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इराक़ में चुनावी तस्वीर अब भी धुँधली | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इराक़ में अंतरिम संसद के लिए चुनाव तीस जनवरी को होना निर्धारित है लेकिन अभी तक चुनावी तस्वीर इस रूप में साफ़ नहीं है कि चुनाव किस-किस संस्था के लिए हो रहे हैं और उसमें कौन-कौन लोग उम्मीदवार हैं. सुरक्षा की चुनौती ने चुनावों पर यह असर डाला है और प्रधानमंत्री ईयाद अलावी भी कह चुके हैं कि चुनाव के दौरान पूरी तरह सुरक्षा उपलब्ध कराना मुमकिन नहीं होगा. इराक़ के चुनाव में क़रीब एक करोड़ चालीस लाख लोग मताधिकार का प्रयोग कर सकेंगे. चुनाव में 111 चुनावी गुट और कुछ नेता इस चुनाव में खड़े हो रहे हैं लेकिन मुक़ाबला किस-किसके बीच है, यह अब भी साफ़ नहीं है. इराक के प्रधानमंत्री इयाद अलावी का देश की अगली अंतरिम संसद में वापस लौटना तो लगभग निश्चित है, लेकिन किस स्थिति में लौटेंगे इसके बारे में निश्चित तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता. वैसे अलावी, अमरीका के पसंदीदा उम्मीदवार हैं और इसीलिए उनके चुनावी अभियान के लिए ख़ूब खुल कर ख़र्च किया गया है लेकिन सवाल ये है कि दिन पर दिन बढ़ती हिंसा और अमरीकी प्रशासन के साथ उनकी नज़दीकियों को देखते हुए, वो मतदाता, जो अमरीकी क़ब्ज़े से जल्द से जल्द निजात पाना चाहता है, क्या उन्हें चुनकर वापस लाना चाहेगा. ऐसी स्थिति में क्या ये संभावना नहीं बनती कि, वो मतदाता, अलावी के विरोधी यूनाइटेड इराक़ी अलायंस पार्टी के नेता अब्दुल अज़ीज़ अल हक़ीम को अपना समर्थन दे. शिया और सुन्नी जहाँ तक हक़ीम का संबंध है, उन्हें बहुसंख्यक शिया बिरादरी के अधिकतर वोट मिलना तो लगभग तय है लेकिन ईरान के साथ उनके रिश्तों से सुन्नी बिरादरी और धर्मनिरपेक्ष ताक़तों को परेशानी हो सकती है. इधर इराकी चुनावों की गहमागहमी के बीच अरबी टोलीविज़न चैनल पर कथित तौर पर अलक़ायदा से जुड़े एक चरमपंथी अबू मुसाब अल ज़रक़ावी की आवाज़ ने चुनावों के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान कर दिया है और अमरीका पर देश में झूठा लोकतंत्र थोपने का आरोप लगाया है.
यह आवाज़ कहती है, "उनकी साज़िश और उनके सफ़ेद झूठ सारी दुनिया के सामने आ चुके हैं. इराक़ी सरकार की सुरक्षा के उनके दावे भी खोखले साबित हो चुके हैं. अब उनका पूरा ध्यान अमरीका के उस झूठ को स्थापित करने में लगा हुआ है जिसे वे लोकतंत्र कहते हैं." सुन्नी पार्टियों के गठबंधन इराकी अलायंस के अध्यक्ष और मौजूदा राष्ट्रपति ग़ाज़ी अल यावर सुन्नी विरादरी की आवाज़ माने जाते हैं. वैसे उनकी छवि एक धार्मिक उदारवादी नेता की है लेकिन देश में अमीकी सेना की मौजूदगी के ख़िलाफ़ उनका पक्ष बिल्कुल साफ है. ग़ाज़ी अल यावर को इस वक़्त चाहिए - सुन्नी बिरादरी के वोट, लेकिन हालात ऐसे हैं कि लगता है अधिकतर सुन्नी लोग मतदान का बहिष्कार करेंगे जिससे उनकी स्थिति कुछ कमज़ोर पड़ सकती है. इन चुनावों में सबसे अच्छी स्थिति इस वक़्त कुर्द समुदाय की नज़र आती है. दोनों प्रमुख कुर्द पार्टियों ने मिलकर एक कुर्द गठबंधन बना रखा है जिसे 14 फ़ीसदी तक वोट मिलने की संभावना है, यानी 275 सीटों वाली संसद में 15 सीटें कुर्द गठबंधन की हो सकती हैं. पूर्व विदेशमंत्री अदनान पचाची के नेतृत्व वाले स्वतंत्र लोकतांत्रिक ताक़तों के गठबंधन यानी अलायंस ऑफ इंडिपैंडेंट डैमोक्रैट्स को उन वोटरों का फ़ायदा मिलेगा जिन्होंने अभी तक ये तय नहीं किया है कि वे किसे वोट देना चाहते हैं. कुल मिला कर स्थिति ये दिखाई देती है कि जो पार्टी सबसे अधिक मत लेकर आएगी उसे कम से कम दो अन्य पार्टियों के साथ गठबंधन बनाना पड़ सकता है. |
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