श्रीलंका में पहचान का संकट

श्रीलंका में भारत के आधार कार्ड से कुछ मिलता जुलता नेशनल आईडेन्टिटी कार्ड या राष्ट्रीय पहचान पत्र होता है. लेकिन यह उससे कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है. यह 16 साल के ऊपर के हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य है.
इसे 1972 में लागू किया गया था. देश के उत्तरी हिस्से में रहने वाले तमिल लोगों के लिए ये कार्ड खास तौर पर एक बड़ी समस्या का कारण बन गया है.
गृह युद्ध के दौरान इन लोगों के नेशनल आईडेन्टिटी कार्ड या तो गुम हो गए या नष्ट हो गए.
अपने पहचान पत्र की समस्या को निपटाने के लिए किलिन्नोची में लोग जमा हुए हैं . चुनावों की निष्पक्षता के लिए काम करने वाला एक समूह तमिल लोगों को पहचानपत्र दिलाने का प्रयास कर रहा है.
यहाँ जमा हुए तमिल लोगों में से किसी ने बताया कि उसका पहचानपत्र खो गया है जबकी किसी और ने बताया कि उसने कभी पहचान पत्र के लिए आवेदन नहीं किया क्योंकि उनके पास जन्म प्रमाण पत्र ही नहीं था.
तमिल छापामारों और श्रीलंका की सेनाओं के बीच तीन साल पहले ख़त्म हुए गृह युद्ध के दौरान हज़ारों तमिल उत्तरी श्रीलंका से खाड़ियों को पार करके भाग गए थे.
डगलस सूही बताती हैं, “हालत इतने बुरे थे कि कि हम सामान भी नहीं ले पाए. मैं अपने पहचान पत्र को नहीं खोना चाहती थी. इसलिए मैंने उसे अपने ब्लाउज पर लगा लिया लेकिन वो पानी में भीग गया और दो टुकड़े हो गया, किसी काम का नहीं रहा."
पहचान पत्र के बिना आप श्रीलंका में बैंक खाता नहीं खोल सकते, कहीं से कोई चेक मिले तो आप उसका भुगतान नहीं ले सकते. एलटीटीई के ज़माने में उत्तरी श्रीलंका में यह पहचान पत्र बेमतलब थे.
मुदियाप्पू मरियासिली गृह युद्ध की समाप्ति के पहले विद्रोहियों के इलाके में रहते थे. मरियासिली के अनुसार, "एलटीटीई सेना की तरह की नहीं थी.वहां कोई पहचान पत्र नहीं मांगता था.लेकिन अब हर जगह हमसे पहचान पत्र माँगा जाता है. "
गृह युद्ध के ज़माने में श्रीलंका की सेना तमिल छापामारों की पहचान के लिए पहचान पत्र का सहारा लेती थी. चूंकि उनके पास पहचान पत्र नहीं होते थे इसलिए वो पहचाने जाते थे.
योगनाथान मयूरन उन दिनों के बारे में बताते हैं. मयूरन कहते हैं, "एक बार मुझे जाफना से लौटे वक़्त पकड़ लिया था. मेरे पास पहचान पत्र नहीं था. छह दिन तक मुझसे पूछताछ हुई. बाद में मेरे गांव के सरपंच की ज़िम्मेदारी पर मुझे छोड़ा गया."
सेल्वराज लीलावती उन तमिल लोगों में से एक हैं जिनके पास पहचान पत्र कभी था ही नहीं.
लीलावती बताती हैं " मेरे पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं नहीं है. बिना उसके आप पहचान पत्र नहीं बनवा सकते. बिना पहचान पत्र के मैं अपने शहर के बाहर कहीं नाहीं जा सकती."
लोगों को पहचान पत्र दिलवाने के लिए काम कर रहे श्रीधरन सबयागम कहते हैं कि इस पहचान पत्र की वजह से अल्पसंख्यक अलग से पहचाने जाते हैं. यह उनके अनुसार कई बार भेदभाव का करण बनता है.
लेकिन वो भी यह मानते हैं कि पहचान पत्र के नुकसान कम हैं और फायदे अधिक.
सरकारी अधिकारीयों का कहना है कि इस कार्ड का कोई नुकसान नहीं है और वो जल्द ही एक अत्याधुनिक किस्म का नया पहचान पत्र लाने जा रहे हैं.












