'ईधी साहेब परलोक नहीं विदेशी दौरे पर हैं'

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- Author, वुसतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए, पाकिस्तान से
अब्दुल सत्तार ईधी के निधन की सूचना आने के बावजूद कराची के क़रीब तरीन इलाके खरादर के ईधी फाउंडेशन ट्रस्ट के कंट्रोल रूम में काम एक लम्हे के लिए भी नहीं रूका.
जहां-जहां से इमरजेंसी कॉल आ रही हैं, वहां-वहां एंबुलेंस ज़ख़्मी-बीमार लोगों को लेने आ-जा रही है.
अज़ीब लोग हैं जो शोक में तो डूबे हैं लेकिन एक मिनट भी अपना काम नहीं रोक पा रहे. कंट्रोल रूम का ऑपरेटर कॉलर्स को ये तक नहीं कह पा रहा है कि आज रहने दो, तुम्हारे मोहल्ले से कल लावारिस लाश उठा लेंगे. बस ईधी साहब का अंतिम संस्कार होते ही तुम्हारे बीमार के लिए एंबुलेंस रवाना कर देंगे.
कोई ये नहीं कह रहा कि आज कॉल मत करो, आज हम बंद है, सदमे से निढ़ाल है. आज हमारे बाप का इंतकाल हो गया है.
पूरे पाकिस्तान के पौने चार सौ ईधी केंद्रों में कोई सरगर्मी एक पल के लिए भी नहीं रूकी, ऐसा लगता है ईधी साहब परलोक नहीं बस कुछ दिनों के लिए विदेशी दौरे पर गए हैं.
इसे कहते शो मस्ट गो ऑन.

ईधी ने इसके सिवा ज़िंदगी भर और किया भी क्या? मगर ईधी ने मुझ जैसों को मुश्किल में डाल दिया जिनके पास कुछ न करने के बारे में खूबसूरत दलीलों के अंबार लगे हुए हैं.
अप्रभावी नज़र आने वाले उस शख़्स ने बाज़ार में कपड़े के थान ढ़ो-ढ़ोकर पैसे जमा कर पहली डिस्पेंसरी खोली. सड़क पर हाथ फैला कर पहली खटारा एंबुलेस के लिए रकम जोड़ी.

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उन्होंने मलेशिया खद्दर के दो जोड़ों में ज़िंदगी बसर की. आखिरी जूता बीस बरस पहले ख़रीद कर भी मस्त और जातीय घर के झंझट से मुक्त रहे. उन्होंने यह तक परवाह नहीं की कि पोतों-नवासों के लिए कुछ छोड़ जाए.
छरहरे बदन के ईधी की शख्सियत ऐसी थी कि वे इंसान के जले हुए मांस की बदबू नथुने में घुसने के बावजूद बिना ऊबकाई लिए लाशें ढ़ो सकते थे, उसे अपने हाथों से नहलाते थे. यदि कोई नवज़ात बच्चे को कूड़े में डाल जाता तो वे उसे अपना बना लेते, उसे पढ़ाते और मां-बाप के खाने में अपना और बिलकीस का नाम डालते.

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जिसे कोई नहीं पूछता था वे वैसे नशेडियों को कंधे से लगा लेते थे. दुत्कारी औरतों, बूढ़े और बच्चों को छत और लावारिश लाश को आख़री चादर देते थे. बिना सरकारी ग्रांट दुनिया की सबसे बड़ी एबुंलेस सर्विस और पाकिस्तान में कल्याणकारी संस्था बनाई.
तो इसके बाद किसी भी फकीर, अमीर, सरकारी और निजी संस्था, अंगले-कंगले के लिए कौन सा बहाना बचता है जिसकी पनाह लेकर वह यह कह सके कि न भाई ये मेरे बस का काम नहीं. इसके लिए तो बड़े लंबे चौड़े संसाधन और जात की कुर्बानी की दरकार है.

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मुझ जैसे तो बातें बनाने के सिवा कुछ नहीं कर सकते, उन्हें ये फ्रिक सबसे ज्यादा है कि ईधी के बाद क्या उनकी संस्था और इसका काम इसी तरह चल सकेगा?
ये सवाल तब भी पूछा जा रहा था जब ईधी का कोई वजूद नहीं था.वे भी चाहते तो दिल को तसल्ली देकर जान छुड़ा सकते थे कि एक न एक दिन कोई ऐसा रहम दिल हुक्मरान जरूर आएगा, कोई ऐसा नेता ज़रुर पैदा होगा, कोई वली उतरेगा जो हम सबके दुख समेट कर ले जाएगा.
लेकिन शुक्र है वे ऐसे किसी भी वहम में नहीं थे.

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यूं तो कोई भी ईधी बन सकता है, मगर ये बात कहना किस क़दर आसान है.
ये भी कहते हैं कि खुदा अपने नेक बंदों को जल्द उठा लेता है. मगर ईधी साहब को खुदा ने मुझ जैसे बातों के शेर के बीच बरसों तक रखा. इसके लिए थैंक्यू अल्लाह मियां, थैंक्यू सो मच !
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