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इराक़ चुनाव में राजनीतिक समीकरण | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इराक़ के चुनाव अब बस कुछ ही दिन दूर हैं और देश के शिया समुदाय में इन चुनावों के बारे में काफ़ी उत्साह नज़र आता है. इराक़ में क़रीब 60 प्रतिशत आबादी शिया है जिनका मूल अरबी है. शियाओं को यह भी भरोसा है कि इन चुनावों में उन्हें भारी सफलता मिलेगी. यूनाइटेड इराक़ी अलायंस नाम की पार्टी के बारे में कहा जा रहा है कि वह चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करेगी. इस पार्टी में ज़्यादातर नेताओं के नामों को इराक़ के सबसे सम्मानित नेता ने मंज़ूरी दी है. दूसरी तरफ़ कुर्द भी महसूस कर रहे हैं कि उन चुनावों के ज़रिए उन्हें एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, और संघीय इराक़ के एजेंडे पर ज़ोर देने का मौक़ा मिलेगा. लेकिन सुन्नी अरबों के इस चुनाव में शामिल होने के बारे में बहुत से सवाल खड़े हैं. ग़ौरतलब है कि इराक़ में सद्दाम हुसैन के शासनकाल तक सुन्नी मुसलमानों का दबदबा रहा है. कुछ सुन्नी पार्टियाँ चुनावों का बहिष्कार कर रही हैं और बहुत से सुन्नी ख़ुद को अपने इलाक़ों में जारी हिंसा की वजह से मतदान करने में असमर्थ पा सकते हैं. तो सवाल उठता है कि क्या ये चुनाव इराक़ के विभिन्न धार्मिक और नस्लीय समुदायों को नज़दीक लाने में कामयाब हो सकेंगे या उनके बीच और दूरियाँ बढ़ा देंगे? मुख्य शिया और कुर्द समुदायों ने चुनावों को देखते हुए अपनी पहले की दुश्मनी को एक किनारे कर दिया है. दो बड़े शिया धार्मक गुट - एससी आईआरआई और दाअवा यूनाइटेड इराक़ी अलायंस की सूची में एक साथ नज़र आते हैं. दूसरी तरफ़ दो प्रमुख कुर्द दल केडीपी और पीयूके भी संयुक्त रूप से उम्मीदवार खड़े कर रही हैं. लेकिन यह उत्सुकता भरा सवाल है कि चुनाव से पहले के ये गठबंधन चुनाव के बाद भी कितनी देर और दूर तक साथ चलेंगे. यूनाइटेड इराक़ी अलायंस की सूची में विभिन्न क़बायली नेताओं, धर्मनिरपेक्ष शिया नेताओं, कुछ सुन्नी और कुर्दों को भी चुनाव में खड़ा किया गया है जिनके राजनीतिक विचारों में काफ़ी भिन्नता है. यह राजनीतिक वैचारिक भिन्नता संविधान बनाते वक़्त उभरकर सामने भी आ सकती है. इराक़ के शिया धार्मिक दलों ने अगर क़ानून में इस्लामी तत्व शामिल करने की कोशिश की तो उन्हें कुर्द समुदाय और धर्मनिरपेक्ष गुटों से भारी विरोध का सामना करना पड़ सकता है. कुर्द ऐसे किसी भी प्रयास हर संभव विरोध करेंगे जिससे उनकी स्वायत्तता कम होती हो. एक बड़ा सवाल अब भी यही है कि अगर सुन्नी यह समझेंगे कि नई संसद में उनका समुचित प्रतिनिधित्व नहीं है तो उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी.? कुछ निराशावादियों ने विचार ज़ाहिर किया है कि ऐसी हालत में देश में गृहयुद्ध भी भड़क सकता है लेकिन आशावादियों का कहना है कि अमरीकी सेनाओं के वहाँ से हटने की समय सीमा तय किए जाने से चरमपंथी गतिविधियों को शांत किया जा सकता है और अंततः सुन्नी गुटों को भी राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल करने का रास्ता खुल सकेगा. |
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