सैम मानेक शॉ ने जब पाकिस्तानी राजदूत को गले लगाया

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ पारसी थे. पारसियों के लिए वो हमेशा 'आपरो सैम' रहे.
गोरखा और भारतीय सेना के जवान उन्हें हमेशा प्यार से 'सैम बहादुर' कहते थे. सिख भी उन्हें अपना मानते क्योंकि उनका जन्म अमृतसर में हुआ था था. तमिल लोगों को वो इसलिए प्रिय थे क्योंकि रियाटरमेंट के बाद उन्होंने नीलगिरीज़ को अपना घर बनाया था.
4/ 12 FFR टुकड़ी के लिए जहाँ से उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी, वो हमेशा 'जंगी लाट' रहे. वो न सिर्फ़ भारतीय सेना के जवानों के सबसे प्रिय जनरल थे बल्कि आम लोगों के दिल में उनके लिए जो प्यार है, कम लोगों के लिए ही होती है. वो उन चुनिंदा लोगों में से थे जो अपने जीवनकाल में ही लीजेंड बन गए थे.
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गोरखा ने दफ़्तर के गेट पर रोका
सेनाध्यक्ष का पद सँभालने से पहले सैम मानेक शॉ पूर्वी कमान के प्रमुख हुआ करते थे. उनकी एक निजी कार थी 'सनबीम रैपियर' जिसे अक्सर उनकी पत्नी सीलू चलाया करती थीं. एक दिन रविवार को अचानक सैम ने अपनी कार निकाली और दफ़्तर के लिए चल पड़े. उन्होंने शॉर्ट्स और उसके नीचे पेशावरी चप्पल पहनी हुई थी.
फोर्ट विलियम के प्रवेश द्वार पर उन्हें एक गोरखा संतरी ने रोक कर उनसे उनका परिचय पत्र माँगा.
चूँकि सैम अपना आइडेंटिटी कार्ड घर पर ही भूल आए थे, इसलिए उन्हें अपने ही दफ़्तर में नहीं घुसने दिया गया. सैम ने गोरखा संतरी से उसी की भाषा में कहा, 'मलाई चिने चैना माँ तेरो आर्मी कमाँडर छूँ.' (तुम मुझे पहचानते नहीं? मैं तुम्हारा आर्मी कमाँडर हूँ) गोरखा ने जवाब दिया, "ना चिनाए चैना, आई डी चैना, फेटा चैना, झंडा चैना, गारी मा स्टार प्लेट चैना, कसरी चिन्ने हो कि तपई आर्मी कमाँडर चा?" ( नहीं, मैं आपको नहीं पहचानता, आपके पास न तो आईडेंटिटी कार्ड है न रैंक के बैज. आप की कार पर न तो झंडा लगा है. मैं कैसे यकीन कर लूँ कि आप आर्मी कमाँडर हैं?)
तब सैम ने संतरी से कहा कि क्या मैं आपके बूथ से एक टेलिफ़ोन कर सकता हूँ? उन्होंने कमाँडिंग अफ़सर को फ़ोन मिला कर कहा आपके एक लड़के ने मुझे गेट पर रोक लिया है. उसकी गलती नहीं है. मैंने वर्दी नहीं पहन रखी है और न ही मेरा आइडेंटिटी कार्ड मेरे पास है. क्या तुम मुझे अंदर करवा सकते हो. ये सुनना था कि एक मिनट के अंदर कमाँडिंग अफ़सर वहाँ पहुंच गया. उसने सैम को अंदर करवाया और उनके निर्देश पर गोरखा सैनिक को उसकी ड्यूटी के लिए ज़ोरदार शाबाशी दी गई.

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मॉस्को में पाकिस्तानी राजदूत से मुलाकात
नवंबर, 1971 में मानेक शॉ सोवियत संघ की यात्रा पर गए. वहाँ पर जब वो बोलशोई थियेटर गए तो वहाँ सोवियत संघ में पाकिस्तानी राजदूत जमशीद मार्कर और उनकी पत्नी डायना से टकरा गए. जमशीद क्वेटा के रहने वाले थे और उनकी सैम से दोस्ती उन दिनों से चली आ रही थी जब सैम 1943 में स्टाफ़ कालेज में पढ़ रहे थे.
सैम ने गर्मजोशी से जमशीद को गले लगाया और ठेठ पार्सी अंदाज़ में उनकी पत्नी डायना के गालों का चुंबन लिया.
दोनों थोड़ी देर तक गुजराती में एक दूसरे का हालचाल पूछते रहे. रूसी ये देख कर आश्चर्यचकित रह गए कि दोनों के व्यवहार से तो कतई नहीं लगता कि इन दोनों के देश कुछ दिनों में लड़ाई करने वाले हैं.
नेपाल नरेश से मुलाकात
1972 में सैम मानेक शॉ नेपाल की यात्रा पर गए. सैम और उनकी पत्नी को नेपाल नरेश ने मिलने के लिए आमंत्रित किया. जाने से पहले नेपाल में भारतीय राजदूत ने सैम को नेपाली राजमहल के तौर तरीकों से अवगत कराया. उन्होंने कहा कि आप नेपाल नरेश से तभी बात करिए जब आपसे वो खुद बात करें. आधे घंटे तक तो सैम ने इस नियम का पालन किया और वो नेपाल नरेश की सुनते रहे. लेकिन फिर शरारती और चुलबुले मानेक शॉ से नहीं रहा गया.
वो एकदम से रानी की तरफ मुड़े और उनसे पूछा, क्या नरेश अच्छे पति हैं? रसोई में जा कर आपकी मदद करते हैं या नहीं? ये सुनते ही रानी एश्वर्या ने ज़ोर का ठहाका लगाया और नेपाल नरेश ने शाही प्रॉटोकोल को वहीं दरकिनार कर दिया.

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संगीत और बागबानी के शौकीन
सैम की सनक थी उनके बाथरूम का शॉवर. वो चाहते थे कि उनके शॉवर से तेज़ रफ़्तार से पानी निकले और वो भी खौलता हुआ गर्म. अगर इसमें ज़रा भी कमी पाई जाती तो सैम का मूड ऑफ़ हो जाता था और उनके दिन की शुरुआत बहुत खराब होती थी.
सैम भोर होने से पहले उठ जाया करते थे और करीब एक घंटा अपने पौधों को दिया करते थे. उनके पास एक ज़बरदस्त ऑडियो सिस्टम हुआ करता था और उनका रिकॉर्ड्स और कैसेट्स का संग्रह ज़बरदस्त था. उनका रसोइया स्वामी उनके साथ 1959 से काम कर रहा था.
रोज़ सुबह दफ़्तर जाने से पहले वो दिन भर का मेन्यू उसे बता जाते थे. शाम को दफ़्तर से लौटने के बाद वो सीधे रसोई में पहुंचते थे और बर्तनों का ढक्कन उठा-उठा कर देखते थे कि स्वामी ने क्या बनाया है. सैम स्वामी की खिंचाई करने के लिए उन्हीं की तरह टूटू फूटी अंग्रेज़ी में उनसे बात करते थे.
वो अक्सर कहते थे, "मैडम कमिंग बैक टुनाइट. आई टेलिंग मैडम यू लाउज़ी कुक नॉट फ़ीडिंग मी वेल." (मैडम आज वापस लौट रही हैं. मैं उनसे बताऊंगा कि तुम मेरा ध्यान नहीं रख रहे हो.) स्वामी कहाँ पीछे रहने वाला था. वो भी उसी अंदाज़ में उन्हें जवाब देता था, "यस मैडम कमिंग बैक टुनाइट. आई टेलिंग मैडम यू नॉट ईटिंग एट होम फॉर मंथ गोइंग आउट एवरी नाइट एंड कमिंग होम एट वन इन द मॉर्निंग." (जी हाँ, मैडम आज आ रही हैं. मैं उनसे बताऊंगा कि पूरे महीने हर रात घरपर खाना नहीं खा रहे थे.)

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आप बाहर निकल जाते थे और रात 1 बजे वापस लौटते थे. इस पर सैम थोड़ा नाराज़ होने का नाटक करते थे, यू डैम कुक. इज़ दैट हाउ टू टॉक टू द आर्मी चीफ़.( बेवकूफ़ रसोइए. क्या आर्मी चीफ़ से इस तरह बात की जाती है?) स्वामी भी उसी अंदाज़ में जवाब देते थे 'यस नाऊ यू बिग मैन. यू गो लुक आफ़्टर यॉर आर्मी एंड लीव माई किचेन.'(हाँ अब आप बड़े आदमी बन गए हैं. आप अपनी सेना देखिए और मेरी रसोई से बाहर निकलिए.)
आत्मसमर्पण के लिए जनरल जैकब के ढाका जाने पर विवाद
साल 1971 में जब पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण का समय आया तो इंदिरा गाँधी चाहतीं थीं कि सैम मानेक शॉ ढाका जा कर खुद सरेंडर लें. लेकिन सैम ने ये कहते हुए इनकार कर दिया कि अगर पूरी पाकिस्तानी सेना ने सरेंडर किया होता तो मैं बहुत खुशी से ढाका जाता. सरेंडर से पहले उसकी व्यवस्था करवाने के लिए एक वरिष्ठ सैनिक अधिकारी को ढाका भेजा जाना था.
सैम ने पूर्वी कमान के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ मेजर जनरल जैकब को इस काम के लिए चुना. सैम के एडीसी रहे ब्रिगेडियर पनथाकी अपनी किताब अपनी किताब 'फ़ील्डमार्शल सैम मानेक शॉ द मैन एंड हिज़ टाइम्स' में लिखते हैं, "जब रक्षा मंत्रालय को इसका पता चला तो उसने इस बात पर चिंता प्रकट की कि मुस्लिम सेना के आत्मसमर्पण की व्यवस्था के लिए एक यहूदी अफ़सर को भेजा जा रहा है. सरकार परेशान है कि भारत के मित्र मुस्लिम देश इसको किस तरह से लेंगे?"

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सैम मानेक शॉ ये सुनते ही आगबबूला हो गए. उन्होंने कहा, "सरकार तीस सालों तक क्यों चुप रही जब जैकब देश के लिए अपनी ज़िदगी ख़तरे में डाल रहे थे? वैसे भी सेना धर्म और जाति से कहीं ऊपर है. फ़ोन रखने के बाद सैम ने जैकब को फ़ोन कर से सब बात बताई. जैकब ये सुन कर भावुक हो गए और उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा देने की धमकी दे डाली. इस पर सैम उनसे नाराज़ हो गए और बोले अब मुझको इस्तीफ़ा वगैरह देने की धमकी मत दो. अगर तुमने ऐसा किया तो मुझे उसे स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होगी."
युद्धबंदियों के पिता का आभार
1971 की लड़ाई के बाद सैम जब सैन्य प्रतिनिधिमंडल के साथ पाकिस्तान गए तो पंजाब के गवर्नर ने उन्हें खाने पर बुलाया. जब भोजन ख़त्म हो गया तो गवर्नर ने कहा कि मेरे स्टाफ़ के लोग आप से हाथ मिलाना चाहते हैं. जब सैम बाहर आए तो उन्होंने देखा कि उनसे हात मिलाने वालों की एक लंबी लाइन लगी हुई है. जैसे ही वो एक व्यक्ति के पास पहुंचे उसने उनके सम्मान में अपनी पगड़ी उतार दी.
जब मानेक शॉ ने इसका कारण पूछा तो उसने जवाब दिया, "सर आप की वजह से मैं ज़िंदा हूँ. मेरे पाँच बेटे आपके कैदी हैं. वो मुझे खत लिखते हैं. आपने उनका बहुत ख़्याल रखा है. वो पलंग पर सो रहे हैं जबकि आपके जवानों को ज़मीन पर सोना पड़ रहा है. वो बैरकों में रहे हैं जब कि आप के लोग तंबुओं में रह रहे हैं."

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छाते, धूप के चश्मे और माइक से नफ़रत
सैम कुछ चीज़े बहुत नापसंद करते थे. किन्हीं कारणों से उनका मानना था कि डरपोक लोग ही छाता ले कर चलते हैं. वो कहते थे कि एक सैनिक की पीठ पर बारिश की कुछ बूँदें पड़ भी गईं तो इससे फ़र्क क्या पड़ता है. दूसरी एक और चीज़ से उन्हें नफ़रत थी, वो था धूप का चश्मा. इसके पीछे भी एक कहानी है. जब वो एक युवा अफ़सर थे तो उनके कमाँडिंग अफ़सर ने उनकी आँखों पर लगा कीमती चश्मा ये कहते हुए अपने पैरों से कुचल दिया था कि इससे आंखें खराब हो जाती है. मानेक शॉ को माइक भी बहुत नापसंद थे. एक बार वो एक सैनिक सम्मेलन में भाग लेने के लिए एट बटालियन का दौरा कर रहे थे. मंच पर सैम के बोलने के लिए माइक की व्यवस्था की गई थी.
उन्होंने माइक को देखते ही कहा, "टेक दिस ब्ल्डी थिंग ऑफ़. मैं अपने लड़कों से बात करना चाहता हूँ." सैम की एक और सनक थी कि जब वो वर्दी पहने होते थे तो वो कभी ऐसी जगह खाना नहीं खाते थे जहाँ लोग मौजूद हों. उन्हें कभी भी हवाई उड़ान या राष्ट्रपति भवन के सरकारी समारोहों में लोगों के सामने खाते नहीं देखा गया. सैम के एडीसी रहे ब्रिगेडियर पनथाकी लिखते हैं हैं कि उनके साथ रहने के कारण हमें भी उनका अनुसरण करना पड़ता था. कभी-कभी तो हमारे लिए मुश्किल हो जाया करती थी ख़ासतौर से तब जब स्वादिष्ट खाना आपके सामने लगा हो.
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