कश्मीर बंटवारे का अधूरा एजेंडा है: पाक मीडिया

भारत सरकार के ख़िलाफ़ श्रीनगर में प्रदर्शन

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    • Author, अशोक कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत प्रशासित कश्मीर में हाल में हुई हिंसा और तनावपूर्ण हालात पर पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में लगातार चर्चा हो रही है.

'जंग' लिखता है कि कश्मीर समस्या भारत के विभाजन का अधूरा एजेंडा है और संयुक्त राष्ट्र कई बार जम्मू कश्मीर में जनमत संग्रह कराने के प्रस्ताव पारित कर चुका है.

अख़बार के मुताबिक़ जब तक कश्मीरियों को अपना भविष्य ख़ुद तय करने का अधिकार नहीं दिया जाएगा, तब तक इस क्षेत्र ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की शांति ख़तरे में रहेगी.

अख़बार कहता है कि विश्व समुदाय का फ़र्ज़ है कि पूर्वी तिमोर की तरह कश्मीर मुद्दे को हल कराने में अपनी भूमिका सक्रिय रूप से अदा करे.

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भारत प्रशासित कश्मीर के हालात पर 20 जुलाई को पाकिस्तान में 'काला दिवस' मनाए जाने का ज़िक्र करते हुए 'नवा-ए-वक़्त' ने लिखा है कि कश्मीर में उठी आज़ादी की आवाज़ थमने वाली नहीं है.

अख़बार के मुताबिक़ उम्मीद है कि कश्मीरी लोगों की जद्दोजहद में उनके साथ खड़े होने की जो स्पष्ट नीति पाकिस्तान की सरकार ने अपनाई है, वो कश्मीरियों को मंज़िल मिलने तक जारी रहेगी.

अख़बार कहता है कि इस समय कश्मीरी जनता को अपने रुख़ के साथ पाकिस्तान के साथ हमआहंग होने की जरूरत है.

वहीं 'इंसाफ' लिखता है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार हालात पर क़ाबू पाने और असल समस्या का समाधान करने पर ध्यान नहीं दे रहे हैं.

कश्मीर के हालात के लिए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को ज़िम्मेदार बताते हुए उनके ख़िलाफ़ वहां अंबाला की अदालत में मुक़दमा दर्ज होने को अख़बार ने ‘हास्यास्पद हरकत’ बताया है.

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वहीं 'जरासत' ने पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में हुए चुनावों में प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की पीएमएल (एन) पार्टी की ज़ोरदार जीत पर संपादकीय लिखा है.

अख़बार के मुताबिक़ होता यही आया है कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में वही पार्टी जीतती है, जिसकी केंद्र में सरकार हो, क्योंकि जब पाकिस्तान पीपल्स पार्टी सत्ता में थी तो वो भी वहां जीतती थी.

अख़बार कहता है कि पीएमएल (एन) की जीत बताती है कि कश्मीरी लोगों को पनामा लीक्स और शरीफ़ परिवार के कथित भ्रष्टाचार की बातों में कोई दिलचस्पी नही है जबकि इमरान खान और बिलावल भुट्टो जरदारी का पूरा ज़ोर इसी बात पर था.

'एक्सप्रेस' लिखता है कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के चुनाव पर भारत समेत पूरी दुनिया की नज़रें थीं, इसलिए सरकार ने इन्हें शांतिपूर्ण तरीके से कराने की पूरी कोशिश की.

चुनाव में हारने वाली पार्टियों को अख़बार की नसीहत है कि वो सरकार के ख़िलाफ़ मुहिम चलाने की बजाय लोगों की समस्याओं पर ध्यान दे क्योंकि जनता का दिल जीतने का यही तरीक़ा है जो सत्ता तक जाता है.

पाकिस्तान में पिछले दिनों मॉडल कंदील बलोच की उनके भाई ने हत्या कर दी थी

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वहीं रोजनामा 'खबरें' ने इज़्ज़त के नाम होने वाली हत्याओं के ख़िलाफ़ पाकिस्तानी संसद में एकमत से क़ानून पारित होने को अहम क़दम बताया है.

अख़बार लिखता है कि जब तक पाकिस्तान में अज्ञानता को दूर नहीं किया जाएगा, तब तक महिलाओं के साथ होने वाले भेदभावपूर्ण सलूक को ख़त्म नहीं किया जा सकता है.

रुख़ भारत का करें तो हिंदोस्तान एक्सप्रेस ने तुर्की में तख़्तापलट की नाकाम कोशिश के बाद लगी इमरजेंसी पर संपादकीय लिखा है- यूरोपीय संघ के पेट में मरोड़.

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अख़बार के मुताबिक़ इमरजेंसी लगने के बाद तुर्की के राष्ट्रपति को तीन महीने के लिए विशेषाधिकार हासिल हो गए हैं और उनके मंत्रिमंडल को हक़ है कि वो संसद की अनदेखी कर क़ानून मंज़ूर कर सकें और इन कानूनों को अदालत में भी चुनौती नहीं दी जा सकेगी.

अख़बार कहता है कि जब पेरिस हमले के बाद फ्रांस में इमरजेंसी लगाई गई तो सबने इसकी तारीफ़ की, लेकिन जब तुर्की को अस्थिर करने की कोशिश में शामिल लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई शुरू हुई तो मानवाधिकारों की दुहाई दी जा रही है और देश विरोधी ताक़तों की हौसला अफ़ज़ाई की जा रही है.

अख़बार तुर्की में इमरजेंसी लगाने पर यूरोपीय संघ की चिंताओं को ख़ारिज करता है.

वहीं 'हमारा समाज' ने बसपा प्रमुख मायावती को एक भाजपा नेता की तरफ़ से अपशब्द कहे जाने से पैदा हालात पर संपादकीय लिखा है.

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अख़बार लिखता है कि उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनावों के मद्देनज़र भाजपा दलितों को पार्टी से जोड़ने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा देगी, लेकिन उसके एक नेता की वजह से अब दलित उससे दूर होते नज़र आ रहे हैं.

इसके अलावा अखबार ने गुजरात में दलितों की पिटाई का मुद्दा उठाते हुए लिखा है कि गाय की रक्षा की जाए, लेकिन इसके साथ-साथ इंसानों की हिफ़ाजत करना भी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए.

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