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सोमवार, 22 नवंबर, 2004 को 01:37 GMT तक के समाचार
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इराक़ में चुनाव 30 जनवरी को
इराक़ के विद्रोही
इराक़ के कई इलाक़ों में अभी भी विद्रोही अमरीकी और इराक़ी सेना से भिड़े हुए हैं
हालांकि इराक़ में हिंसा की घटनाएँ अभी थमी नहीं हैं लेकिन वहाँ 30 जनवरी 2005 में संसदीय चुनाव करवाने की घोषणा की गई है.

सद्दाम हुसैन के हटने के बाद से देश भर में होने वाले ये पहले चुनाव होंगे.

चुनाव की तारीख़ की घोषणा बग़दाद में इराक़ की स्वायत्त चुनाव आयोग ने की है.

इस बीच बहस चल ही रही है कि क्या इतनी हिंसा के बीच देश में चुनाव करवाना संभव हो सकेगा?

इराक़ी चुनाव आयोग के प्रवक्ता फ़रीद अयार ने कहा कि उन इलाक़ों में भी चुनाव होंगे जहाँ हिंसा जारी है और उन फ़लूजा तथा रामादि जैसे उन इलाक़ों में भी जहाँ विद्रोहियों का दबदबा क़ायम है.

समाचार एजेंसी एपी से हुई बातचीत में उन्होंने कहा, "इराक़ का कोई भी प्रांत चुनाव से अलग नहीं रखा जा सकता क्योंकि पूरा इराक़ एक देश है और किसी भी इलाक़े को चुनाव से अलग रखना संवैधानिक नहीं होगा."

चुनाव आयोग के प्रवक्ता ने कहा कि चुनाव तय तारीख़ को ही होंगे और उन्हें नहीं लगता कि इसको आगे खिसकाने की संभावना है.

इराक़ में लोकतंत्र की स्थापना के लिए जो टाइम टेबल बनाया गया है उसके अनुसार जनवरी के अंत तक संसद का चुनाव हो जाना चाहिए.

अभी मतदाता सूची बनाने का काम चल रहा है. मतदाता सूची बनाने के काम में जुटे कुछ केंद्रों को हमले की वजह से बंद करना पड़ा है.

अब तक 122 राजनीतिक दलों का पंजीकरण हो चुका है जबकि इसके लिए 195 आवेदन आए थे.

30 जनवरी को होनेवाले चुनाव में एक अंतरिम संसद का चुनाव किया जाएगा. ये अंतरिम संसद देश के लिए एक संविधान तैयार करेगी.

इसके बाद नए संविधान पर एक जनमत सर्वेक्षण करवाया जाएगा. फिर अगले साल के अंत में देश में एक और आम चुनाव करवाया जाएगा.

संयुक्त राष्ट्र के एक अधिकारी ने बीबीसी से कहा कि चुनाव की तारीख़ घोषित करने का मतलब है कि इराक़ी चुनावी आयोग मानता है कि समय पर चुनाव करवाए जा सकते हैं.

इस बीच इराक़ी टेलीविज़न पर विज्ञापन दिखाए जा रहे हैं जिसमें इराक़ी जनता से मतदान करने की अपील की जा रही है.

बग़दाद से बीबीसी संवाददाता कैरोलीन हॉवली ने ख़बर दी है कि इराक़ में शिया समुदाय बहुसंख्यक समाज है और सद्दाम हुसैन के शासन काल में इसी समुदाय को सबसे ज़्यादा पीड़ित किया गया था. यही समुदाय चुनाव को लेकर ख़ासा उत्सुक दिखाई देता है.

लेकिन पहले सत्ता पर काबिज रहे सुन्नी समुदाय की चुनावों में कोई दिलचस्पी दिखाई दे रही है.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि ज़्यादातर इलाक़ों में सुन्नी समुदाय ही चुनाव का विरोध कर रहा है और जहाँ भी अमरीकी और इराक़ी सेना को विद्रोहियों का सामना करना पड़ रहा है वे सुन्नी बहुल इलाक़े ही हैं.

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