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बुधवार, 29 दिसंबर, 2004 को 15:51 GMT तक के समाचार
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सूनामी की चेतावनी देने में नाकामी क्यों?

सूनामी
सूनामी ने लंबा रास्ता तय किया लेकिन उसकी चेतावनी नहीं दी जा सकी
भारतीय समय के अनुसार 26 दिसंबर की सुबह छह बजकर 28 मिनट पर इंडोनेशिया में सुमात्रा के निकट, समुद्र के गर्भ में तेज़ हलचल शुरू हुई. भीषण भूकंप के कारण समुद्र ऊपर की तरफ उफ़ान के साथ तेज़ गति से उठने लगा- ऊँची और तेज़ लहरों या सूनामी का रेला, डूबते तट, बर्बाद होती आबादियाँ.

उसी दिन सुबह साढ़े आठ बजे के आसपास चेन्नई के मरीना बीच पर चहलकदमी करते लोग इस तबाही के शिकार हुए. दो घंटे बाद समुद्री उफान चेन्नई पहुँचा था. इन दो घंटों तक वाकई बेखबर थे भारत के उपग्रह- वैज्ञानिक समुद्रशास्त्री और मौसम की भविष्यवाणी करने वाले अनेक उपकरण और विशेषज्ञ.

आखिर क्यों? इस प्रश्न का उत्तर दिया भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो के जनसंपर्क निदेशक श्री कृष्णमूर्ति ने.

उन्होंने कहा, "आपदा प्रबंधन की हमारी योजना के तहत, पृथ्वी की कक्षा में स्थापित हमारे उपग्रहों में एक उपकरण लगा है, हाई रिजॉल्यूशन रेडियोमीटर जिससे हमें समुद्री तूफान और मौसम के बारे में जानकारी मिलती है. लेकिन सूनामी की भविष्यवाणी के लिए हमारे पास सुविधाएं नहीं हैं."

भारत की विवशता

सवाल उठता है कि जब प्रशांत सागरीय क्षेत्र के अनेक देशों में सूनामी के बारे में पहले से जानकारी प्राप्त करना संभव है, फिर भारत में क्यों नहीं?

अहमदाबाद स्थित उपग्रह मौसम विज्ञान और समुद्रशास्त्र शाखा के निदेशक डॉ. एमएस नारायणन का जवाब है - "हम यही बोल सकते हैं कि सूनामी लहरें यहाँ इस क्षेत्र में आम तौर पर देखी नहीं गई हैं इसलिए संभवतः लोगों ने इसके बारे में ज़्यादा सोचा नहीं होगा. हमारी संचार व्यवस्था बहुत अच्छी है. तूफान जैसी आपदाओं के दौरान हम पहले से चेतावनी देकर तटीय इलाके खाली करवा लेते हैं लेकिन इस बार जब इंडोनेशिया में ऐसा हुआ और हमने इसकी चेतावनी नहीं दी, इसका एक ही कारण मेरी समझ में आता है कि हमारे यहाँ सूनामी बहुत आम नहीं है."

भले ही भारत कई सालों से सूनामी की चपेट में नहीं आया हो, लेकिन जब लहरें उठीं और भारतीय तट की तरफ बढ़ीं तब चेतावनी तो दी ही जा सकती थी. ऐसा क्यों नहीं हुआ? इसरो के प्रवक्ता कृष्णमूर्ति कहते हैं, "हिंद महासागर में पहले कभी सूनामी के कारण ऐसी विपदा नहीं आई थी. इसलिए हमने इसकी तैयारी नहीं की थी- इसमें कोई शक नहीं कि हम सूचना पहुँचाने में मदद कर सकते थे."

डॉ. नारायणन भी मानते हैं कि यह सूचना सूनामी प्रभावित भारतीय इलाकों तक पहुँचाई जा सकती थी. वे कहते हैं, "यदि हमको पता चले कि इंडोनेशिया में ऐसा हुआ है तो भारत के समुद्र तटीय इलाकों में सूनामी लहरों की सूचना शायद पहुँचाई जा सकती है लेकिन अभी तक ऐसा पहले कुछ भी नहीं हुआ था इसलिए हमें शायद इसकी आशंका नहीं थी."

तकनीकी समस्याएँ

बहरहाल, सूनामी से बचने के उपाय क्या हैं? क्या करने की ज़रूरत है- डॉ. एमएस नारायणन की राय है, "सिर्फ़ उपग्रह से हम लोग शायद सब कुछ नहीं कर सकते हैं. उपग्रह और ज़मीन पर से काम करने वाली प्रणालियों, दोनों की सहायता से, इस पर निगरानी रख सकते हैं- और तब लोगों तक यह संदेश पहुँचाना होगा कि आपदा आने वाली है."

श्रीलंका में भी बहुत सारा प्रभावित क्षेत्र में संपर्क स्थापित नहीं हुआ है
श्रीलंका में पीड़ित महिला

ऑल्टीमीटर के इस्तेमाल से भी सूनामी की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है, न चेतावनी दी जा सकती है. हाँ एक और उपकरण है जिसे 'सी फ्लोर प्रेशर रिकार्डिंग सिस्टम' कहते हैं जो समुद्र तल में दबाव नापने के काम आता है, जिसे हिंद महासागर में लगाने की बात, अब भारत सरकार कर रही है.

जब समुद्र तल में हलचल होती है और दबाव में कोई परिवर्तन होता है तब इस प्रणाली के ज़रिए यह सूचना उपग्रहों तक पहुँचा दी जाती है ताकि समय रहते चेतावनी दी जा सके.

लेकिन अफ़सोस! ये बातें तब हो रही हैं जब हज़ारों लोग सूनामी की चपेट में आकर दम तोड़ चुके हैं- वो लोग जिन्हें शायद पहले से सचेत कर बचाया जा सकता था.

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कहाँ और कैसे शुरु हुई सुनामी लहरें?

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