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शुक्रवार, 12 नवंबर, 2004 को 08:05 GMT तक के समाचार
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काहिरा में हुआ राजकीय सम्मान
काहिरा में सम्मान
अराफ़ात का शव पेरिस से काहिरा लाया गया जहाँ उनका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हो रहा है
मिस्र की राजधानी काहिरा में आज राजकीय सम्मान के साथ फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात का अंतिम संस्कार किया गया.

इसके बाद उनका शव पश्चिमी तट के शहर रामल्ला ले जाया जा रहा है जहाँ उनको दफ़नाया जाएगा.

उनका अंतिम संस्कार काहिरा में सेना अधिकारियों के एक क्लब में स्थित एक मस्जिद में किया गया.

इस अवसर पर अरब देशों के अलावा दुनिया भर के राजनेता अराफ़ात को श्रद्धाँजलि देने के लिए जुटे हैं जिनमें भारत के भी कई मंत्री शामिल थे.

मिस्र के अधिकारियों ने पहले ही कह दिया था कि अराफ़ात के अंतिम संस्कार में आम लोग नहीं आ सकते और सुरक्षा कारणों से आस-पास के रास्ते बंद कर दिए गए थे.

इससे पहले गुरूवार को अराफ़ात का शव पेरिस से एक विमान से उनके जन्मस्थान काहिरा लाया गया जहाँ उनको पूरा सैनिक सम्मान दिया गया.

यासिर अराफ़ात का निधन गुरूवार तड़के साढ़े तीन बजे पेरिस के अस्पताल में हुआ जहाँ 29 अक्तूबर को उनको भर्ती किया गया था.



श्रद्धांजलि

रामल्ला
रामल्ला में अराफ़ात को दफ़नाने के लिए जगह तैयार की गई है

यासिर अराफ़ात को श्रद्धांजलि देने के लिए तमाम देशों के राजनेता काहिरा में जुटे जिनमें कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष भी हैं.

भारत से जो राजनेता आए हैं उनमें विदेश मंत्री नटवर सिंह, रेल मंत्री लालू यादव, संसदीय कार्य मंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद और विदेश राज्य मंत्री ई अहमद शामिल हैं.

अल्जीरिया, बांग्लादेश, मिस्र, इंडोनेशिया, लेबनान, दक्षिण अफ़्रीका, सूडान, ट्यूनीशिया, यमन और ज़िम्बाब्वे के राष्ट्रपति काहिरा गए हैं.

वहीं पाकिस्तान, श्रीलंका, मलेशिया और स्वीडन के प्रधानमंत्री काहिरा पहुँचे हैं.

अमरीका की ओर से सहायक विदेश मंत्री विलियम बर्न्स गए हैं जबकि ब्रिटेन की ओर से विदेश मंत्री जैक स्ट्रॉ श्रद्धांजलि देने पहुँचे हैं.

जोर्डन के शाह अब्दुल्ला और सऊदी अरब के युवराज अब्दुल्ला अराफ़ात को श्रद्धांजलि देने काहिरा गए हैं.

रामल्ला

राजकीय सम्मान के बाद अराफ़ात के शव को पश्चिमी तट के शहर रामल्ला ले जाया जाएगा जहाँ उनको दफ़नाया जाएगा.

ऐसी ख़बरें है कि अराफ़ात को कंक्रीट के एक ऐसे ताबूत में दफ़न किया जाएगा जिसमें यरूशलम की अल अक़्सा मस्जिद की मिट्टी भी ली जाएगी.

अराफ़ात की इच्छा थी कि उन्हें यरूशलम में ही दफ़नाने दिया जाए मगर इसराइल ने इसकी अनुमति नहीं दी.

पिछले तीन वर्ष से अराफ़ात रामल्ला में ही नज़रबंद थे.

फ़लस्तीनियों का कहना है कि उनको उम्मीद है कि कभी भविष्य में उनके ताबूत को यरूशलम ले जाने दिया जाएगा.

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