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शुक्रवार, 05 नवंबर, 2004 को 07:47 GMT तक के समाचार
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अराफ़ात के बाद अब होगा क्या?
यासिर अराफ़ात
अराफ़ात फ़लस्तीन का प्रतीक बन गए थे
फ़लस्तीनियों के प्रतीक और उद्धारक मोहम्मद अब्दुल रहमान अब्दुल रऊफ़ अराफ़ात अल-क़ुदवा अल-हुसैनी उर्फ़ यासिर अराफ़ात की मौत से फ़लस्तीनियों के सामने बहुत कम विकल्प बचे हैं.

उनके पास विकल्प बचा है कि या तो वे इसराइल के साथ बातचीत के ज़रिए कुछ हासिल करने की कोशिश करें या फिर अपना ऐसा सपना पूरा करने के लिए लड़ते रहें जो शायद कभी पूरा ना हो.

यासिर अराफ़ात वर्षों तक लड़े. वह फ़लस्तीनी लड़ाई का चेहरा और प्रतीक बन गए थे. पूरा फ़लस्तीन वापस लेने के उनके लक्ष्य ने ही वो रास्ता बनाया जिसके ज़रिए उसका कुछ हिस्सा मिलने के लिए बातचीत हो सकी.

1993 में अमरीकी राष्ट्रपति कार्यालय व्हाइट हाउस के आँगन में यासिर अराफ़ात ने यिद्ज़ाक रबीन से हाथ मिलाया था और उन्हें अराफ़ात ने अपना दोस्त कहकर पुकारा था. 2000 में कैंप डेविड में उन्होंने एक और पूर्व दुश्मन और जनरल इयूद बराक से बातचीत की थी.

फिर भी आख़िर में यासिर अराफ़ात ने बातचीत से यह कहते हुए हाथ खींच लिया कि इसराइल ने जो कुछ देने की पेशकश की थी वह 'काफ़ी' नहीं था. यह कोई नहीं जान सका कि उनके लिए 'काफ़ी' क्या था.

हो सकता है कि उन्हें एक राज्य और यरुशलम का एक हिस्सा मिल जाता लेकिन उन्हें इसके लिए पश्चिमी तट का कुछ हिस्सा देना पड़ सकता था. लेकिन जो फ़लस्तीनी शरणार्थी अपनी घर वापसी को अपना अधिकार बता रहे हैं, उनका मसला अनसुलझा ही रहता.

हमेशा की तरह ही फ़लस्तीनियों ने कई वर्षों तक मेज़ पर तैयार पड़ी रही पेशकश को ठुकरा दिया और भविष्य में किसी बेहतर पेशकश की उम्मीद भी छोड़ दी.

सवाल

सवाल ये है कि अराफ़ात ने क्या कोई सैद्धांतिक रुख़ अपनाया या फिर उन्होंने पूर्व इसराइली विदेश मंत्री अब्बा एबान के उस कथन को सही ठहराया जिसमें उन्होंने कहा था, "फ़लस्तीनियों ने मौक़ा गँवाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ा है."

यासिर अराफ़ात

एक पश्चिमी देश के एक राजनयिक ने हाल ही में कहा था, "हुआ ये है कि इसराइली जीत गए हैं और वे बस्ती को इस तरह बसा रहे हैं जैसाकि वे चाहते हैं." हालाँकि यहाँ बस्ती के बजाय बस्तियों शब्द भी इस्तेमाल किया जा सकता था.

इस तरह अब फ़लल्तीनियों के सामने बहुत कम विकल्प हैं. अगर उन्होंने अपनी नज़र नीची नहीं की तो उन्हें कुछ नहीं मिलेगा और कुछ नहीं मिलने के परिणामस्वरूप प्रतिरोध और बढ़ेगा.

वे उम्मीद कर सकते हैं कि ग़ज़ा में उन्होंने जो कुछ किया वही वे पश्चिमी तट में भी कर सकते हैं यानी जगह को रहने अयोग्य बना दिया जाए.

चरमपंथी संगठन हमास की यह रणनीति हो सकती है जो एक यहूदी राज्य की समाप्ति चाहता है. लेकिन यह साफ़ नहीं है कि क्या वह ऐसी रणनीति अपनी सकता है और ख़तरा ये है कि फ़लस्तीनी नाकाम हो सकते हैं और फिर उसी अंधेरे में पहुँच सकते हैं जहाँ से यासिर अराफ़ात उन्हें निकाल कर आए थे.

यह सही है कि कोई इसराइली प्रधानमंत्री अब वैसा नहीं कह सकता जैसाकि कभी गोल्डा मायर ने कहा था कि "फ़लस्तीनी लोग जैसी कोई चीज़ नहीं है."

एक और ख़तरा ये भी है कि फ़लस्तीनियों की आपसी लड़ाई भड़क सकती है. यासिर अराफ़ात की एक कमज़ोरी ये थी कि उन्हें अपने प्रतिद्वंद्वी पसंद नहीं थे. उनके कोई उत्तराधिकारी तैयार नहीं किए गए.

यह संभव है कि कोई नया व्यक्तित्व विकल्प के तौर पर उभरे और नेतृत्व प्रदान करे लेकिन यह भी उतना ही संभव है कि विभाजन बने रहें.

हो सकता है कि अगले चालीस साल और संघर्ष जारी रहे और फ़लस्तीनियों को कुछ ऐसा हासिल नहीं हो जिसे वे उपलब्धि के तौर पर दिखा सकें.

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