जब एयर मार्शल अर्जन सिंह को पाकिस्तानी वायुसेनाध्यक्ष ने किया गुप्त फ़ोन

एयर मार्शल अर्जन सिंह

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    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

स्थान- रक्षा मंत्रालय का कार्यालय. कमरा नंबर 108, साउथ ब्लॉक. दिन 1 सितंबर, 1965. समय दोपहर 4 बजे.

रक्षा मंत्री यशवंतराव चव्हाण, एयर मार्शल अर्जन सिंह और रक्षा मंत्रालय में विशेष सचिव एचसी सरीन, एडजुटेंट जनरल लेफ़्टिनेंट जनरल कुमारमंगलम के साथ गहन मंत्रणा में व्यस्त थे. मुद्दा था छंब सेक्टर में उस दिन सुबह हुआ पाकिस्तानी टैंकों और तोपों का ज़बरदस्त हमला जिसने भारतीय सेना और ख़ुफ़िया एजेंसियों को अचरज में डाल दिया था.

बैठक शुरू हुए अभी आधा घंटा भी नहीं हुआ था कि थलसेनाध्यक्ष जनरल चौधरी ने कमरे में प्रवेश किया. उन्होंने एयर मार्शल अर्जन सिंह के साथ कुछ देर दबे शब्दों में बात की और रक्षा मंत्री चव्हाण की तरफ़ देख कर कहा कि उन्हें छंब सेक्टर में वायु सेना के इस्तेमाल की अनुमति दी जाए.

जाने-माने वायुसेना इतिहासकार पुष्पिंदर सिंह बताते हैं, "जब छंब में लड़ाई शुरू हुई 1 सितंबर, 1965 को, पाकिस्तानी सेना काफ़ी आगे आ गई थी और भारतीय सेना काफ़ी ख़तरे में थी, तो रक्षा मंत्री चव्हाण ने अर्जन सिह को बुलाया. उन्होंने उनसे पूछा, 'तुम हमारे लिए क्या कर सकते हो?' अर्जन सिंह ने कहा, 'आप मुझे 'गो अहेड' दीजिए. हम 45 मिनट के अंदर सबसे क़रीबी ठिकाने पठानकोट से अपने विमानों को उड़ा देंगे.' चव्हाण ने तुरंत हाँ कहा."

पुष्पिंदर बताते हैं, "अर्जन सिंह ने वहीं से हुक्म दिया, 'गेट एयरबौर्न.' अँधेरा हो रहा था. सब लोग पहले से ही तैयार थे. जैसे ही अर्जन सिंह का आदेश मिला 8 वैंपायर विमानों ने छंब पर बंमबारी करने के लिए उड़ान भरी. इसी को नेतृत्व कहा जाता है."

ऑडियो कैप्शन, वो इस पद पर बैठने वाले पहले और आख़िरी वायु सैनिक थे.

माउंटबेटन ने दिया था अर्जन सिंह को डीएफ़सी

अर्जन सिंह ने सबसे अधिक नाम कमाया 1944 की बर्मा की लड़ाई में जहाँ उन्हें लार्ड माउंटबेटन ने 'डिसटिंग्विश्ड फ़्लाइंग क्रॉस' से सम्मानित किया.

पुष्पिंदर सिंह बताते हैं, "अर्जन सिंह की 'कमिशनिंग' हुई थी 1939 में 'क्रैमवेल' से. तब दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो चुका था. तब भारतीय वायु सेना का एक ही स्कवार्डन था नंबर 1 स्कवार्डन. उनके ज़्यादातर जहाज़ थे 'लाईज़ेंडर.' उनकी शुरुआती 'पोस्टिंग' हुई थी उत्तर पश्चिम सीमाँत प्रांत में. जब जापान ने बर्मा पर हमला किया तो उस इलाके में भारी मात्रा में भारतीय सैनिक भेजे गए."

वो कहते हैं, "अर्जन सिंह नंबर 1 स्कवार्डन को 'लीड' कर रहे थे. उस समय उनकी उम्र थी मात्र 25 साल. उन्हें इंफाल भेजा गया. जब जापानी हमला शुरू हुआ तो नंबर 1 स्कवार्डन ने भारतीय सेना को 15 महीनों तक बहुत 'सपोर्ट' दिया. उन को 'इंफाल का रक्षक' और 'टाइगर्स ऑफ़ इंफाल' भी कहा गया, क्योंकि नंबर 1 स्कवार्डन का प्रतीक चिन्ह भी 'टाइगर' ही था. उनको युद्ध स्थल में ही 'डिस्टिंग्विश फ़्लाइंग क्रॉस' मिला."

पुष्पिंदर कहते हैं, "ये वायु सेना का बहुत बड़ा सम्मान होता है. लार्ड लुई माउंटबेटन दक्षिण एशिया कमान के सर्वोच्च सेनापति थे. वो खुद फ़्रंट पर गए थे अर्जन सिंह को ये सम्मान देने. इससे उनको बहुत प्रेरणा मिली."

एयर मार्शल अर्जन सिंह

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अर्जन सिंह के विमान की क्रैश-लैंडिंग

इससे पहले अर्जन सिंह उत्तर पश्चिम सीमाँत प्रांत में वज़ीरस्तान के मीरनशाह जैसे सुदूर इलाके में तैनात थे. सितंहर 1940 में उन्होंने वहाँ से 50 उड़ानें भरीं और अगले महीने 80. इन अभियानों के दौरान कई बार उन पर ज़मीन से गोलीबारी हुई, लेकिन इन सबने उनके जुझारूपन को तोड़ा नहीं.

एयर कॉमोडोर जसजीत सिंह मार्शल अर्जन सिंह की जीवनी 'द आइकन' में एक दिलचस्प किस्सा सुनाते हैं, "जब अर्जन सिंह तीसरा ग़ोता लगा रहे थे, तब उन्हें महसूस हुआ कि उनके इंजन पर कोई गोली लगी है. उस समय विमान काफ़ी नीचाई पर था. ख़ैर किसी तरह कलाबाज़ियाँ खिलाते हुए उन्होंने अपने विमान को खैसोरा नदी के पास एक सूखी जगह पर उतार लिया."

वो लिखते हैं, "क्रैश-लैंडिंग के दौरान अर्जन सिंह का चेहरा विमान के 'इंस्ट्रुमेंट पैनल' से टकराया और उनके चेहरे पर गहरी चोट आई. लेकिन उस समय अर्जन सिंह की चिंता कुछ और ही थी. जैसे ही विमान ने 'क्रैश-लैंड' किया, उनका 'गनर' ग़ुलाम अली उतर कर दौड़ने लगा. अर्जन सिंह ने देखा कि ग़ुलाम अली उसी पहाड़ी की तरफ़ दौड़ा चला जा रहा है, जहाँ से घात लगा कर क़बीले के लोग पहले से ही गोलीबारी कर रहे थे."

एयर मार्शल अर्जन सिंह

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गनर ग़ुलाम अली के पीछे भागे अर्जन

एयर कॉमोडोर जसजीत सिंह आगे लिखते हैं, "एक भी लम्हा गंवाए बिना अर्जन सिंह नाक से बहते ख़ून के बावजूद तेज़ी से उसके पीछे भागने लगे और चारों तरफ़ से चल रही गोलियों के बीच 50 गज़ आगे दौड़ कर उसे पकड़ लिया और उसे उल्टी दिशा में भागने के लिए कहा, जहाँ विमान ने 'क्रैश-लैंड' किया था. हमारी अपनी सेनाएं भी इस नाटकीय घटनाक्रम को देख रही थीं. उन्होंने दोनों को बचाने के लिए क़बाएलियों पर हमला बोल दिया."

वायुसेना प्रमुख अर्जन सिंह

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चालीस साल की उम्र में वायुसेनाध्यक्ष

दुनिया में बहुत कम वायुसेनाध्यक्ष होंगे जिन्होंने मात्र 40 साल की उम्र में ये पद संभाला हो और सिर्फ़ 45 साल की उम्र में 'रिटायर' हो गए हों.

पुष्पिंदर सिंह बताते हैं, "जब अर्जन सिंह 1964 में वायुसेनाध्यक्ष बने तो वो बहुत युवा थे. 1962 में चीन से लड़ाई हारने के बाद भारतीय वायुसेना विस्तार और आधुनिकीकरण की योजना बना रही थी. उस समय भारत के पास मुश्किल से 20 स्कवार्डन रहे होंगे. उनके भी अधिकतर विमान जैसे मिसटियर्स, कैनबरा हंटर्स और तूफ़ानीज़ पुराने पड़ चुके थे. उनके पास थोड़े से मिग 21 भी थे. भारत के पहले मिग 21 तब आए जब अर्जन सिंह एयर चीफ़ बन रहे थे."

पुष्पिंदर सिंह के साथ रेहान फ़ज़ल
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वो कहते हैं, "हमारी दीर्घकालिक योजना थी कि हम थोड़े से मिग 21 रूस से ख़रीदेंगे और बाकी हिंदुस्तान एयरनॉटिक्स के कारख़ाने में बनाएंगे. शुरू में पाकिस्तान के साथ हवाई लड़ाई अच्छी नहीं गई. हमारे कुछ जहाज़ गिर गए और कुछ ज़मीन पर ही बरबाद हो गए. उन्होंने रक्षा मंत्री चव्हाण से कहा कि आप हमें 'ऑपरेट' करने की आज़ादी दीजिए. चव्हाण ने उनकी ये बात मान ली."

पुष्पिंदर सिंह कहते हैं, "अगर तीन हफ़्तों के बाद युद्ध विराम नहीं हुआ होता तो इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत ने पाकिस्तान की वायु सेना को नेस्तानुबूद कर दिया होता. इसकी वजह ये थी कि भारत के पास पाकिस्तान से कहीं अधिक युद्धक विमान थे और पाकिस्तान के पास 'स्पेयर्स' की भारी कमी पड़ रही थी. लेकिन युद्ध विराम होने की वजह से भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध एक तरह से 'ड्रा ' के रूप में समाप्त हुआ था."

रक्षा मंत्री यशवंतराव चव्हाण के साथ एयर मार्शल अर्जन सिंह

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ग़ज़ब की शख़्सियत के मालिक थे अर्जन सिंह

एयर चीफ़ मार्शल अर्जन सिंह की ख़ासियत थी उनका चुंबकीय व्यक्तित्व, लंबा चौड़ा शरीर, विनम्रता, बात करने का अद्भुत सलीका और ग़ज़ब की नेतृत्व क्षमता.

अर्जन सिंह को नज़दीक से जानने वाले एयर वाइस मार्शल कपिल काक याद करते हैं, "बड़े लंबे क़द के थे अर्जन सिंह. उनकी काठी भी काफ़ी तंदुरुस्त थी. खेलने के भी वो बहुत शौकीन थे. सामाजिक रूप से बहुत मिलनसार थे. एक आम वायु सैनिक को ये नहीं लगता था कि वो चीफ़ से बात कर रहा है. दूसरी बात ये थी कि वो बड़े 'कूल - हेडेड' रहते थे. उनके मस्तिष्क में किसी तरह की गर्मी नहीं रहती थी."

वो कहते हैं, "मैं आपको मिसाल देता हूँ 1 सितंबर 1965 की. मैं पठानकोट एयर बेस पर तैनात था. वो रक्षा मंत्री के साथ एक मीटिंग कर रहे थे. तभी थलसेनाध्यक्ष जनरल चौधरी बहुत हड़बड़ाहट में उनसे मिलने आए और बोले कि अगर वायु सेना हमारी मदद में नहीं आई तो कश्मीर हमारे हाथ से निकल जाएगा. मैं इस बात का गवाह हूँ."

कपिल काक याद करते हैं, "मैं पठानकोट के उस रन वे पर मौजूद था जब अर्जन सिंह का हुक्म आया और सिर्फ़ 29 मिनटों में 8 वैंपायर विमानों ने पाकिस्तानी ठिकानों पर बम गिराने के लिए 'टेक ऑफ़' किया था. ये थी उनकी तुरंत फ़ैसला लेने की क्षमता. वो ये कभी नहीं कहते थे कि मैं सोचूंगा और फिर ये करूंगा."

1965 की इस तस्वीर में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के साथ एयर मार्शल अर्जन सिंह

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जूनियर अफ़सरों को साथ बहुत बेतकल्लुफ़

अर्जन सिंह हमेशा से ही जूनियर वायुसेनाधिकारियों और वायु सैनिकों के 'रोल मॉडल' रहे हैं.

एयर मार्शल सतीश ईनामदार बताते हैं, "वो बातचीत बहुत बेबाकी से करते थे. इससे पहले वायुसेना में ये कभी नहीं देखा गया था कि इतना सीनियर अफ़सर अपने जूनियर्स से इतनी बेतकल्लुफ़ी से बात करे. वो अपनी पूरी वर्दी पर सिर्फ़ एक ही मैडल लगाते थे, 'डिसटिंग्विश्ड फ़्लाइंग क्रॉस.' इसके अलावा मैंने उनकी वर्दी पर कोई पदक लगे नहीं देखा."

हंटर्स

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एयर मार्शल असग़र खाँ का फ़ोन

1965 के युद्ध से तीन पहले इंडियन एक्सप्रेस में टी वी परसुराम की एक रिपोर्ट छपी थी जिसका शीर्षक था, 'जब एक फ़ोन कॉल ने पूरा युद्ध होने से रोका.'

अख़बार ने ब्रिटिश अख़बार 'संडे टाइम्स' का उल्लेख करते हुए लिखा था कि पाकिस्तानी वायु सेना के एयर मार्शल असग़र ख़ाँ ने अपने पुराने दोस्त अर्जन सिंह को एक गोपनीय टेलिफ़ोन कॉल किया जिसकी वजह से दोनों देशों के बीच लड़ाई होते होते रह गई.

पुष्पिंदर सिंह याद करते हैं, "दोनों इम्फाल में 'कलीग्स' थे. जब अर्जन सिंह वहाँ नंबर 1 स्कवार्डन लीड कर रहे थे, असग़र ख़ाँ नंबर 9 स्कवार्डन लीड कर रहे थे. अर्जन उनसे कुछ साल 'सीनियर' थे, लेकिन दोनों एक दूसरे को जानते थे. असग़र को अभी तक पाकिस्तान की नई वायु सेना का पिता कहा जाता है. जब रण ऑफ़ कच्छ की लड़ाई शुरू हुई तो असग़र ख़ाँ ने अर्जन सिंह को फ़ोन कर कहा कि हमें अपनी वायु सेना को इस लड़ाई से दूर रखना चाहिए."

वो कहते हैं, "जब शुरू में झड़पें शुरू हुई तो ख़तरा था कि ये झड़पें कहीं गंभीर रूप न धारण कर लें. असग़र ख़ाँ के फ़ोन के बाद भारत ने भी तय किया कि वो इस लड़ाई में अपनी वायु सेना का इस्तेमाल नहीं करेगा. उस के बाद ये अफवाह फैली कि असग़र ख़ाँ को युद्ध शुरू होने से पहले इसलिए निकाला गया, क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान की सरकार को जानकारी दिए बग़ैर भारतीय वायुसेना के प्रमुख से संपर्क किया था. वास्तव में इस बात में कोई सच्चाई नहीं थी, क्योंकि असग़र खाँ का पाँच सालों का कार्यकाल समाप्त हो चुका था और वो वैसे भी 'रिटायर' होने वाले थे."

राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन एयर मार्शल अर्जन सिंह को पद्म विभूषण प्रदान करते हुए

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ठंडे दिमाग़ वाले अर्जन सिंह

लेकिन जब अंतत लड़ाई हुई तो अर्जन सिंह ने पूरी दुनिया को दिखाया कि वास्तव में नेतृत्व क्षमता होती क्या है. कपिल काक बताते हैं, "उस वक्त सिद्ध हुआ उनके नेतृत्व में कि कोई लड़ाई तब तक नहीं लड़ी जा सकती, जब तक वायु सेना उसमें भाग नहीं लेती है. इस लड़ाई में कई बार भारतीय वायु सेना को झटके लगे. पठानकोट में हमारे कई विमानों का नुकसान हुआ."

काक कहते हैं, "कलाईकुंडा में भी हमारे कुछ जहाज़ बर्बाद हुए. लेकिन इन्होंने ठंडे दिमाग़ से उसका सामना किया. जहाँ इन्हें कठोर कार्रवाई करनी थी, वो उन्होंने की और कुछ कमांडरों को हटाया भी. उन्होंने लड़ाई से हर क़दम पर सबक सीखा और ये सुनिश्चित किया कि ऐसी ग़लतियाँ दोबारा न हों."

पाकिस्तान फ़्लाइंग अकादमी में अर्जन सिंह का चित्र

जब भारतीय पायलट्स ने हलवारा में पाकिस्तान के दो सेबर जेट्स गिरा दिए तो वो खुद अपना विमान उड़ा कर उन्हें शाबाशी देने वहाँ पहुंचे. आज़ादी के समय अर्जन सिंह रिसालपुर के स्टेशन चीफ़ थे, जो इस समय पाकिस्तान में है.

पुष्पिंदर सिंह बताते हैं, "मैंने पाकिस्तान की वायु सेना पर काफी शोध किया है और उस पर एक किताब भी लिखी है 'फ़िज़ाया.' एक बार मैं पाकिस्तानी वायु सैनिकों का इंटरव्यू करने के लिए पाकिस्तान जा रहा था तो वहाँ से सुझाव आया कि मैं रिसाल पुर क्यों नहीं जाता. रिसाल पुर इस समय फ़्लाइंग स्टेशन नहीं है बल्कि 'फ़्लाइंग अकादमी' है जहाँ पाकिस्तानी पायलेटों को ट्रेनिंग दी जाती है."

वो कहते हैं, "मैंने पाकिस्तान जाने से पहले अर्जन सिंह से पूछा कि क्या मैं उन्हें आपकी एक तस्वीर भेंट में दे सकता हूँ. मैंने ही उनकी तस्वीर खींची और उसे उन्होंने 'साइन' किया. उसे मैंने रिसालपुर के स्टेशन कमांडर को भेंट किया. एयर चीफ़ मार्शल अर्जन सिंह की वो तस्वीर आज भी पाकिस्तान की रिसालपुर फ़्लाइंग अकादमी में लगी हुई है."

हलवारा एयर बेस पर अदम्य साहस दिखाने वाले विनोद नायब, अर्जन सिंह और बाएं खड़े हैं राठौर

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कमीशंड अफ़सर के कार का दरवाज़ा खोलने के ख़िलाफ़

एयर चीफ़ मार्शल अर्जन सिंह जब रिटायर हुए तो उन्होंने हर वायु स्टेशन पर 'फ़ेयरवेल विज़िट' की. वो अंबाला भी गए जहाँ उस समय एयर मार्शल सतीश इनामदार फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट के तौर पर तैनात थे.

सतीश ईनामदार याद करते हैं, "मुझे एयर मार्शल अर्जन सिंह का 'लियाजाँ ऑफ़िसर' बनाया गया. वो अंबाला में 'चिनार ब्लॉक' में ठहरे हुए थे. हम पहले दिन उनको गाड़ी में लेने गए तो मैं लपक कर पीछे की सीट का दरवाज़ा खोलने चला. उन्होंने मुझसे कहा, 'रुको.... वेट.' मैंने कहा, 'मैं आपको स्टेशन कमांडर के आफ़िस ले चलने आया हूँ.' उन्होंने कहा 'ये ठीक है, लेकिन भारतीय वायु सेना का एक 'कमींशंड' अफ़सर मेरी कार का दरवाज़ा नहीं खोलेगा.' मैं थोड़ा सकपकाया. इतने में एयरफ़ोर्स के 'कॉरपोरल सार्जेन्ट' ने उनकी कार का दरवाज़ा खोल दिया."

वो कहते हैं, "मैं दूसरी तरफ़ से जा कर गाड़ी की अगली सीट पर बैठने लगा. उन्होंने फिर मुझसे कहा, 'कम एट द बैक.' मैं बहुत शर्माते हुए उनकी बग़ल में बैठ गया. उन्होंने मेरा नाम पूछा और कहा, 'एक बात हमेशा याद रखना. कभी भी तुम कितने ही बड़े अफ़सर को 'एस्कॉर्ट' कर रहे हो, चाहे तुम जितने भी छोटे अफ़सर हो, कभी भी उसकी आगे की सीट पर नहीं बैठना. हमेशा उसके बग़ल में बैठ कर जाना."

ईनामदार कहते हैं, "जब हम स्टेशन कमांडर के घर पर उतरे तो उन्होंने मुझे एयर चीफ़ मार्शल अर्जन सिंह के साथ पीछे की सीट से उतरते देखा. आश्चर्य से उनका मुंह खुला का खुला रह गया. मैं उनको कैसे बताता कि मुझे पीछे की सीट पर बैठने की दावत खुद एयर चीफ़ मार्शल ने दी थी!"

1965 के युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना के प्रमुख अर्जन सिंह और पाकिस्तानी वायुसेना के प्रमुख नूर ख़ान

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मार्शल ऑफ़ द इंडियन एयरफ़ोर्स

वर्ष 2002 में भारत सरकार ने एयर चीफ़ मार्शल अर्जन सिंह को 'मार्शल ऑफ़ द एयरफ़ोर्स' नियुक्त किया. मार्शल का वही स्थान होता है जो थल सेना में 'फ़ील्ड मार्शल' का होता है. मैंने जब एयर वाइस मार्शल कपिल काक से पूछा कि जब आपको ये ख़बर मिली तो आपको कैसा महसूस हुआ, तो उनका जवाब था, 'देर आयद, दुरुस्त आयद, क्योंकि पहले ही बहुत देर हो चुकी थी.

कपिल काक कहते हैं, "उससे पहले करियप्पा और सैम मानेकशॉ को 'फ़ील्ड मार्शल' बनाया गया था. अगर आप एयर चीफ़ मार्शल अर्जन सिंह का करियर रिकार्ड देखें, तो वो किसी से कम नहीं था. वो अपने काम से अपनी क़ाबलियत 'डिमॉन्सट्रेट' करते थे."

काक कहते हैं, "वो आला दर्जे के लड़ाकू पायलेट थे. वो पहले काम कर के खुद दिखाते थे और फिर लोगों से कहते थे कि अब तुम इसको करो. शायद यही वजह थी कि वो भारतीय वायु सेना में काफ़ी लोकप्रिय रहे."

एयर मार्शल अर्जन सिंह

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गोल्फ़ के लिए जुनून

एयर चीफ़ मार्शल अर्जन सिंह को रिटायरमेंट के बाद पहले स्विटज़रलैंड में भारत का राजदूत बनाया गया और फिर कीनिया में उच्चायुक्त. वो अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य और दिल्ली के लेफ़िटिनेंट गवर्नर भी रहे. हवाई जहाज़ों के अलावा उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा जुनून था गोल्फ़.

वो अपने जीवन के अंतिम दिनों तक गोल्फ़ खेलते रहे. आख़िरी दिनों में जब वो चल नहीं पाते थे, तब भी उनकी पाँच स्टार वाली गाड़ी दिल्ली गोल्फ़ कोर्स के अंतिम छोर तक जाती थी और वो अपनी 'व्हील चेयर' पर बैठ कर लोगों को गोल्फ़ खेलते हुए देखा करते थे.

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