है बीबीसी ने.

कैसे होंगे ये चुनाव?

इराक़ी जनता 275 सदस्यों वाली नेशनल एसेंबली के लिए मतदान करेगी. पूरे देश को एक ही निर्वाचन क्षेत्र के रूप में देखा जाएगा. राजनीतिक दलों ने अपने उम्मीदवारों की सूची सौंप दी है, इस चुनाव में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण का प्रावधान है. उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम उम्र 30 वर्ष है.

जिन लोगों या पार्टियों के हथियारबंद संगठन हैं वे चुनाव नहीं लड़ सकते, इनके अलावा बाथ पार्टी से जुड़े लोगों के चुनाव लड़ने पर भी रोक है.

पार्टियों को देश भर में मिले वोट के अनुपात के आधार पर नेशनल एसेंबली में सीटें दी जाएँगी.

इस चुनाव में विदेश में रह रहे इराक़ी भी वोट डाल सकेंगे.

क्या होंगे नेशनल एसेंबली के अधिकार?

नेशनल एसेंबली ही सरकार का गठन करेगी और क़ानून बनाएगी. सबसे पहले नेशनल एसेंबली राष्ट्रपति और दो उप राष्ट्रपतियों का चुनाव करेगी.

ईयाद अलावी
अंतरिम प्रधानमंत्री ईयाद अलावी भी दौड़ में शामिल हैं

ये लोग नेशनल एसेंबली के ही एक सदस्य को प्रधानमंत्री पद के लिए चुनेंगे.

प्रधानमंत्री के पास सबसे अधिक अधिकार होंगे जिनमें सेना पर नियंत्रण भी शामिल है.

नेशनल एसेंबली को 15 अगस्त 2005 तक एक संविधान तैयार करना है जिस पर 15 अक्तूबर 2005 तक जनमत संग्रह होगा.

कब बनेगी पूर्णतः संवैधानिक सरकार?

अगर नेशनल एसेंबली का बनाया हुआ संविधान मंज़ूर हो गया तो 15 दिसंबर 2005 में आम चुनाव होंगे और इसी वर्ष के अंत तक नई संवैधानिक सरकार बन जाएगी. लेकिन अगर संविधान नामंज़ूर हो गया तो वर्ष के अंत तक नए सिरे से नेशनल एसेंबली के चुनाव होंगे और पूरी प्रक्रिया फिर से दोहराई जाएगी.

अगर 1 अगस्त 2005 तक संविधान बनाने की दिशा में पूरी प्रगति नहीं होती नेशनल एसेंबली के कार्यकाल को छह महीने के लिए बढ़ाया जा सकता है.

सुरक्षा का क्या होगा?

शायद सबसे बड़ी समस्या यही है. अमरीका ने अपने सैनिकों की संख्या एक लाख पैंतीस हज़ार से बढ़ाकर डेढ़ लाख कर दी है लेकिन चुनाव केंद्रों की ज़िम्मेदारी इराक़ी सुरक्षा बलों को ही दी जा रही है जिनकी क्षमताओं पर संदेह व्यक्त किया जा रहा है.

धमाका
हिंसक घटनाएँ बदस्तूर जारी हैं

अधिकारियों ने घोषणा की है कि चुनाव से तीन दिन पहले इराक़ी सीमा को बंद कर दिया जाएगा ताकि विदेशी विद्रोही देश में न घुस सकें.

इसके अलावा कार बमों के हमले रोकने के लिए वाहनों की कड़ी जाँच की जा रही है और सिर्फ़ परमिट वाले वाहन ही चुनाव वाले इलाकों में प्रवेश कर सकेंगे.

चुनाव के तीन दिन पहले से सार्वजनिक छुट्टी की घोषणा कर दी गई है, सारे दफ़्तर और दुकानें बंद रहेंगी.

इन सब क़दमों का कितना असर होगा यह कहना मुश्किल है लेकिन देश के कई इलाक़ों में सुरक्षा की हालत इतनी ख़राब है कि वोटर अपना नाम दर्ज करवाने से कतरा रहे हैं.

कहाँ-कहाँ होगा मतदान?

इराक़ी अंतरिम प्रधानमंत्री ईयाद अलावी ने कहा है कि देश में कई हिस्से ऐसे हैं जहाँ चुनाव कराना मुश्किल होगा.

अगर ऐसा हुआ तो इस चुनाव की वैधता पर सवाल उठ सकते हैं, ख़ास तौर पर अगर ये हिस्से बड़े हुए.

एक अमरीकी सैनिक जनरल पहले ही कह चुके हैं कि सुरक्षा की कमी के कारण चार प्रमुख क्षेत्रों में मतदाता वोट डालने के लिए आगे आने से कतराएँगे.

इन क्षेत्रों में देश के दो सबसे बड़े शहर बग़दाद और मूसल शामिल हैं, इनके अलावा सुन्नी बहुल फलूजा और तिकरित में चुनाव कराना एक बड़ी चुनौती होगी.

कौन जीतेगा इस चुनाव में?

शिया मुसलमान इराक़ में बहुसंख्यक हैं, उनकी संख्या 60 प्रतिशत से अधिक है इसलिए शिया पार्टियों की जीत के आसार सबसे अधिक हैं. देश की शिया पार्टियों ने यूनाइटेड इराक़ी एलायंस नाम का गठबंधन भी तैयार किया है.

शिया नेता सिस्तानी
शिया नेता सिस्तानी जैसे लोगों का क़द बढ़ सकता है

देश के अल्पसंख्यक सुन्नी मुसलमानों की तादाद 20 प्रतिशत के करीब है, ज्यादातर सुन्नी या तो चुनाव का बहिष्कार कर रहे हैं या फिर वोट नहीं डालेंगे क्योंकि उनकी बहुलता वाले इलाक़े हिंसा की चपेट में हैं.

शिया मुसलमानों के अलावा, अंतरिम प्रधानमंत्री अलावी और देश के उत्तरी हिस्से में रहने वाले कुर्दों ने भी मिलकर एक गठबंधन तैयार किया है.

अगर सुन्नी चुनाव से दूर रहे तो उनके उम्मीदवार नेशनल एसेंबली में नहीं पहुँच पाएँगे, इसके बाद चलने वाली हर प्रक्रिया में सुन्नी समुदाय के प्रतिनिधित्व का सवाल बना रहेगा.

विदेशी सेना की वापसी का क्या होगा?

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के मुताबिक़ विदेशी सेना को पूरी तरह संवैधानिक सरकार के गठन के बाद देश छोड़ देना होगा लेकिन अगर नई सरकार चाहे तो विदेशी सेना देश में रूक सकती है.

जून 2005 में विदेशी सैनिकों की तैनाती के बारे में समीक्षा होगी और इराक़ी सरकारी विदेशी सैनकों को कभी भी देश छोड़ने को कह सकती है.

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