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मंगलवार, 09 नवंबर, 2004 को 23:26 GMT तक के समाचार
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अराफ़ात के बाद:कुछ सवाल?
अराफ़ात के चाहने वाले
फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात की मौत के बाद ऐसे सवाल उठ रहे हैं कि अब फ़लस्तीन में क्या होगा?

अराफ़ात कितने महत्वपूर्ण थे.

पिछले कई सालों से अराफ़ात अलग-थलग पड़ गए थे लेकिन उनका प्रतीकात्मक महत्व बहुत अधिक रहा है. इसराइली सेना ने तीन साल से उन्हें रमल्ला के एक परिसर में नज़रबंद कर रखा था. इतना ही नहीं अमरीका और इसराइल पिछले सालों में साफ़ कहते रहे हैं कि वो अराफ़ात से कोई बात नहीं करना चाहते.

फ़लस्तीनी प्राधिकरण, जिसके अराफ़ात अध्यक्ष थे, उसकी छवि लोगों में ज़्यादा अच्छी नहीं है. फ़लस्तीनी जनता का मानना है कि प्राधिकरण अक्षम है और उसमें व्यापक भ्रष्टाचार है.

इन सबके बावजूद अराफ़ात फ़लस्तीन के सबसे लोकप्रिय नेता थे और फ़लस्तीन राष्ट्र के लिए चल रहे संघर्ष के प्रतीक भी.

अराफ़ात एकमात्र ऐसे नेता थे जो पूरी फ़लस्तीनी जनता की ओर से कुछ भी कह सकते थे या फिर किसी भी समझौते पर मुहर लगा सकते थे.

कुछ साल पहले जब अमरीका और इसराइल ने फ़लस्तीनी जनता से अराफ़ात का साथ छोड़ने की अपील की तो लोग अराफ़ात से और अधिक जुड़ गए.

क्या अराफ़ात के बाद का नेता चुन लिया गया?

फ़लस्तीन के इस शीर्ष नेता की मौत के बाद अब फ़लस्तीनी नेतृत्व और संघर्ष पर उसका गंभीर असर पड़ेगा.

फ़लस्तीनी मुक्ति संगठन (पीएलओ) या फ़लस्तीनी प्राधिकरण में नेतृत्व का कोई ढाँचा नहीं है. अराफ़ात ने अपने उत्तराधिकारी के तौर पर किसी के नाम की घोषणा कभी नहीं की. संभवतः ऐसा करना अराफ़ात के लिए घातक सिद्ध हो सकता था.

फ़लस्तीनी प्राधिकरण के सामान्य क़ानून के मुताबिक अगर नए अध्यक्ष का चुनाव नहीं होता है तो फ़लस्तीनी प्रशासन के स्पीकर रॉही फत्तुह 60 दिनों के लिए अध्यक्ष का कार्यभार संभालेंगे. यह एक तकनीकी बात है क्योंकि फत्तुह की फ़लस्तीनी जनता में कोई ख़ास पैठ नहीं है.

उम्मीदवार कौन-कौन?

फ़लस्तीनियों की समस्या का एक बड़ा कारण यह भी है कि वहाँ सत्ता के कई केंद्र हैं. एक गुट पुराने नेता और पीएलओ के महासचिव महमूद अब्बास के साथ है जो अराफ़ात के क़रीबी समझे जाते हैं.

दूसरा धड़ा स्थानीय नेताओं का है जिसमें पूर्व सुरक्षा प्रमुख मोहम्मद दहलान और इंतिफ़ादा के नेता मारवन बरगूती का है. बारगूती इस समय इसराइली जेल में हैं.

इसके अलावा फ़तह और इस्लामिक जेहाद और अन्य हथियारबंद गुट हैं जो राजनीति में अप्रत्यक्ष दख़ल रखते हैं.

क्या अराजकता की संभावना है?

बहुत हद तक.

जुलाई में ग़ज़ा पट्टी और पश्चिमी तट में फ़लस्तीनी गुटों के बीच खुली जंग हुई थी जिसमें कई लोगों का अपहरण हुआ और गोलीबारी की घटनाएं भी हुईं.

माना जाता है कि ये लड़ाईयाँ सत्ता पाने को लेकर हुई थीं. एक गुट जवान लोगों का था जो अराफ़ात के नेतृत्व में हथियारबंद संघर्ष के हामी था. एक और गुट फ़लस्तीनी प्राधिकरण में ही बदलाव का पक्षधर था.

हमास और अन्य हथियारबंद गुटों का क्या होगा?

अगर सत्ता के लिए हिंसक लड़ाई होती है और माहौल अराजक होता है तो सबसे अधिक फ़ायदा हमास जैसे गुटों को ही होगा क्योंकि ग़ज़ा में उनकी तूती बोलती है. हमास के पास हथियारों की कमी नहीं है और वो काफी संगठित भी है.

हमास और इस्लामिक जेहाद ने पहले भी अराफ़ात पर सीधे हमला करने या उनकी आलोचना नहीं करने का रास्ता अपनाया था लेकिन अब अराफ़ात के नहीं रहने पर शायद ही वो राजनीति में सीधे दख़ल से खुद को रोक सके.

इसराइल का रुख़ क्या होगा?

ज़्यादातर इसराइली अराफ़ात को पसंद नहीं करते और उन पर भरोसा नहीं करते. अराफ़ात के जाने से वो खुश ही होंगे. इसराइल के कट्टरपंथियों ने अराफ़ात को फ़लस्तीन से बाहर करने का भी सुझाव दे दिया था.

इसराइल के वर्तमान प्रधानमंत्री अरियल शेरॉन और अराफ़ात कई बार एक दूसरे के ख़िलाफ आग उगल चुके हैं.

लेकिन फ़लस्तीनी क्षेत्रों में अराजक माहौल से शायद इसराइल को फ़ायदा न हो. इसराइल चाहेगा कि अराफ़ात के बाद कोई ऐसा नेता आए जो उनके दबाव में उनके अनुरुप काम कर सके या फिर ऐसा नेता हो जिससे कोई ठोस समझौता हो सके.

अराफ़ात की मौत के बाद सैद्धांतिक रुप में ग़ज़ा से इसराइली सेना की वापसी में और देरी होगी क्योंकि अराफ़ात के बिना ग़ज़ा में हमास की ही चलेगी जो शेरॉन कभी नहीं चाहेंगे.

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