जिन्होंने मौत से आंखें मिलाना सिखाया

जेसिका मिटफोर्ड

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    • Author, डेविड रॉबसन
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

'इस दुनिया में कुछ भी तय नहीं, सिवाए मौत और टैक्स के'.

मशहूर अमरीकी नेता, लेखक, दार्शनिक और वैज्ञानिक, बेंजामिन फ्रैंकलिन ने ये बात 18वीं सदी में कही थी.

मगर, आज कुछ वैज्ञानिकों और कारोबारियों की बातों पर यक़ीन करें तो ये बात अब आधी ही सच है.

आज आप दो लाख़ डॉलर में अपनी लाश को बड़े से रेफ्रिजरेटर में जमा करा सकते हैं.

ये विशाल रेफ्रिजरेटर अमरीका के एरिज़ोना राज्य के स्कॉट्सडेल में है.

या फिर अस्सी हज़ार डॉलर में आप अपना दिमाग़ ऐसे ही फ्रीज करा सकते हैं.

ताकि कभी साइंस इतनी तरक़्क़ी कर ले कि मुर्दा को ज़िंदा कर सके, तो आपको दूसरी ज़िंदगी जीने का मौक़ा मिल सके.

अब तक एक हज़ार लोगों ने फिर से ज़िंदा होने के इस कारोबार में ख़ुद को साझीदार बनाया है.

इसी कारोबार पर ज़बरदस्त चोट की थी ब्रिटिश मूल की अमरीकी महिला जेसिका मिटफ़ोर्ड ने.

जेसिका मिटफोर्ड

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जेसिका मिटफ़ोर्ड, मशहूर उपन्यासकार नैन्सी मिटफ़ोर्ड की बहन थीं. जेसिका के एक साथ कई किरदार थे.

वो वामपंथी बाग़ी थीं, खोजी पत्रकार थीं, लोगों के हक़ के लिए लड़ने वाली कार्यकर्ता थीं और पॉप गायिका भी थीं, जिन्होंने सिंडी लॉपर और माया एंजेलो के साथ मिलकर गाने गाए थे.

मशहूर लेखिका जेके रॉलिंग, जेसिका से बहुत प्रभावित थीं, इतना कि उन्होंने अपनी पहली बेटी का नाम भी जेसिका के नाम पर रखा था.

मगर, जेसिका को सबसे ज़्यादा शोहरत उनकी क़िताब, 'द अमरीकन वे ऑफ डेथ' से मिली.

ये क़िताब 1963 में छपी थी. जेसिका को आज भी उनकी इस क़िताब की वजह से ही याद किया जाता है.

इसमें उन्होंने अमरीका में अंतिम संस्कार के रिवाज़ के नंगे सच को उघाड़कर रख दिया था.

जेसिका के बचपन का नाम डेका था. वो ब्रिटेन के एक सामंती परिवार में पैदा हुई थीं.

जेसिका मिटफोर्ड

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बारह बरस की उम्र में जेसिका ने घर से भागने का प्लान बनाना शुरू कर दिया था.

इसके लिए उन्होंने 'रनिंग अवे अकाउंट' भी खोल लिया था. घर में हिटलर के नाज़ीवाद से सहानुभूति का माहौल था.

जेसिका पर इसका भी असर पड़ा. उनकी बड़ी बहन यूनिटी तो भागकर जर्मनी चली गई थीं. वहां वो हिटलर की बेहद नज़दीकी हो गईं.

जबकि एक और बड़ी बहन डायना ने ब्रिटेन के फ़ासीवादी संगठन के मुखिया ओसवाल्ड मोज़्ले से शादी कर ली. इस शादी में ख़ुद हिटलर शरीक़ हुए थे.

हालांकि जेसिका को फ़ासीवादी विचारधारा से नफ़रत थी. 19 बरस की उम्र में उनकी मुलाक़ात सर विंस्टन चर्चिल के भतीजे एस्मॉन्ड रोमिली से हुई. फिर दोनों ने घर से भागकर शादी कर ली.

उसके बाद स्पेन के गृह युद्ध में लोकतंत्रवादियों की मदद के लिए दोनों स्पेन पहुंच गए.

वहां से लौटकर वो इंग्लैंड आए और फिर अमरीका आकर बस गए. उनकी ज़िंदगी में कई हादसे हुए.

पहली बेटी की खसरे से मौत को हुई. फिर दूसरे विश्व युद्ध में ख़ुद एस्मॉन्ड शहीद हो गए. लेकिन जेसिका की ज़िंदगी नहीं रुकी.

उन्होंने दोबारा शादी करके नई ज़िंदगी शुरू की. अमरीका के सैन फ्रांसिस्को शहर में उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले ली.

फिर वो अमरीका के अश्वेतों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने लगीं. इसके बाद उन्होंने कुछ दिन खोजी पत्रकारिता में भी हाथ आज़माया.

इस दौरान उन्होंने समाज में नाइंसाफ़ी के कई क़िस्सों को उजागर किया.

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इन्हीं में से एक रिपोर्ट अमरीका में अंतिम संस्कार के दौरान होने वाले ढकोसलों के बारे में थी.

उनकी क़िताब पहले एक अख़बार में लेख के तौर पर छपी थी, जिसे काफ़ी पढ़ा गया.

ये लेख लोगों की आंखें खोल देने वाला था. यहां तक कि अपनों से जुदा होने वाले भी अंतिम संस्कार के इस ढकोसले से अक्सर अनजान होते थे.

जेसिका ने लिखा कि पुराने ज़माने में अंतिम संस्कार कैसे होता था.

माया, इन्का और एज्टेक सभ्यताओं में मौत के बाद क्या होता था, इस बारे में हज़ारों क़िताबें लिखी गई हैं.

मिटफ़ोर्ड ने मौत के बाद होने वाले ढकोसलों को इस कदर नंगा किया था कि पहली बार तो उनके प्रकाशक ने उनके साथ किया गया करार ही रद्द करने का फ़ैसला कर लिया था.

उन्होंने लिखा था कि लाश पर इत्र छिड़का जाता है, बेतरतीब हिस्सों को काटा छांटा जाता है, छेद करके सिलाई की जाती है, बाल काटे जाते हैं.

चमड़ी को छील-काटकर, वैक्सिंग करके, फिर क्रीम और मेक-अप लगाकर लाश को सजा-संवारकर तैयार कर दिया जाता है.

जेसिका मिटफोर्ड

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और इस तरह एक गुज़र चुका इंसान, मानो एक तस्वीर खिंचवाने के लिए सज-धजकर तैयार होकर सामने आता है. ताकि आख़िरी मौक़े की अच्छी यादगार बने.

और लाश के ये सब नाज़ इसलिए उठाए जाते हैं ताकि वो और ख़राब न हो. ताकि परिजन, मरने वाले की आख़िरी छवि जब देखें तो वो ख़ूबसूरत हो.

मगर इसके लिए अच्छी ख़ासी मशक़्क़त करनी पड़ती है. लाश को तैयार करने वाले शरीर से ख़ून का एक एक क़तरा निकाल देते हैं, ताकि लाश और ख़राब न हो.

इसके बाद लाश पर लेप करने के लिए उसमें तरह-तरह के रंग वाली चीज़ भरी जाती है जिससे लाश की त्वचा जवां दिखे.

फिर लाश की सजावट करने वाला शख़्स बदन की छोटी मोटी कमियों को काट-छांटकर लाश में यहां वहां पिन लगाते हैं.

लाश को दोबारा सिलकर, बीमारी और उम्र के निशान मिटाए जाते हैं ताकि लाश को दिलकश बनाया जा सके.

इसके बाद दांत साफ़ करके, लाश का मेकअप करके, कपड़े पहनाकर आख़िरी तस्वीर के लिए तैयार कर दिया जाता है.

जेसिका इस बात पर हैरान रह गई थीं कि लाशों के लिए भी तरह-तरह के कपड़े बाज़ार में थे.

एक ख़ास ब्रांड की ब्रा से औरतों के बदन को मरने के बाद ख़ूबसूरत दिखाने का वादा तक किया जा रहा था.

परिजनों को महंगे से महंगे ताबूत ख़रीदने, सजावट और फूलों पर ज़्यादा ख़र्च करने के लिए एक तरह से मजबूर किया जाता.

जेसिका मौत के इस कारोबार को देखकर हैरान रह गई थीं. मिटफोर्ड ने इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाए.

उन्हें इस बात पर ख़ास ऐतराज़ था कि अंतिम संस्कार के कारोबारी, लाश का पोस्ट मॉर्टम होने से रोकते थे.

मौत के बाद फोटोग्राफी

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साथ ही वो इस बात का माहौल तैयार करते थे कि घरवाले महंगे अंतिम संस्कार के लिए राज़ी हों.

वो परिजनों को ये समझाते थे कि किसी के जाने का शोक मनाने के लिए लाश को रंग-रोगन करके सजाया जाना ज़रूरी है.

जबकि जेसिका को लगता था कि ग़म से उबरने के लिए घरवालों को अंतिम संस्कार पर पैसे ख़र्च करने से ज़्यादा किसी मनोवैज्ञानिक की ज़रूरत थी.

मौत की कड़वी सच्चाई छुपाने की इस तरह कोशिश हो रही थी. इसीलिए मिटफ़ोर्ड ने तय किया कि जनता के सामने सच आना चाहिए.

बहुत से अमरीकियों ने जेसिका की बात का समर्थन किया. उनकी क़िताब की बिक्री के आंकड़े ये बात ज़ाहिर करते हैं.

किताब के पहले ही एडिशन की बीस हज़ार प्रतियां बिक गईं. उनकी क़िताब बेस्ट सेलर की लिस्ट में पहले नंबर पर आ गई.

1965 में इस क़िताब पर फ़िल्म बनी. 2013 में भी डेविड बोवी ने इस पर एक एल्बम बनाया.

जेसिका की क़िताब का ऐसा असर हुआ कि बहुत से लोगों ने सादा अंतिम संस्कार के विकल्प तलाशे और कम पैसे में अपनों को आख़िरी विदाई देने का फ़ैसला किया.

कुछ लोगों ने तो इसे जेसिका के नाम पर 'मिटफ़ोर्ड सर्विस' का नाम दे डाला.

अमरीकी राष्ट्रपति जॉन कैनेडी की मौत के बाद उनके भाई रॉबर्ट कैनेडी ने उन्हें चिट्ठी लिखकर क़िताब की तारीफ़ की.

आज विज्ञान की मदद से हमारे पास मौत से निपटने के कई तरीक़े मौजूद हैं.

जैसे कि अमरीका के सिएटल में 'अर्बन डेथ प्रोजेक्ट' लाशों को खाद में बदलने का काम करता है.

वहीं क्रायोजेनिक्स की मदद से लाश को डीप फ्रीज किया जाता है. इस उम्मीद में कि कभी विज्ञान की मदद से इन लोगों को ज़िंदा किया जा सकेगा.

वैसे भी मौत को देखने, इस बारे में बात करने का नज़रिया अब बदल रहा है.

आज दुनिया के कई देशों में 'डेथ कैफ़े' खोले जा रहे हैं. जहां लोग कॉफी के साथ मौत के बारे में चर्चा करते हैं.

इस तरह के तजुर्बों से आज हम मौत को लेकर ज़्यादा जागरूक हैं. इस सच्चाई का सामना करने के लिए दिमाग़ी तौर पर ज़्यादा तैयार हैं.

ख़ुद जेसिका मिटफ़ोर्ड ने अपनी मौत का बहुत बहादुरी से सामना किया.

1996 में जब वो मौत पर ही अपनी क़िताब, 'डेथ वार्म्ड ओवर' को लिख रही थीं, तो उन्हें पता चला कि उन्हें कैंसर है.

उनके पास जीने के लिए कुछ ही महीने थे. इस दौरान उन्होंने अपनी क़िताब पूरी कर ली.

22 जुलाई 1996 को जेसिका मिटफ़ोर्ड ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया.

एक बार उन्होंने मज़ाक़ में कहा था कि उनकी आख़िरी विदाई बड़ी शान से, गाजे-बाजे के साथ हो.

उनके चाहने वालों ने यही इंतज़ाम किया. उनकी शवयात्रा के लिए एक शाही बग्घी का इंतज़ाम किया गया.

उनकी शवयात्रा गाजे-बाजे के साथ निकली. ताबूत भी कांच का बना हुआ था.

अगर जेसिका मिटफोर्ड ख़ुद अपनी शवयात्रा को देखतीं तो शायद वो मुस्कुराकर यही कहतीं, 'काश! मैं भी वहां होती'.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.com/future/story/20160721-how-jessica-mitford-changed-our-ideas-about-death" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी फ्यूचर</caption><url href="http://www.bbc.com/future" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)

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