क़ुदरती आफ़त से कैसे निपटते हैं जानवर ?

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    • Author, सारा हिविट
    • पदनाम, बीबीसी अर्थ

जब भी कोई क़ुदरती आफ़त आती है तो उससे जुड़ी तमाम ख़बरें आने लगती हैं. जैसे कि समुद्री तूफ़ान से इतने लोग मारे गए या फिर भूकंप की वजह से इतना नुक़सान हुआ.

जंगल की आग ने इतने घर जला दिए. मतलब ये कि किसी भी प्राकृतिक आपदा के आने पर इंसान को कितना नुक़सान हुआ, यही ख़बरें आती हैं.

कभी आपने सोचा है कि इस तबाही से जानवर कैसे निपटते हैं? उनको कितना नुक़सान उठाना पड़ा ? किसी तूफ़ान या जंगल की आग या फिर ज़लज़ले की वजह से कितनी बड़ी तादाद में जानवर मारे गए? इस आपदा के बाद वो जानवर कैसे फिर से नई ज़िंदगी जीने को उठ खड़े हुए?

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इंसान के सबसे क़रीबी रिश्तेदारों यानी बंदरों की तमाम नस्लों के बारे में बात करते हैं. कैसे किसी आफ़त के आने पर ये बंदर या लंगूर या फिर ओरंगाउटान-चिंपैंजी, कैसे उसका सामना करते हैं?

अब जैसे 2015 में इंडोनेशिया के बोर्नियो द्वीप पर जंगलों में भयंकर आग लग गई थी. इस वजह से जंगलों को भारी नुक़सान हुआ. ये इलाक़ा पहले ही लगातार तीन साल के सूखे से बेहाल था. आग की वजह से बचे हुए पेड़ जल गए. धुएं और जलते सूरज ने बाक़ी की कसर पूरी कर दी.

इस इलाक़े में रहने वाले ओरांगउटान के रहने के ठिकाने तबाह हो गए. उनके खाने के लिए न पत्तियां बचीं और न ही फल. ज़रा सोचिए कि इस क़ुदरती आफ़त से कितने ओरांगउटान मरे होंगे. जो बचे उन्होंने कैसे गुज़र-बसर की होगी?

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कनाडा की यॉर्क यूनिवर्सिटी की एन रसन ने इस बारे में काफ़ी रिसर्च की है. वो कहती हैं कि बोर्नियो में पाए जाने वाले ओरांगउटान, अपनी नस्ल के सबसे मज़बूत जानवर होते हैं. वो कई मुसीबतों का आसानी से सामना करते हैं. लेकिन एन का कहना है कि इस बार के हालात उनके लिए भी काफ़ी मुश्किल हैं.

अल निनो की वजह से उनके रहने के इलाक़े सूखे से बेहाल हैं. फिर जंगलों की आग ने हालात और ख़राब कर दिए हैं. ये पिछले 35 सालों में तीसरी बार है कि ओरांगउटान को सूखे और जंगल की आग की दोहरी मार झेलनी पड़ रही है.

अच्छी बात ये है कि ओरांगउटान खाने के मामले में बहुत नखरेबाज़ नहीं. उन्हें जो मिलता है वो खा लेते हैं. फिर भी आग की वजह से न उनके रहने के ठिकाने बचे हैं और न ही खाने को कुछ मिल रहा है. आग से तबाह हुए जंगलों के फिर से आबाद होने में कम से कम 20 साल लगेंगे. ये दौर ओरांगउटानों के लिए बहुत बुरा रहने वाला है.

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दिक़्क़त ये है कि अपने से लगी आग के अलावा स्थानीय लोग भी ज़मीन साफ़ करने के लिए आग लगा देते हैं. जिससे बचे खुचे इलाक़े भी तबाह हो जाते हैं. ऐसे में ओरांगउटान फिर खाने की तलाश में इंसानी बस्तियों की तरफ़ आते हैं. इंसानों से जानवरों की जंग में जानवरों की हार कमोबेश तय होती है.

ज़िंदगी की इस जंग ने ओरांगउटानों पर बहुत बुरा असर डाला है. उनका वज़न कम हो गया है. आबादी कम हो रही है. उन्हें अपने रिवायती रिहाइशी इलाक़ों से दूसरी जगह जाना पड़ रहा है. उनके बीच आपसी झगड़े बढ़ रहे हैं.

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इंडोनेशिया से हज़ारों किलोमीटर दूर मध्य अमरीका में बंदरों की एक और नस्ल, क़ुदरती आफ़त से जूझ रही है. मध्य अमरीकी देश बेलिज़ के जंगलों में साल 2001 में समुद्री तूफान आइरिस ने काफ़ी तबाही मचाई थी.

बेलिज़ के इन जंगलों में 'ब्लैक हाउलर' नाम के बंदर रहते हैं. समुद्री तूफ़ान की जगह से उनकी आबादी को भारी नुक़सान पहुंचा था. इस बारे में रिसर्च कर रहीं कनाडा की मैरी पावेल्का बताती हैं कि तूफ़ानी हवाओं से जंगल पूरी तरह ख़त्म हो गए थे. ब्लैक हाउलर बंदरों की 60 फ़ीसद आबादी इस तूफ़ान में ख़त्म हो गई थी.

मैरी और उनकी टीम को लगता था कि तूफ़ान के बाद भी बंदरों की ये नस्ल ख़ुद को बचा ले जाएगी. क्योंकि ये कुछ भी खा-पी लेते हैं. मगर ऐसा नहीं हुआ. बेलिज़ में रहने वाले 'ब्लैक हाउलर' बंदरों की आबादी अगले तीन सालों में इतनी कम हुई कि तूफ़ान से पहले के केवल 20 फ़ीसद बंदर ही जंगलों में बचे थे. उनके बहुत कम बच्चे हो रहे थे. जो पैदा भी हो रहे थे वो मर जाते थे. एक वक़्त तो ऐसा लगा कि 'ब्लैक हाउलर' बंदरों की स्थानीय नस्ल ही ख़त्म हो जाएगी.

आख़िर में बंदरों की आबादी घटना कम हुई और अब ये बढ़ भी रही है. लेकिन ऐसा तभी हुआ जब बेलिज़ के जंगलों में फलों वाले पेड़ फिर से तैयार हो गए. इससे साफ़ है कि इन बंदरों के बारे में जैसा सोचा गया था, वैसा नहीं हुआ. ये मुसीबत के वक़्त भी घास-फूस खाने के बजाय फलों की तलाश कर रहे थे. इससे इनकी आबादी को भारी नुक़सान उठाना पड़ा.

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वहीं बेलिज़ के ही दूसरे इलाक़े में पाए जाने वाले 'स्पाइडर मंकी' के अंदर क़ुदरती आफ़तों से लड़ने की ज़्यादा कूवत देखी गई.

इन बंदरों से पहले 2001 और फिर 2010 में आए भयंकर समुद्री तूफ़ानों से भारी नुक़सान झेला था. आम तौर पर जब 'स्पाइडर मंकी' के रिहाइशी इलाक़ों को नुक़सान होता है तो ये सबसे पहले भाग खड़े होते हैं. और वहां तभी लौटते हैं जब हालात सामान्य हो जाते हैं.

मगर तूफ़ान से हुई तबाही से 'स्पाइडर मंकी' ने बड़ा दिमाग़ लगाकर निपटने की कोशिश की. 'स्पाइडर मंकी' आम तौर पर बड़े झुंड में रहते हैं. बड़े होते बंदर बाद में अपने दोस्तों-रिश्तेदारों का अलग झुंड बना लेते हैं. और झुंड के सदस्य बदलते रहते हैं. लेकिन पहले दो तूफ़ानों और फिर अपने इलाक़े में लगी भयंकर आग से निपटने के लिए इन बंदरों ने झुंड में रहने की अपनी आदत में फेरबदल कर लिया.

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जहां पहले झुंड के बंदर बदलते रहते थे. वहीं, आफ़त आने के बाद इन्होंने अपने दोस्तों-साथियों में कोई हेर-फेर नहीं किया. इससे खाने को लेकर इनके बीच आपसी झगड़े नहीं हुए. सबने खाने के कम सामान को आपस में हेल-ल से बांटकर खाया. और इस तरह 'स्पाइडर मंकी' ने आपसी एकजुटता से दो-दो समुद्री तूफ़ानों और जंगल की भयंकर आग जैसी आपदाओं का सामना किया.

मतलब साफ़ है क़ुदरत के क़हर से बचने का माद्दा सभी जानवरों में होता है. जो जानवर बदले हुए हालात के हिसाब से ख़ुद को ढाल लेते हैं, वो बच निकलते हैं. वहीं जो ऐसा नहीं कर पाते वो तबाही में तबाह होते हैं.

हां, इन रिसर्च से एक बात साफ़ है कि इंसान को अपने आस-पास बाक़ी जानवरों को देखते रहना है, तो उसे जंगलों में अपना दखल कम करना होगा. वरना क़ुदरती आपदा के बाद इंसानों का क़हर, जानवरों की बहुत सी नस्लों का ख़ात्मा कर देगा.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक </caption><url href="http://www.bbc.com/earth/story/20160819-the-monkeys-and-apes-that-brave-hurricanes-and-wildfires" platform="highweb"/></link>करें, जो बीबीसी <link type="page"><caption> अर्थ </caption><url href="http://www.bbc.com/earth/uk" platform="highweb"/></link>पर उपलब्ध है.)

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