दक्षिणी चीन सागर में आख़िर चीन चाहता क्या है?

चीन का फ़ाइटर प्लेन, दक्षिणी चीन सागर

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    • Author, रूथ एलेक्ज़ेंडर
    • पदनाम, बीबीसी, द इन्क्वायरी

बात इसी रविवार यानी 25 मार्च की है. चीन के तमाम फ़ाइटर प्लेन जैसे, एच-6के बॉम्बर, एसयू-30 और एसयू-35 फ़ाइटर प्लेन अचानक बेहद सक्रिय हो चुके थे. चीन के लड़ाकू विमानों ने पश्चिमी प्रशांत महासागर के एक बड़े हिस्से का चक्कर लगाया. चीन के विमानों ने दक्षिणी चीन सागर से लेकर जापान के दक्षिणी द्वीपों के बेहद क़रीब तक उड़ान भरी थी.

चीन के लड़ाकू विमानों की इस उड़ान का मक़सद था. अमरीका समेत पूरी दुनिया को ये संदेश देना कि दक्षिणी चीन सागर पर उसी का हक़ है. और इसमें दखल की जुर्रत कोई न करे.

चीन के इस कड़े रुख़ की वजह अमरीका ने मुहैया कराई थी. दो दिन पहले ही यानी 23 मार्च को अमरीकी जंगी जहाज़ फ्रीडम ऑफ़ नेविगेशन, दक्षिणी चीन सागर में चीन के बनाए आर्टिफ़िशियल द्वीप के बेहद क़रीब से गुज़रा था.

चीन का आरोप था कि अमरीका ने जंगी जहाज़ भेजकर उसकी संप्रभुता और सुरक्षा को नुक़सान पहुंचाने की कोशिश की. और इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

स्कारबरो शोल, दक्षिणी चीन सागर

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दक्षिणी चीन सागर की कहानी

सवाल ये है कि अंतरराष्ट्रीय इलाक़ा माने जाने वाले दक्षिणी चीन सागर पर चीन इकतरफ़ा हक़ क्यों जताता रहता है?

इंडोनेशिया और वियतनाम के बीच पड़ने वाला समंदर का ये हिस्सा, क़रीब 35 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है. इस पर चीन, फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ताईवान और ब्रुनेई अपना दावा करते रहे हैं. क़ुदरती ख़ज़ाने से लबरेज़ इस समुद्री इलाक़े में जीवों की सैकड़ों प्रजातियां पाई जाती हैं.

आज से तीन-चार साल पहले तक इस इलाक़े को लेकर इतनी तनातनी नहीं थी. फिर अचानक, क़रीब तीन साल पहले चीन के समंदर में खुदाई करने वाले जहाज़, बड़ी तादाद में ईंट, रेत और बजरी लेकर दक्षिणी चीन सागर पहुंचे.

उन्होंने एक छोटी समुद्री पट्टी के इर्द-गिर्द, रेत, बजरी, ईंटों और कंक्रीट की मदद से बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य शुरू कर दिया.

पहले एक बंदरगाह बनाया गया. फिर हवाई जहाज़ों के उतरने के लिए हवाई पट्टी. देखते ही देखते, चीन ने दक्षिणी चीन सागर में एक आर्टिफ़िशियल द्वीप तैयार कर के उस पर सैनिक अड्डा बना लिया.

इस इलाक़े में चीन ने धीरे-धीरे करके कई छोटे द्वीपों पर सैनिक अड्डे बना लिए. आज हालात ये बन पड़े हैं कि दक्षिणी चीन सागर पर कई देश दावेदारी कर रहे हैं.

चीन ने इस छोटे से सागर पर मालिकाना हक़ के एक अंतरराष्ट्रीय पंचाट के फ़ैसले को मानने से इनकार कर दिया है. और आगे चलकर इस इलाक़े को लेकर जंग भी हो सकती है.

सवाल ये है कि आख़िर दक्षिणी चीन सागर में चीन चाहता क्या है?

इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की है, बीबीसी की रेडियो सिरीज़ 'द इन्क्वायरी' में रूथ एलेक्ज़ेंडर ने.

दक्षिणी चीन सागर

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दो हज़ार साल पुराना इतिहास

सात देशों से घिरे दक्षिणी चीन सागर पर इंडोनेशिया को छोड़कर बाक़ी सभी 6 देश अपना दावा जताते रहे हैं. मगर चीन का कहना है कि ये इलाक़ा उसका है.

दक्षिणी चीन सागर में स्थित द्वीपों की खोज चीन के समुद्री मुसाफ़िरों नागरिकों और मछुआरों ने ही की थी. चीन का दावा है कि दक्षिणी चीन सागर से उसका ताल्लुक़ क़रीब 2000 हज़ार साल पुराना है.

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, पूरे दक्षिणी चीन सागर पर जापान का क़ब्ज़ा था. लेकिन विश्व युद्ध के ख़ात्मे के फ़ौरन बाद चीन ने इस पर अपना अधिकार जताया था.

दक्षिणी चीन सागर

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चीन ने इसे अपने नक्शे में शामिल किया

फुंग चैंग, ऑस्ट्रेलिया की नेशनल यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल रिलेशन्स पढ़ाते हैं.

चैंग कहते हैं कि विश्व युद्ध में जापान की हार के फ़ौरन बाद चीन ने अपने जंगी जहाज़ भेजकर दक्षिणी चीन सागर के द्वीपों पर अपना हक़ जता दिया था. कुछ ही दिनों बाद चीन ने एक नक़्शा छापा. इसमें दक्षिणी चीन सागर और इसके द्वीपों के इर्द-गिर्द एक लाइन खींचकर चीन ने इन्हें अपना बताने की कोशिश की. तब किसी भी देश ने इसका विरोध नहीं किया था.

सत्तर के दशक में दक्षिणी चीन सागर में तेल और गैस के बड़े भंडारों का पता चला. तब भी चीन ने पूरे इलाक़े पर अपना अधिकार दोहराया.

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चीन की दावेदारी ज़्यादा मजबूत

फुंग चैंग कहते हैं कि इस इलाक़े पर चीन का हक़ ज़्यादा वाजिब है. क्योंकि उसने बाक़ी देशों से पहले ही अपना दावा ठोका था. दूसरे देश तो दक्षिणी चीन सागर में तेल और गैस के भंडार मिलने पर दावेदारी के लिए कूदे.

उन्नीसवीं सदी के मध्य से लेकर आधी बीसवीं सदी तक, चीन पर विदेशी ताक़तों का क़ब्ज़ा रहा. उसके बाद से ही चीन, अपने ऐतिहासिक दावों को दोहराता रहा है.

फुंग चैंग के मुताबिक़, दक्षिणी चीन सागर पर चीन का दावा राष्ट्र निर्माण की उसी सोच का एक और नमूना है.

आम चीनी नागरिक भी अपनी सरकार के दावे के साथ खड़ा है.

दक्षिणी चीन सागर

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तेल, गैस और मछली की लड़ाई

आज की तारीख़ में चीन का दावा सिर्फ़ इलाक़े का नहीं. दक्षिणी चीन सागर में मौजूद क़ुदरती संसाधन भी चीन के कड़े होते रुख़ की वजह बन रहे हैं.

प्रोफ़ेसर क्लाइव स्कोफ़ील्ड, ऑस्ट्रेलियन नेशनल सेंटर फॉर ओशन रिसोर्सेज़ ऐंड सिक्योरिटी में पढ़ाते हैं. वो कहते हैं कि अभी ये तय नहीं है कि दक्षिणी चीन सागर में कितना तेल और गैस है. लेकिन, तमाम देशों की नज़र अब उसी पर है.

प्रोफ़ेसर क्लाइव कहते हैं कि सिर्फ़ तेल और गैस ही नहीं, दक्षिणी चीन सागर में मछलियों की हज़ारों नस्लें पाई जाती हैं.

वो कहते हैं कि दुनिया भर के मछलियों के कारोबार का क़रीब 55 फ़ीसदी हिस्सा या तो दक्षिणी चीन सागर से गुज़रता है, या वहां पाया जाता है. इसलिए बात अब सिर्फ़ गैस और तेल की नहीं.

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स्कारबरो शोल पर चीन फिलीपींस आमने सामने

2012 में चीन ने अपने तट से 500 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक छोटे से द्वीप स्कारबरो शोल पर जहाज़ भेजकर क़ब्ज़ा कर लिया. यूं तो ये विशाल समंदर में महज़ एक छोटा सा टीला है. मगर इसे लेकर फिलीपींस से चीन की कई महीने तक तनातनी रही.

इलाक़े में चीन और फिलीपींस के जंगी जहाज़ एक-दूसरे के मुक़ाबले खड़े रहे. हालात जंग के बन गए. क्योंकि स्कारबरो शोल फिलीपींस के ज़्यादा क़रीब है. इसलिए फ़िलीपींस इस पर अपना हक़ छोड़ने को तैयार नहीं था.

स्कारबरो शोल की अहमियत इसलिए है, क्योंकि मछली पकड़ने निकलने वाले जहाज़ अगर समुद्री तूफ़ान में फंसते हैं, तो ये टीला उनके लिए डूबते को तिनके के सहारे जैसा रहा है.

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चीन की मनमानी

फिलीपींस ने चीन को इंटरनेशनल ट्राईब्यूनल में घसीट लिया. इसमें प्रोफ़ेसर क्लाइव को भी गवाही के लिए बुलाया गया था.

इंटरनेशनल ट्राईब्यूनल की सुनवाई में चीन शामिल नहीं हुआ. अंतरराष्ट्रीय पंचायत ने चीन के दावे को ख़ारिज कर दिया. मगर चीन ने ट्राईब्यूनल के फ़ैसले को मानने से इनकार कर दिया.

क्लाइव स्कोफ़ील्ड कहते हैं कि इस इलाक़े में चीन की दूसरे देशों से भी झड़पें हो चुकी हैं. एक बार इंडोनेशिया के गश्ती जहाज़ों ने चीन के एक जहाज़ को पकड़ लिया था. हालात से निपटने के लिए चीन ने बड़े जंगी जहाज़ इलाक़े में भेजे. आख़िर में इंडोनेशिया को चीन के जहाज़ को छोड़ना पड़ा था.

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दक्षिणी चीन सागर की इतनी अहममियत क्यों?

दक्षिणी चीन सागर, प्रशांत महासागर और हिंद महासागर के बीच स्थित बेहद अहम कारोबारी इलाक़ा भी है. दुनिया के कुल समुद्री व्यापार का 20 फ़ीसदी हिस्सा यहां से गुज़रता है.

क्लाइव स्कोफ़ील्ड बताते हैं कि 2016 में दक्षिणी चीन सागर से होकर 6 ख़रब डॉलर का समुद्री व्यापार गुज़रा था. इस इलाक़े में अक्सर अमरीकी जंगी जहाज़ गश्त लगाते हैं, ताकि समुद्री व्यापार में बाधा न पहुंचे. मगर, चीन इसे अमरीका का आक्रामक रवैया कहता है.

चीन का इरादा है कि दक्षिणी चीन सागर से होने वाली कारोबारी आवाजाही पर उसका नियंत्रण हो. मगर अमरीका मानता है कि ये दुनिया के कारोबार के लिए ठीक नहीं होगा. ये चीन की दादागिरि है.

साफ़ है कि चीन का इरादा दक्षिणी चीन सागर का आर्थिक रूप से फ़ायदा उठाने का है. मगर, बात सिर्फ़ आर्थिक फ़ायदे की होती, तो भी ठीक था.

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चीन की हरकतों से समुद्र को नुक़सान

ऑस्ट्रेलिया के पीटर जेनिंग्स रक्षा मंत्रालय के अधिकारी रहे थे. वो एक बार दक्षिणी चीन सागर में कई देशों के साझा युद्धाभ्यास को देखने गए थे. इस युद्ध अभ्यास का मक़सद, व्यापारिक जहाज़ों की हिफ़ाज़त की प्रैक्टिस करना था.

पीटर जेनिंग्स कहते हैं कि पूरे दक्षिणी चीन सागर में अक्सर चीन के लड़ाकू जहाज़ उड़ान भरते रहते हैं. वो कहते हैं कि चीन इन उड़ानों के ज़रिए पड़ोसी देशों को धमकाकर रखना चाहता है.

जेनिंग्स बताते हैं कि चीन लगातार दक्षिणी चीन सागर में कंक्रीट, रेत, और मलबा डालकर कृत्रिम द्वीप बना रहा है. समुद्र ने उथले इलाक़ों में मलबा डाल-डालकर चीन ने क़रीब 3 हज़ार वर्ग हेक्टेयर की नई ज़मीन तैयार कर ली है. इसमें उसने तीन रनवे बना लिए हैं, जिन पर जंगी जहाज़ उतर सकते हैं. इनके लिए ईंधन टैंक, मिसाइल डिफेंस सिस्टम भी दक्षिणी चीन सागर में बनावटी द्वीपों में चीन ने लगाए हैं.

पीटर जेनिंग्स कहते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद की ये सबसे बड़ी सामरिक तैयारी है. चीन की हरकतों से दक्षिणी चीन सागर में मूंगे की चट्टानों और क़ुदरती माहौल को भारी नुक़सान पहुंचा है.

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चीन के आक्रामक रवैये से अमरीका हैरान

दक्षिणी चीन सागर में बड़े पैमाने पर युद्ध का साजो-सामान तैनात करके, चीन अपने मेनलैंड की सुरक्षा बढ़ाना चाहता है. ताकि युद्ध की सूरत में, अमरीका या दूसरे दुश्मन देश के जंगी जहाज़ मुख्य भूमि की तरफ़ न आ सकें. उन्हें समुद्र में ही दूर रोका जा सके.

जेनिंग्स के मुताबिक़, चीन लगातार आक्रामक रवैया अपनाए हुए है. वो इस इलाक़े से गुज़रने वाले हर जंगी जहाज़ को इलाक़े से दूर जाने को कहता है. इलाक़े से उड़ने वाले विमानों पर भी ख़तरा मंडरा रहा है.

पीटर जेनिंग्स कहते हैं कि आगे चलकर चीन पूरे दक्षिणी चीन सागर को नो फ़्लाई ज़ोन घोषित कर सकता है. ये अमरीका को सीधी चुनौती होगी.

अमरीका रक्षा विशेषज्ञ बोनी ग्लेज़र कहती हैं कि चीन ने जितने बड़े पैमाने पर आर्टिफ़िशियल द्वीप बना लिए हैं, उसने अमरीका को चौंका दिया है. लंबे वक़्त तक चीन को पता ही नहीं था, कि समुद्र में खुदाई कर रहा और मलबा गिरा रहा चीन आख़िर दक्षिणी चीन सागर में कर क्या रहा था.

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अमरीका कर रहा निगरानी

बोनी ग्लेज़र के मुताबिक़, शुरुआत में अमरीका ने दक्षिणी चीन सागर में चीन की गतिविधियों और इलाक़े की अहमियत को कम कर के आंका. आज उसे ये अनदेखी महंगी पड़ रही है.

अब अमरीकी सुरक्षा और ख़ुफ़िया एजेंसियां लगातार इलाक़े की निगरानी कर रही हैं. अमरीकी नौसैनिक जहाज़ दक्षिणी चीन सागर में गश्त लगा रहे हैं.

फिर भी अमरीका का पूरा ध्यान अभी उत्तर कोरिया पर है. अमरीकी रणनीतिकार पूछते हैं कि क्या कुछ समुद्री चट्टानों के लिए चीन से युद्ध करना ठीक रहेगा क्या?

यानी दक्षिणी चीन सागर पर दावा करने वाले छोटे देश अब चीन के आगे घुटने टेकने को मजबूर हैं. ज़्यादातर देश, ने चीन से पंगा लेने के बजाय हाथ मिलाने में अपनी भलाई समझ रहे हैं.

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चीन पर अमरीका से अधिक भरोसा

इन देशों को लगता है कि अमरीका उनके भरोसे पर नहीं उतरा. बोनी ग्लेज़र कहती हैं फिलीपींस ने अमरीका के बजाय अब चीन की तरफ़ देखना शुरू कर दिया है.

चीन, फिलीपींस में सिंचाई की सुविधाएं विकसित करने जैसे तमाम प्रोजेक्ट पर जमकर निवेश कर रहा है. फिलीपींस को भी लगता है कि अमरीका से मदद मांगने के बजाय क़रीबी पड़ोसी पर भरोसा करना बेहतर रहेगा.

बोनी ग्लेज़र कहती हैं चीन, दक्षिणी चीन सागर में अपनी गतिविधियां तेज़ करेगा. इससे अमरीका से उसके टकराव के हालात बन सकते हैं. ये टकराव अमरीका के रुख़ पर निर्भर करेगा.

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चीन की क्या है रणनीति?

बोनी ग्लेज़र कहती है कि पश्चिमी प्रशांत महासागर में चीन आज अमरीका से मुक़ाबले की ताक़त बनता जा रहा है.

चीन का इरादा सुपरपावर बनने का है. उसका ये सपना तभी पूरा होगा, जब वो अमरीका को अपने क़रीबी इलाक़ों से पीछे हटने और दखल न देने पर मजबूर कर दे. दक्षिणी चीन सागर पर उसकी दावेदारी इसी रणनीति का हिस्सा है.

चीन, दक्षिणी चीन सागर पर हक़ जमाकर, अमरीका की दादागीरी को सीधी चुनौती देना चाहता है.

अंग्रेज़ी में 'द इन्क्वायरी' के इस कार्यक्रम को सुनने के लिए क्लिक करें.

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