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अराफ़ात के बाद ज़िम्मेदारियाँ किस पर? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
75 वर्षीय फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात को इलाज के लिए फ्रांस ले जाए जाने के बाद यह सवाल भी उठा है कि उनकी ज़िम्मेदारियाँ कौन निभाएगा. यासिर अराफ़ात को फ़लस्तीनी राष्ट्र का प्रतीक माना जाता है और वे पश्चिमी तट और ग़ज़ा पट्टी में अनेक फ़लस्तीनी संस्थानों के मुखिया रहे हैं. फ़लस्तीन के दो राष्ट्रीय संस्थानों फ़लस्तीनी प्राधिकरण और फ़लस्तीनी मुक्ति संगठन (पीएलओ) के मुखिया हैं. फ़लस्तीनी प्राधिकरण पर पश्चिमी तट और ग़ज़ा पट्टी के प्रशासन की ज़िम्मेदारी है और पीएलओ फ़लस्तीनियों का प्रतिनिधित्व करता है. पीएलओ ही इसराइल के साथ शांति वार्ताओं में भाग लेता है और उसे दुनिया भर में फ़लस्तीनियों का प्रतिनिधि माना जाता है. अराफ़ात फ़तेह संगठन के अध्यक्ष भी हैं. फ़तेह पीएलओ का सबसे बड़ा घटक दल है. अराफ़ात की ग़ैरमौजूदगी में कोई एक व्यक्ति ऐसा नहीं है जिस पर इतनी सारी ज़िम्मेदारियाँ एक साथ डाली जा सकें इसलिए इन ज़िम्मेदारियों को बाँटना पड़ा है. मौजूदा प्रधानमंत्री अहमद क़ुरैई फ़लस्तीनी प्रशासन की रोज़मर्रा की ज़िम्मेदारी संभालेंगे. पूर्व प्रधानमंत्री महमूद अब्बास को पीएलओ को संभालने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है और ऐसी ख़बरें हैं कि फिलहाल फ़तेह संगठन की ज़िम्मेदारी भी अस्थाई तौर पर उन्हें ही दी गई है. ऐसा समझा जा रहा है कि अराफ़ात की ग़ैर मौजूदगी में शायद की कोई नीतिगत फ़ैसला लिया जाए. और अगर किसी राजनीतिक फ़ैसले की ज़रूरत पड़ी तो यह संभव है कि कोई भी फ़ैसला सामूहिक तौर पर ही किया जाए. हालाँकि अराफ़ात के स्वास्थ्य के लेकर उठी चिंताओं ने अटकलों का बाज़ार तो गर्म कर ही दिया है जिससे फ़लस्तीन के अंदरूनी हालात में बदलाव महसूस किया जाने लगा है. कहा जा रहा कि फ़तेह संगठन में अंदरूनी सत्ता संघर्ष शुरू हो गया है और चरमपंथी संगठन हमास भी अपनी ताक़त बढ़ा रहा है. विश्लेषक कहते हैं कि फ़तेह संगठन जितना कमज़ोर होगा, हमास उतना ही मज़बूत होगा और उसके विकल्प के तौर पर उभरेगा. |
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