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इराक़: रक्तरंजित रहा पूरा साल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अगर कोई मुद्दा साल के 365 दिनों में से 300 से अधिक दिन ख़बरों में रहा तो वो है इराक़. सद्दाम की गिरफ्तारी 2003 नवंबर में हुई जिसके बाद माना जा रहा था कि हिंसक घटनाओं में कमी आ जाएगी. इराक़ में तैनात अधिकतर कमांडरों और अधिकारियों ने शांति की भविष्यवाणी भी कर दी थी. लेकिन हुआ इसके उलट. हिंसा में और बढ़ोतरी हुई और सद्दाम की गिरफ्तारी के बाद मरने वालों की संख्या बढ़ गई. फलूज़ा, मूसल और बगदाद में आत्मघाती हमले अब भी हो रहे हैं. फरवरी महीने में मुक्तदा अल सद्र के समर्थकों के हमले में 100 से अधिक लोग मारे गए. सुन्नी बहुल फलूजा में कई दिनों की लड़ाई में सैकड़ों लोग मारे गए.
इसी दौरान आई अबू ग़रैब जेल में इराक़ी कैदियों के साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार की ख़बर और साथ में कुछ ऐसे वीडियो और चित्र जिन्होंने मानवाधिकार के प्रति अमरीकी प्रतिबद्धता की पोल खोल दी. नंगे कैदियों पर सिगरेट से जख्म बनाते अमरीकी सैनिकों की तस्वीरों पर रुम्सफेल्ड को सफाई देनी पड़ी और जांच की घोषणा करनी पड़ी. जून महीने मे सत्ता का औपचारिक हस्तांतरण इराक़ी सरकार को किया गया. प्रधानमंत्री थे ईयाद अलावी. साथ ही सद्दाम हुसैन को भी इराक़ सैनिकों की हिरासत में भेजा गया लेकिन रखा गया किसी गुप्त स्थान पर. इराक़ की स्थिति का असर पूरी दुनिया पर भी पड़ता रहा. भारत, नेपाल, फ्रांस, जापान और ब्रिटेन के नागरिकों का अपहरण किया गया. कुछ भारतीय बंधकों की तरह किस्मतवाले थे जो बच गए लेकिन अधिकतर बंधकों को मार डाला गया. मारग्रेट हसन और केन बिगले की रोती बिलखती तस्वीरें इराक़ की सुरक्षा स्थिति को स्पष्ट करती रही. देश भर में छिटपुट हमले तो होते ही रहे लेकिन अगस्त महीने में नज़फ शहर में शुरु हुई भयंकर लड़ाई. अमरीकी सैनिकों और मुक्तदा सद्र के समर्थकों के बीच जमकर घमासान में कई मरे.
नज़फ की लड़ाई ने अमरीकी सैनिकों की मौजूदगी पर सवालिया निशान लगाए. बात यहां तक पहुंची कि अक्तूबर महीने में संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफी अन्नान को कहना पड़ा कि इराक़ युद्ध से दुनिया बहुत सुरक्षित नहीं हुई है. अमरीका और ब्रिटेन कहते रहे हैं कि सद्दाम को हटाने से दुनिया और सुरक्षित हुई है. अन्नान के बयान पर अमरीकी राष्ट्रपति की कड़ी प्रतिक्रिया आई. क्यों न आती. बुश को चुनाव में भी इसी मुद्दे पर कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा था. बुश जीते और इसके बाद हुआ फैसला फलूजा पर हमले का ताकि चरमपंथियों को पूरी तरह तबाह कर दिया जाए. नवंबर माह में फलूज़ा पर जोरदार हमला किया गया. मदद करने के लिए ब्रिटेन की ब्लैक व़ाच टुकड़ियां भी पहली बार इराक़ गई. कई चरमपंथी मारे गए लेकिन हिंसा में किसी तरह की कमी नहीं आई. बताया गया चरमपंथी भाग कर मूसल चले आए. यानी हिंसा का चक्र बगदाद से फलूजा, फिर नजफ़ और मूसल में घूम रहा है. इस हिंसा के बीच आम इराक़ी की सुध लेने वाला कोई भी नहीं. जनवरी माह में चुनाव होने हैं. हिंसा में कमी नहीं है लेकिन चुनावों से उम्मीद सभी को है चरमपंथियों के अलावा. |
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