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सवाल अराफ़ात की संपत्ति का | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जैसे जैसे फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात के बिगड़ते स्वास्थ्य को लेकर चिंताएं बढ़ने के साथ यह सवाल उठने लगा था कि उनकी मौत के बाद करोड़ों डॉलर की राशि का क्या होगा जो उनके नियंत्रण में है. विशेषज्ञों का मानना है कि जब अराफ़ात फ़लस्तीनी मुक्ति संगठन(पीएलओ) के अध्यक्ष थे, उन वर्षों के दौरान व्यापार और टैक्स के ज़रिये बड़ी राशियाँ सीधे उनके बैंक खाते में जमा की जाती रही हैं. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का कहना है कि फ़लस्तीनी प्रशासन को वर्ष 2000 से प्रति वर्ष एक अरब डॉलर से अधिक अंतरराष्ट्रीय सहायता मिलती रही है. फ़ोर्ब्स पत्रिका ने यासिर अराफ़ात की संपत्ति को 30 करोड़ डॉलर के क़रीब आँका है. यासिर अराफ़ात के पास कितना धन है यह अटकलों का विषय बना हुआ है, महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि इसमें उनकी निजी संपत्ति कितनी है और फ़लस्तीनी सार्वजनिक कोष का हिस्सा कितना है यह स्पष्ट नहीं है. इसराइल-फ़लस्तीन सूचना एवं अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉक्टर गरशन बास्किन कहते हैं, चुनिंदा लोग ही जानते हैं कि इस बारे में वास्तविकता क्या है. यासिर अराफ़ात की पत्नि सुहा ने पहले ही कह दिया था कि वो नहीं चाहतीं कि फ़लस्तीनी प्रधानमंत्री अहमद कुरई और अन्य मंत्री यासिर अराफ़ात से अस्पताल में मिलें. यह अटकलें भी गर्म है कि सुहा अराफ़ात और फ़लस्तीनी नेताओं के बीच टकराव का एक कारण अराफ़ात के बैंक खातों का नियंत्रण भी रहा है. मगर डॉक्टर बास्किन का मानना है कि सुहा अराफ़ात का यासिर अराफ़ात के धन और बैंक खातों पर कोई नियंत्रण हो, ऐसा नहीं लगता. कितना धन पीएलओ के एक पूर्व वित्त मंत्री जावेद अल ग़ुसैन ने एक समाचार एजेंसी को दिये इंटरव्यू में कहा कि 1980 के दशक में अरब देशों से फ़लस्तीन राष्ट्रीय कोष को सालाना 20 करोड़ डॉलर मिलते थे. इसके तहत यासिर अराफ़ात को हर महीने एक करोड़ डॉलर का चेक मिलता था.
लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़ ओरिएंटल एंड अफ़्रीकन स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर मुश्ताक़ ख़ान का कहना है 1994 में इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच हुए ओस्लो समझौते के तहत ऐसी प्रणाली बनाई गई जिसके अंतर्गत फ़लस्तीनियों से इकठ्ठा किए गए टैक्स की राशि अराफ़ात के निजी बैंक खातों में जमा की जाती थी. डॉक्टर ख़ान का कहना है कि इसके बारे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को पूरी जानकारी भी थी. ऐसा इसलिए किया गया था ताकि उस समय यासिर अराफ़ात द्वारा उठाए जा रहे कदमों का कई फ़लस्तीनी नेताओं की ओर से भी विरोध हो रहा था. कूटनीतिज्ञों का मानना था कि यासिर अराफ़ात का इस धन पर नियंत्रण हो तो वो राजनीतिक सौदेबाज़ी के लिए इसका इस्तेमाल कर पाएँगे. आगे जब अंतरराष्टीय मुद्रा कोष और यूरोपीय संघ ने यह सवाल उठाने शुरु किए कि उनके द्वारा दी गई सहायता राशि का क्या हुआ तो एक जाँच शुरु की गई. सुधारवादी वित्तमंत्री सलाम फ़याद ने पूरे मामेला का लेखा-जोखा देखा और पाया गया कि 90 करोड़ डॉलर का हिसाब नहीं मिल रहा है. हालाँकि बाद में फ़याद ने कहा कि इसका काफ़ी सारा हिस्सा ढाँचागत परियोजनाओं में लगाया गया है या व्यापार में निवेश किया गया है. मगर अभी काफ़ी सारा धन है जिसका ठीक ठीक पता नहीं है. डॉक्टर बास्किन का कहना है कि एक व्यक्ति हैं जो इस पर रौशनी डाल सकते हैं और वो हैं यासिर अराफ़ात के आर्थिक सलाहकार मोहम्मद रशीद जो पेरिस पहुँचे दल में शामिल थे. |
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