'दो फकीर मिले तो ख़ुदा ने बादशाह बना दिया'

- Author, रियाज़ सुहैल
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, कराची
पाकिस्तान में बेसहारा ग़रीबों और पीड़ितों की मदद करने वाले ईधी फाउंडेशन के संस्थापक अब्दुल सत्तार ईधी की पत्नी बिलकिस ईधी को उनसे हमेशा उनसे एक ही शिकायत रही कि वो घर के लिए वक़्त नहीं देते थे.
ईधी ने शुक्रवार को 88 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कहा. इसके बाद सोशल मीडिया पर बहुत से लोगों ने लिखा कि पाकिस्तान के ग़रीब और आम लोग यतीम हो गए हैं.
दो साल पहले जब सिंध के थर में सूखे की वजह से मोर मरने लगे थे तो ईधी डॉक्टरों की टीम के साथ नंगर पारकर इलाके में पहुंच गए थे और तब बिलकिस ने ईधी ने एक मुलाक़ात में कहा, "कमज़ोरी की वजह से टांगों पर खड़े नहीं हो सकते लेकिन मोरों को बचाने चल दिए."
ईधी अपनी कामयाबी का बड़ा श्रेय अपनी बीवी बिलकिस ईधी को देते थे. जब उन्होंने नवजात बच्चों के लिए ईधी सेंटरों में झूले लगाए तो उन बच्चों की ज़िम्मेदारी उनकी पत्नी ने ही संभाली थी.

बिलकिस ईधी का कहना था कि सड़कों और गंदगी के ढेर से बच्चे लगभग मुर्दा हालत में मिलते थे.
उनके मुताबिक़, "ईधी ने कहा कि हम झूले लगाते हैं ताकि लोग बच्चों को यहां छोड़कर जाएं, मारे न. मौलवियों ने शोर करना शुरू कर दिया कि हम नाजायज़ रिश्तों और बच्चों को बढ़ावा दे रहे हैं. उन्होंने कई फ़तवे भी जारी किए. लेकिन ईधी ने कभी परवाह नहीं की."
कराची के पुराने इलाक़े मेठाधर में ईधी के घर के एक हिस्से में डिस्पेंसरी, दूसरे में प्रसूति गृह जबकि पीछे वाले हिस्से में ईधी का दफ़्तर और सबसे ऊपरी मंज़िल पर एक बड़ा कमरा लावारिस बच्चों के सोने के लिए रखा गया था.
वहीं एक कमरे में उनके लिए स्कूल मौजूद था और इन सब चीज़ों की निगरानी बिलकिस ईधी करती हैं.

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बिलकिस ईधी बताती हैं कि ईधी की शादी उनकी उम्र की ही महिला से तय हुई थी. वो भी उनके साथ काम करती थी लेकिन ऐन वक़्त पर उन्होंने ये कह कर मना कर दिया, "तू तो फकीर है. तेरे से शादी नहीं करूंगी."
बिलकिस के मुताबिक़ इसके बाद उन्होंने ईधी के सामने शादी की पेशकश रखी. वो कहती हैं, "इस तरह दो फकीर मिल गए तो ख़ुदा ने बादशाह बना दिया."
बिलकिस ईधी के मुताबिक़ ईधी जब नाराज़ होते तो खाना नहीं खाते थे और बड़े ज़िद्दी थे. वो बड़ी मुश्किल से उन्हें मनाती थीं.
बिलकिस का कहना है, "मां ने नसीहत दी थी या तो किसी के बन जाओ या किसी को अपना लो. ये बनने वाला बंदा तो था नहीं. इसलिए मैंने ही अपना बना लिया."
बिलकिस ईधी के मुताबिक़ अपने भलाई के कामों की वजह से ईधी घर को बहुत कम वक़्त देते थे.
वो बताती हैं, "एक बार वो सिंध के दूरदराज के इलाके में लाश छोड़ने गए थे. हम भी एंबुलेंस में सवार हो गए. लाश छोड़ने के बाद एक जगह रुके, जहां नहर थी. वहां लोगों ने खाना खाया और हमने पिकनिक मनाई."
पाकिस्तान में भूकंप, बाढ़ और बम धमाकों में ईधी फाउंडेशन पीड़ित लोगों की मदद में सबसे आगे रहा. बिलकिस ईधी के मुताबिक, "जब भी इमरजेंसी होती तो जैसे ये 20 साल के हो जाते. इतनी ऊर्जा आ जाती थी इनमें. "
बिलकिस ईधी के मुताबिक़ अगर कोई कर्मचारी ग़लत काम करता या बेईमानी करता पकड़ा जाता तो ईधी उसे माफ कर देते थे और पुलिस के हवाले नहीं करते थे.

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मेठाधर में ईधी के दफ़्तर पर मौजूद बड़ी मेज़ पर शीशे के नीचे एक हज़ार, पांच सौ और सौ के कई नोट मौजूद थे. ईधी साहब से एक मुलाकात के दौरान वजह जाननी चाही तो उन्होंने बताया कि ये जाली नोट हैं.
जब उनसे पूछा गया कि क्या लोग आपको जाली नोट देते हैं तो उनका कहना था कि नहीं कर्मचारी इन नोटों को बदल लेते हैं. कराची में जब एक दशक पहले राजनीतिक और प्रशासनिक हालात तब्दील हुए तो ईधी फाउंडेशन के लिए भी मुश्किलें पैदा हो गईं.
कराची के एमए जिन्ना रोड से रोज़ ईधी की एंबुलेंस गुजरती हैं जिनमें किसी न किसी का करीबी रिश्तेदार जख्मी, बीमार या मुर्दा हालत में होता है.
शुक्रवार की रात एंबुलेंस के काफिले में इस बुजुर्ग की लाश ले जाई जा रही थी. जो चंद लोगों का नहीं बल्कि पूरे शहर का करीबी रिश्तेदार था. दो करोड़ की आबादी वाला कराची आज ख़ुद को यतीम समझ रहा है.
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