'इंटरनेट मूलभूत मानवाधिकार है'

संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिनिधि का कहना है कि इंटरनेट की उपलब्धता मानवाधिकार है

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संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट का कहना है कि इंटरनेट की उपलब्धता मूलभूत मानवाधिकार है.

संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिनिधि फ़्रैंक ला रू ने ये रिपोर्ट विचारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के प्रचार और संरक्षण के अधीन तैयार की है.

उनका कहना है कि इंटरनेट की सुविधा ऐसी परिस्थिति में और महत्वपूर्ण हो जाती है, जब राजनीतिक अशांति फैली हो. जैसा कि हाल में ट्यूनीशिया और मिस्र जैसे अरब देशों में हुए जनविद्रोह के दौरान देखा गया.

उन्होने कहा, "ये देखते हुए कि इंटरनेट, असामानता से लड़ने के साथ-साथ विकास और मानव प्रगति को बढ़ावा देने जैसे बहुत से मानवाधिकारों के लिए एक अनिवार्य साधन बन चुका है, इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध कराना सब देशों की प्राथमिकता होनी चाहिए."

फ़्रैंक ला रू ये मानते हैं कि इंटरनेट पारदर्शिता बढ़ाने, जानकारी उपलब्ध कराने और लोकतांत्रिक समाज के निर्माण में आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी बढ़ाने के लिए 21 वीं शताब्दी के सबसे शक्तिशाली उपकरणों में से एक है.

मध्यपूर्व और उत्तरी अफ़्रीका के कई देशों में हुए जनांदोलनों ने ये दिखाया है कि इंटरनेट न्याय, समानता, जवाबदेही और मानवाधिकारों के आदर की मांग करने के लिए आम जनता को संगठित करने में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

दो अरब उपभोक्ता

रिपोर्ट का कहना है कि हलांकि इंटरनेट 1960 के दशक से मौजूद है लेकिन जिस तरह दुनिया भर में हर उम्र के लोग आधुनिक जीवन के लगभग हर क्षेत्र में इसका इस्तेमाल कर रहे हैं, इसने इंटरनेट को बहुत ही शक्तिशाली बना दिया है.

रिपोर्ट कहती है कि अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ के अनुसार दुनिया भर में दो अरब लोग इंटरनेट का उपयोग कर रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिनिधि ला रू सरकारों से आग्रह करते हैं कि ऐसे क़ानून बनाए जाएं, जिससे हर व्यक्ति को इंटरनेट उपलब्ध हो सके.

उन्होने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि कई देशों में इंटरनेट अभिव्यक्ति को मौजूदा क़ानूनों के आधार पर या नए क़ानून बनाकर ग़ैर क़ानूनी साबित किया जा रहा है.

ऐसे क़ानूनों को ये कहकर न्यायोचित ठहराया जाता है कि ये व्यक्ति की प्रतिष्ठा के संरक्षण, राष्ट्रीय सुरक्षा या आतंकवाद से लड़ने के लिए ज़रूरी हैं, लेकिन अक्सर सरकारें इनका प्रयोग ऐसी सामग्री को सेंसर करने के लिए करती हैं जो उन्हे पसंद नहीं या जिनसे वो असहमत हैं.

क्रांतिकारी माध्यम

ला रू ने इंटरनेट को एक क्रांतिकारी माध्यम बताया जो रेडियो, टेलीविज़न या प्रकाशित सामग्री से अलग है क्योंकि ये सभी एक तरफ़ा माध्यम हैं.

जबकि इंटरनेट एक ऐसा माध्यम है जो संवादात्मक है जिसमें लोग निष्क्रिय होकर केवल जानकारी ग्रहण नहीं करते बल्कि उसमें योगदान भी करते हैं.

ला रू का कहना है कि ऐसे मंच उन देशों में विशेष रूप से मूल्यवान साबित होते हैं जहां कोई स्वतंत्र प्रसार माध्यम नहीं है.

संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिनिधि इंटरनेट को मूलभूत मानवाधिकार बताते हैं लेकिन ये भी स्वीकार करते हैं कि यह अधिकार देना हर देश के लिए अभी संभव नहीं है.

बहुत से विकासोन्मुख देशों में हर किसी को बिजली उपलब्ध नहीं है इसलिए तुरंत सबको इंटरनेट उपलब्ध करा पाना बहुत मुश्किल है.

लेकिन सरकारों को समाज के सभी वर्गों के लोगों और निजी क्षेत्र और संबंधित सरकारी विभागों के प्रतिनिधियों से सलाह करके प्रभावी और ठोस नीतियां तैयार करनी चाहिए जिससे सभी को इंटरनेट उपलब्ध कराया जा सके.