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गुरुवार, 28 अक्तूबर, 2004 को 13:10 GMT तक के समाचार
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फ़लस्तीनी संघर्ष के प्रतीक अराफ़ात
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मिस्र के एक नेता को 1953 में यासिर अराफ़ात की एक चिट्ठी मिली. अत्यंत संक्षिप्त चिट्ठी. कहते हैं ख़ून से लिखी उस चिट्ठी के शब्द थे- फ़लस्तीन को मत भुलाना.

उस घटना के पाँच दशक बीत चुके हैं, लेकिन ना तो उस चिट्ठी को लिखने वाले को भुलाना संभव है, और ना ही उसके लिखे उन शब्दों को.

यासिर अराफ़ात फ़लस्तीनी संघर्ष के प्रतीक हैं. उन्होंने इस लंबी लड़ाई में अपना सब कुछ झोंक दिया.

अराफ़ात एक फ़लस्तीनी दंपती के घर अगस्त 1929 में मिस्र में पैदा हुए, और वहीं पले-बढ़े. लेकिन उन्होंने हमेशा ख़ुद को पक्का फ़लीस्तीनी माना.

उनका असली नाम मोहम्मद अब्दुल रउफ़ अराफ़ात अल-क़ुदवा अल-हुसैनी है. और माना जाता है कि ब्रिटिश सेना के हाथों मारे गए एक व्यक्ति के सम्मान में उन्होंने अपने नाम में यासिर जोड़ लिया.

सशस्त्र संघर्ष

वर्ष 1948 में इसराइल की स्थापना के बाद अराफ़ात ने इसके विरोध के लिए सशस्त्र संघर्ष के विकल्प को चुना.

इसके लिए उन्होंने गुपचुप तरीक़े से फ़तह संगठन की नींव डाली.

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अराफ़ात की पत्नी सुहा

अराफ़ात स्वेज़ नहर संघर्ष में मिस्र के लिए और अरब-इसराइल संघर्ष में अरबों के लिए लड़ने का दावा कर चुके हैं.

इसराइल ने 1967 की लड़ाई में अरब देशों को परास्त करने के साथ-साथ पश्चिमी तट और ग़ज़ा पर भी क़ब्ज़ा कर लिया.

ऐसे में फ़तह ही एकमात्र संगठन बच गया जो कि इसराइल के विरोध में कार्रवाई करने में सक्षम हो.

इसके दो साल बाद अराफ़ात फ़लस्तीनी मुक्ति संगठन या पीएलओ के अध्यक्ष बने.

राजनीतिक क़द बढ़ते जाने के साथ अराफ़ात के सामने नए-नए ख़तरे भी आते गए.

पहले उन्होंने जॉर्डन में रहकर अपने संगठन को नेतृत्व दिया. लेकिन वहाँ से 1970 में निकाले जाने के बाद वह पहले लेबनान और फिर ट्यूनीशिया में रहे.

जब समर्थकों ने 1987 में पश्चिमी तट में विद्रोह या इंतिफ़ादा शुरू किया, अराफ़ात स्वयं निर्वासन में रहे.

उन्होंने जीवन के 27 साल निर्वासन में बिताए.

शांति प्रयास

कुवैत संकट के दौरान उन्होंने सद्दाम हुसैन को समर्थन देने की भूल की और इसका खामियाज़ा भुगता खाड़ी देशों में अपने घटे समर्थन के रूप में.

लेकिन इसके बाद उन्होंने इसराइल के साथ शांति स्थापना के प्रयास किए. गुप्त बातचीत के कई दौर के बाद 1993 का ओस्लो शांति समझौता सामने आया.

अगले ही साल उनके इस प्रयास को मान्यता भी मिली, जब उन्हें इसराइल के प्रधानमंत्री यित्ज़ाक रबीन और विदेश मंत्री शिमोन पेरेज़ के साथ नोबेल शांति पुरस्कार मिला.

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इसराइली सैनिकों ने अराफ़ात को रामल्ला में तीन वर्षों से घेर रखा था

अराफ़ात ग़ज़ा लौट आए और वहाँ फ़लस्तीनी राष्ट्रीय प्राधिकरण की स्थापना की, और 1996 में इसके अध्यक्ष चुने गए.

उधर फ़लस्तीनी समस्या का पूरी तरह समाधान नहीं हो पाया. फ़लस्तीनी शरणार्थियों और यहूदी बस्तियों जैसे मुद्दे उठते रहे.

वर्ष 1995 में रबीन की हत्या हो गई. टिकाऊ शांति की उम्मीदें कम होती गईं.

ऐसे में फ़लस्तीनियों ने 2000 में नए सिरे से सशस्त्र इंतिफ़ादा की घोषणा की.

नज़रबंद

अप्रैल 2002 में इसराइली प्रधानमंत्री अरियल शेरॉन ने उनपर आतंकवाद फैलाने का आरोप लगाया और इसराइली सैनिकों ने पश्चिमी तट के रामल्ला स्थिति उनके मुख्यालय की घेराबंदी कर डाली.

तब से अराफ़ात वहीं एक तरह से क़ैद रहे.

इस बीच उनके फ़लस्तीनी आलोचकों ने भी उन पर भ्रष्ट प्रशासन देने, इसराइल को रियायत देने और अमरीका पर ज़रूरत से ज़्यादा विश्वास करने के आरोप लगाए.

ऐसे में 1974 में संयुक्तराष्ट्र महासभा की वो घटना याद आती है जब अंतरराष्ट्रीय जगत को संबोधित करते हुए अराफ़ात ने कहा कि वो शांति के प्रतीक जैतून की डाल और आज़ादी के दीवाने की बंदूक के साथ आए हैं.

उन्होंने दुनिया भर से आए प्रतिनिधियों से आगे कहा, "मेरे हाथों से जैतून की डाल गिरने नहीं देना."

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